आज का श्लोक प्राचीन संस्कृत ग्रंथों आधुनिक संस्कृत सुभाषित परंपरा से है। इसे विशेष रूप से आदर्श संगठन की परिभाषा प्रस्तुत करने के लिए उद्धृत किया जाता है।
श्लोक :
महासिद्धान्तनिष्ठानां स्वानुशासनवर्तिनाम्।
समष्टि लीनव्यष्टीनां ‘संघ’ आदर्श उच्यते॥
भावार्थ :
महासिद्धान्तनिष्ठ, स्वप्रेरणा से अनुशासन का पालन करने वालों की ‘ संगठना’ आदर्श संगठना कहलाती है।
श्लोक की प्रासंगिकता
यह श्लोक किसी भी कालखंड में एक उत्कृष्ट और सफल संगठन का मानक तय करता है:
दृढ़ वैचारिकता : संगठन के सदस्यों का केवल नाम मात्र के लिए जुड़ना काफी नहीं है, बल्कि उनका उच्च सिद्धान्तों और आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठावान (महासिद्धान्तनिष्ठ) होना आवश्यक है।
स्वानुशासन : जब किसी संस्था के कार्यकर्ता बाहरी दबाव या दंड के भय से नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेरणा से नियमों का पालन (स्वानुशासनवर्तिनाम्) करते हैं, तो वह संगठन अत्यंत अनुशासित और दीर्घकालिक बनता है।
समष्टि में व्यष्टि का लय : “समष्टि लीनव्यष्टीनाम्” का अर्थ है कि व्यक्तिगत अहंकार, स्वार्थ और ‘मैं’ (व्यष्टि) की भावना को समाज व संगठन हित (समष्टि) के लिए समर्पित कर देना। यही टीम वर्क और ‘राष्ट्र-प्रथम’ की कुंजी है।

















