रूपकुंड का रहस्य आज भी बरकरार: 5000 मीटर की ऊंचाई पर हजारों नरकंकाल, लोककथाओं में भी छिपे हैं कई जवाब
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रूपकुंड का रहस्य आज भी बरकरार: 5000 मीटर की ऊंचाई पर हजारों नरकंकाल, लोककथाओं में भी छिपे हैं कई जवाब

हजारों श्रद्धालुओं ने जैसे ही पहली बार हिमालय में मौजूद नरकंकालों की रहस्मय झील रूपकुंड को देखा तो हर कोई आश्चर्यचकित रह गया।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by Mahak Singh
Oct 1, 2026, 03:15 pm IST
inउत्तराखंड

मां नंदा की बड़ी जात में सम्मलित मां नंदा की डोलियों, छंतोलियाँ, निशानों और हजारों श्रद्धालुओं का एक निर्जन पड़ाव पातर नचौणियां था। जिसके बाद हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा की बड़ी जात की सबसे बड़ी परीक्षा थी भगुवाबासा से छेड़ी नाग, रूपकुंड की बेहद दुर्गम पथरीले रास्ते को पार करके रूपकुंड ज्यूराँगौली होते हुए शिला समुद्र पहुंचना। इस यात्रा के इस बेहद कठिन मार्ग में साँसे रोक देने वाली, हांफती चढ़ाई भी नहीं रोक पाई नंदाभक्तों की राह। हजारों श्रद्धालुओं ने जैसे ही पहली बार हिमालय में मौजूद नरकंकालों की रहस्मय झील रूपकुंड को देखा तो हर कोई आश्चर्यचकित रह गया। इतनी ऊंचाई पर इस कुंड को देखकर लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हिमालय में भी कोई ऐसा रहस्मयी कुंड है।

रहस्यमयी रूपकुंड में आज भी दफन हैं हजारों नरकंकाल

गौरतलब है कि सीमांत जनपद चमोली के देवाल ब्लाक मे लगभग 5029 मीटर (16499 फीट) की ऊंचाई पर हिमालय में स्थित है रहस्यमयी रूपकुंड। हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा की 12 बरस में होने वाली बड़ी जात यात्रा मार्ग पर ज्यूंरागौली से पहले मौजूद है ‘रूपकुंड। रूपकुंड झील त्रिशूली शिखर (2400 फीट) की गोद में ज्यूंरागली पहाडी के नीचे 150 फीट ब्यास एवं 500 फीट की परिधि में अंडाकार आकार में फैली स्वच्छ एवं शांत मनोहारी झील है। इससे रूपगंगा जलधारा निकलती है। इस कुंड के आसपास हजारों मानव अस्थियां आज भी अव्यवस्थित है।

रहस्यमयी रूपकुंड में मौजूद हजारो नरकंकालो का रहस्य आज भी देश ही नहीं विदेशी पर्यटकों के मध्य भी अबूझ पहेली बना हुआ है कि आखिरकार ये मानव अस्थियां है किसकी –?? अभी तक यहाँ मौजूद नरकंकालो की जानकारी हमें लोक मान्यताओं के अनुसार नंदा के लोकगीतों और जागरों में ही मिलती है। 2019 में एक शोध के बाद वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने बताया था कि उत्तराखंड की रहस्यमयी रूपकुंड झील में मौजूद नरकंकाल अलग अलग समुदाय के हैं। जो एक हजार साल के अंतराल में कम से कम दो घटनाओं में मारे गए थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस स्थान के इतिहास की जितनी कल्पना की गई थी वह उससे भी जटिल है। शोधकर्ताओं का मानना है कि सात से 10 शताब्दी के बीच भारतीय मूल के लोग अलग-अलग घटनाओं में रूपकुंड में मारे गए। यह शोध ‘नेचर कम्यूनिकेशन्स’ नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ। हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मॉलिक्युलर बायॉलजी के वैज्ञानिकों ने इन कंकालों से डीएनए लेकर विश्लेषण किया। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के साथ मिलकर हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मॉलिक्युलर बायॉलजी के वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ये कंकाल करीब 1000 साल के अंतराल में दो घटनाओं के दौरान हादसों का शिकार हुए तीन अलग-अलग जेनेटिक ग्रुप्स के हैं। डीएनए अनैलेसिस और दूसरे बायोमॉलिक्यूलर तरीकों से यह पता लगाया है कि वहां मिले मानव अवशेष भारतीय, मेडिटरेनियन और दक्षिणपूर्व एशिया के हैं। इसके अलावा इनके रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि सारे कंकाल एक ही समय के नहीं हैं, जैसा कि पहले समझा जाता था। इस शोध के बाद ये रहस्य ओर गहरा गया है कि ये लोग इतनी दूर से इतनी ऊँचाई पर रूपकुंड झील क्यों आए थे और उनकी मौत कैसे हुई?

लोकगीतों और जागरो के जरिये भी मिलती है रहस्यमयी रूपकुण्ड झील के बारे में जानकारी

नंदा के लोकगीतो, जागरो और जनश्रुतियों के अनुसार माना जाता है कि माता पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश जा रही होती तो रूपकुंड में उन्हें प्यास लगती हैं तब माता पार्वती भगवान शिव से पानी की लिये कहती हैं। भगवान शिव जब रूपकुंड के चारों ओर नजर दौड़ते हैं तो पाते हैं कि चारों ओर केवल बर्फ ही बर्फ है। तब वे अपने त्रिशूल वहां पर गाढ़ देते हैं जिससे वहां पर पानी की जलधारा फूट पड़ती है और एक कुंड आकर लेता है। जैसे ही मां पार्वती कुंड के पानी से अपनी प्यास बुझाती है तो उनको उस कुंड में अपनी परछाई नजर आती है। माता पार्वती भगवान शिव से उस कुंड का नाम पूछते हैं तो भगवान शिव उस कुंड को रूपकुंड कहते हैं। वहीं दूसरी ओर जनश्रुतियों के अनुसार एक बार कन्नौज के राजा जसधवल ने नंदा देवी की कैलाश यात्रा हेतु सदल-बल प्रस्थान किया। राजा ने धार्मिक यात्रा के नियमों एवं मर्यादाओं की राजमद में पालन न करते हुए घोर उपेक्षा की। राजा अपनी गर्भवती रानी व दास-दासियों सहित तमाम लश्कर दल के साथ नंदादेवी यात्रा मार्ग पर स्थित रूपकुंड में पंहुचे। नंदादेवी के दोष के परिणामस्वरुप उस क्षेत्र में अचानक भयंकर वर्षा व ओलावृष्टि हो गई और राजा जसधवल सपरिवार आदि सभी यात्री दल उस बर्फानी तूफान में फंस गये व दबकर मर गये। ऐसा माना जाता है कि रहस्यमयी रूपकुंड में मौजूद हजारो नरकंकाल उसी घटना के हैं। कई अनुसंधानों में रूपकुंड में मिले अवशेषों में रिंगाल की छंतोली और डोली के अवशेष, हुडका के अवशेष, चमडे की चप्पल मिलने का दावा किया गया के। वहीं कुछ चूड़ियां और गहने भी मिले जिससे पता चलता है कि समूह में महिलाएं भी मौजूद थीं। रूपकुंड में मौजूद नरकंकाल व अस्थियां आदि वस्तुऐं उसी समय के बताये जाते हैं।

कई मर्तबा हुये हैं अनुसंधान

रूपकुंड के आसपास पडे अस्थियों के ढेर एवं नरकंकालों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1942 में भारतीय वन निगम के रेंजर हरिकृष्ण मधवाल द्वारा की गई। जबकि भारतीय मानव सर्वेक्षण विभाग के पहले शारीरिक मानव वैज्ञानिक डॉ आर एस नेगी नें 1956 में रूपकुंड में मौजूद अस्थियों का अध्य्यन किया था। इनकी जांच कराने पर पहली बार डॉ नेगी नें बताया था की ये अस्थियां यूपी, पंजाब, राजस्थान आदि मैदानी इलाके के लोगों की है। बाद के बरसों में डा० मजूमदार नें भी डॉ नेगी के शोध के नतीजों का समर्थन किया था। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार ये अस्थियां 600 वर्ष से पहले की है। 1955 में वन विभाग के रेंजर हरिकृष्ण मधवाल ने सितम्बर में रूपकुंड क्षेत्र का भमण किया व कुछ नरकंकाल अस्थियां चप्पल आदि वस्तुऐं एकत्रित कर लखनऊ विश्वविद्यालय के मानव शरीर रचना अध्ययन विभाग के डा० डी० एन० मजूमदार को परीक्षणार्थ सौंप दी थीं।  जबकि विशेषज्ञों द्वारा यह माना जाता है कि उन लोगों की मौत महामारी भूस्खलन या बर्फानी तूफान से हुई थी। 1960 के दशक में एकत्र नमूनों से लिए गये कार्बन डेटिंग ने अस्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वे लोग 12वीं सदी से 15वीं सदी तक के बीच के थे। Human Skeletons in Roopkund Lake 2004 में, भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के एक दल ने उस स्थान का दौरा किया ताकि उन कंकालों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके। उस टीम ने अहम सुराग ढूंढ़ निकाले जिनमें गहने, खोपड़ी, हड्डियां और शरीर के संरक्षित ऊतक शाiमिल थे। लाशों के डीएनए परीक्षण से यह पता चला कि वहां लोगों के कई समूह थे। जिनमें शामिल था छोटे कद के लोगों का एक समूह (सम्भवतः स्थानीय कुलियों) और लंबे लोगों का एक समूह जो महाराष्ट्र में कोकणस्थ ब्रामिंस के डीएनए उत्परिवर्तन विशेषता से निकट संबंधित थे। हालांकि संख्या सुनिश्चित नहीं की गयी। 500 से अधिक लोगों से संबंधित अवशेष पाए गए हैं और यह भी माना जाता है कि छह सौ से अधिक लोग मारे गए थे। इसके अलावा भी कई अनुसंधानों में अलग अलग तथ्यात्मक तथ्य भी सामने आयें हैं।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय

रेडियोकार्बन प्रवर्धक यूनिट में हड्डियों की रेडियोकार्बन डेटिंग के अनुसार इनकी अवधि 850 ई. में निर्धारित की गयी है जिसमें 30 वर्षों तक की गलती संभव है। Roopkund Lake खोपड़ियों के फ्रैक्चर के अध्ययन के बाद, हैदराबाद, पुणे और लंदन में वैज्ञानिकों ने यह निर्धारित किया कि लोग बीमारी से नहीं बल्कि अचानक से आये ओला आंधी से मरे थे। ये ओले, क्रिकेट के गेंदों जितने बड़े थे और खुले हिमालय में कोई आश्रय न मिलने के कारण सभी मर गये। इसके अलावा, कम घनत्व वाली हवा और बर्फीले वातावरण के कारण, कई लाशें भली भांति संरक्षित थी। उस क्षेत्र में भूस्खलन के साथ, कुछ लाशें बह कर झील में चली गयी। जो बात निर्धारित नहीं हो सकी वह है कि, यह समूह आखिर जा कहां रहा था।

वास्तव मे देखा जाय तो लोगों के लिए रूपकुंड और वहां मौजूद नरकंकाल आज भी रहस्य बना हुआ है। मां नंदा की कृपा से मुझे भी इस सुंदर झील और यहां मौजूद नर कंकालो को करीब से देखने का अवसर मिला है। झील को देखकर मैं बहुत रोमांचित हुआ। जबकि आश्चर्य भी हुआ है कि आखिरकार इतनी ऊचांई पर इतने नर कंकाल आखिर आये कहां से…?? जो आज हजारों साल बाद भी रहस्य बना हुआ है।

Topics: Uttarakhand NewsUttarakhand Latest Newsuttarakhand tourismRoopkund LakeMystery of RoopkundMysterious Lake of Uttarakhand
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