महाराष्ट्र

पाञ्चजन्य सुशासन संवाद मुंबई: ‘मराठी हमारी मां, बाकी भाषाएं मौसी’-देवेंद्र फडणवीस, भाषा के आधार पर अत्याचार नहीं

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से पाञ्चजन्य संपादक हितेश शंकर की खास बातचीत। मराठी भाषा विवाद, राज्य का कर्ज-जीडीपी अनुपात 18%, रोजगार, स्टार्टअप और डबल इंजन सरकार पर दो टूक जवाब।

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कुलदीप सिंह

पाञ्चजन्य के सुशासन संवाद मुंबई में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने अहम मुद्दों पर बात की। उन्होंने राज्य में मराठी भाषा को लेकर कुछ लोगों के द्वारा खड़े किए गए विवाद को लेकर दो टूक कहा कि राज्य में भाषा के आधार पर किसी के साथ अत्याचार नहीं होने दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने भाषा के मुद्दे पर स्पष्ट किया कि मराठी हमारी मां है, लेकिन इसके साथ ही बाकी भाषाएं हमारी मौसी हैं।

भाजपा आज 22 राज्यों में है और ये जमीनी मेहनत के बिना संभव नहीं। आप एक प्रचारक के तौर विभिन्न राज्यों में जाते हैं, वापस लौटते ही अपने ही राज्य में भाषा का प्रश्न आता है, जो कि चिंता भी पैदा करता है। भाषा का प्रश्न आपके लिए क्या है?

हमारे लिए भाषा हमेशा संवाद का माध्यम रही है। हम इसे विवाद का माध्यम नहीं मानते। रही बात महाराष्ट्र की तो 2014 से जब से भाजपा ने शासन संभाला है, हमने भाषा के आधार पर महाराष्ट्र में अन्याय नहीं होने दिया। हालांकि, राज्य में कुछ पार्टियां केवल भाषा के आधार पर सियासत करना चाहती हैं। हमारा हमेशा से मानना रहा है कि क्षेत्रीय अस्मिता का सम्मान और हर भाषा का सम्मान होना चाहिए। जहां तक महाराष्ट्र की बात है तो यहां मराठी को प्रधानता दी जाएगी। लेकिन इसके साथ ही दूसरी भाषा बोलने वाले लोगों पर अन्याय नहीं होने देंगे।

इसके अलावा एक बात को अलग ही तरीके से प्रदर्शित किया गया है कि महाराष्ट्र में अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले भाइयों को, जो कि टैक्सी चलाते हैं, रेहड़ी चलाते हैं, इनको कामचलाऊ मराठी सीखना चाहिए। इस मुद्दे पर लोगों ने भ्रम फैलाया कि ऐसे लोगों पर मराठी को लेकर सख्ती की गई है। कुल मिलाकर दो पन्ने का सिलेबस था, जिसमें मामूली बोलचाल की मराठी थी। मुझे इस बात की खुशी है कि मुंबई के टैक्सी यूनियन के हिंदी भाषी लोगों ने इसे पढ़ने में रुचि दिखाई। महाराष्ट्र में जब तक भाजपा की सरकार है, भले ही मराठी का सर्वोच्च सम्मान होगा, लेकिन उसके साथ सारी भारतीय भाषाओं का भी सम्मान होगा।

महाराष्ट्र में सरकार के द्वारा कई सारी कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन, इसके साथ-साथ कर्ज का बोझ भी बढ़ रहा है। अंतत: इसका असर किस पर पड़ेगा? इसको लेकर आपकी क्या योजना है?

हम लोग विकाशशील अर्थव्यवस्था हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था में विकास कार्यों के लिए कर्ज लेना आवश्यक होता है। दो चीजें देखी जाती हैं, पहला-कर्ज को किस पर खर्च किया जा रहा है। दूसरा-जीडीपी के कितने प्रतिशत आपका कर्ज है। आरबीआई ने सभी राज्यों को कहा है कि वो अपनी जीडीपी के 25 प्रतिशत तक का कर्ज वो ले सकते हैं। इससे अधिक होने पर राज्य खतरे में होता है।

महाराष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में देखें तो राज्य की जीडीपी के आधार पर हमारा कर्ज मात्र 18 फीसद है। देश के सभी राज्यों को देखें तो पता चलता है कि महाराष्ट्र और गुजरात ही बस 18 और 19 प्रतिशत पर हैं। बाकि, 23 और 24 प्रतिशत पर हैं। 2013-14 में राज्य का जीडीपी 13 लाख करोड़ था। लेकिन इस साल (2026) वो 54 लाख करोड़ होगा। रही बात कर्ज की तो उस वक्त भी ये 18 प्रतिशत था और आज भी उतने पर ही है। महाराष्ट्र ऐसा राज्य है, जहां इतनी कल्याणकारी योजनाएं चलाने के बाद भी फिस्कल डेफिसिट एक भी वर्ष 3 फीसदी से अधिक नहीं गया। अगर कर्ज ही एकमात्र इंडीकेटर होता तो आज दुनिया में सबसे अधिक कर्ज अमेरिका पर है।

राज्य की जीडीपी के अनुपात में कर्ज 18 प्रतिशत है। क्या ये आंकड़ा और नीचे जाएगा?

इसे नीचे लाया जा सकता है। लेकिन अगले 5-10 साल तक हम इसे नीचे लाने की कोई योजना नहीं बना रहे हैं। क्योंकि, जीडीपी ग्रोथ के साथ हमारी क्षमताएं जितनी बढ़ेंगी, हम उतना कर्ज कैपिटल एक्सपेंडीचर के लिए लेंगे। उसी कर्ज से हम नौकरियां पैदा करेंगे। और ये सारा पैसा सूद समेत अर्थव्यवस्था को वापस मिलेगा।

भाजपा की डबल इंजन की सरकार एक तरफ मोदी जी और दूसरी तरफ देवेंद्र जी, विपक्ष से आप लोग सारे मुद्दे खींच लेते हैं। आप लोग विपक्ष पर इतना अत्याचार क्यों करते हैं?

कायदे से कहें तो हमारा विपक्ष कभी विपक्ष बन ही नहीं पाया, क्योंकि इनकी मानसिकता सामन्तवादी है। ये अपने आपको अधिकारिता से प्रेरित मानते हैं। विपक्षी खुद को राजा मानते हैं और ये कभी भी इस बात को पचा ही नहीं पाए कि ये विपक्ष में हैं। आप देखते हैं कि लोकतंत्र में विपक्ष के पास मुद्दे होते हैं, क्योंकि हम तो अभाव की अर्थव्यवस्था में काम करते हैं। लेकिन विपक्ष कभी भी जनता के मुद्दों को उठा ही नहीं पाया। इन्हें आम आदमी की नब्ज ही नहीं पता।

विकास और निवेश के आंकड़े काफी अच्छे हैं। ऐसे में जितनी राज्य की अर्थव्यवस्था बढ़ी है, क्या उतने रोजगार भी बढ़े हैं? अगर नहीं बढ़ा है तो उसका कारण और उससे कैसे निपटेंगे?

निश्चित रूप से रोजगार बढ़ा है। इसका सूचक है ईपीएफओ। ईपीएफओ के नए अकाउंट कितने खुले हैं, ये इसका मानक है। आप देखेंगे तो पाएंगे कि देश में हर साल सबसे अधिक ईपीएफओ अकाउंट महाराष्ट्र में खुलते हैं। देश में एमएसएमई सेक्टर सबसे अधिक रोजगार देता है। देश के एमएसएमई इंडेक्स में भी महाराष्ट्र नंबर वन पर है। राज्य में एक करोड़ से अधिक एमएसएमई हैं। तीसरी चीज आज स्टार्टअप इको सिस्टम सबसे अधिक रोजगार पैदा कर रहे हैं। स्टार्टअप इंडिया की रिपोर्ट देखेंगे तो पाएंगे कि हर साल महाराष्ट्र देश का स्टार्टअप कैपिटल बना हुआ है।

देश की कुल जनसंख्या का 9 फीसदी जनसंख्या महाराष्ट्र में रहती है। देश का 20 परसेंट यानि हर पाँचवाँ स्टार्टअप महाराष्ट्र में है। देश का 25 फीसदी यूनिकार्न भी महाराष्ट्र से है। रोजगार को जो भी इंडीकेटर हैं, उनमें महाराष्ट्र बहुत अच्छा कार्य कर रहा है। आज हम केवल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में 10 लाख करोड़ से अधिक का कार्य कर रहे हैं। हालांकि, आज युवाओं की संख्या काफी अधिक है और इसलिए चुनौतियां भी अधिक हैं।

रोजगार जब आएंगे तो उसमें स्थानीय स्तर पर क्या चुनौतियां होंगी और आप इसे कैसे देखते हैं?

हमने इस बात को बहुत पहले ही भांप लिया था और इस चुनौती से निपटने के लिए राज्य के सभी आईटीआई संस्थानों को इंडस्ट्री के साथ जोड़ने का काम किया। आप किसी भी इंडस्ट्री से पूछेंगे, तो वे कहते हैं कि हमें काम करने के लिए लोग नहीं मिलते हैं। इसी दूरी को पाटने के लिए हमने आईटीआई को इंडस्ट्री से जोड़ा। राज्य के सभी सरकारी आईटीआई में 100 फीसदी प्लेसमेंट है। इसके अलावा हमने पीएम मोदी के 25 वर्ष के कार्यकाल को लेकर 2000 सेवा संकल्प रोजगार मेला शुरू किया है। इस दौरान एक दिन में करीब 1400 बड़ी इंडस्ट्रीज ने हिस्सा लिया। एक लाख बच्चे आए थे, जिसमें कम से कम 55,000 लोगों को रोजगार मिला। हमने इस मेले के लिए करीब ढाई लाख लोगों का रजिस्ट्रेशन किया है और हमारी कोशिश है कि कम से कम पौने दो लाख को रोजगार दे सकें।

पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में सड़क, यातायात जैसे मुद्दे सामने आते हैं। पुराने क्षेत्रों में योजनाओं में क्या कमी रह गई?

50 साल पहले जिन क्षेत्रों में हमने विकसित किया, जिसमें चाकड़ और हिंजेवाड़ी भी हैं। इन स्थानों पर समस्याएं खड़ी हुई हैं। क्योंकि, जब हम लोग इंडस्ट्रियल स्टेट तैयार करते हैं, तो ये शहर से बाहर किसी ग्राम पंचायत के क्षेत्र में वो बनाई जाती है। एक वक्त ऐसा आता है कि उक्त ग्राम पंचायत की क्षमता उसे मेंटेन कर पाने की नहीं रह जाती है। अब इस समस्या से निपटने के लिए हम लोग एक कानून लाए हैं, जिसमें इंडस्ट्रियल टाउनशिप के तहत लोकल सेल्फ बॉडी में परिवर्तित कर रहे हैं। क्योंकि सामान्यतया ये लोग टैक्स ग्राम पंचायत को देते हैं, लेकिन पंचायत कचरा नहीं उठा पाती है, न पानी और सड़क बना पाती है। इसलिए अब वो उन्हीं के पैसे से उन्हें चलाएं, ऐसा व्यवस्था खड़ी कर रहे हैं।

प्रयोग के तौर पर चाकड़ और हिंजेवाड़ी में करीब 2100 करोड़ के कार्यों को मंजूरी दी गई है। इसके तहत इनके पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को नए में बदलेंगे। इसके बाद चाकड़ को एक नगर का दर्जा मिलेगा। हिंजेवाड़ी को पिंपरी चिंचवड़ महानगर पालिका में शामिल करेंगे।

राजनीति की दृष्टि में आप धर्म और हिन्दुत्व को कैसे देखते हैं?

हमारा विचार हिन्दुत्व है। हमारे नस-नस में हिन्दुत्व है। हमें खुद को हिन्दू कहने में कोई शर्म नहीं है। हिन्दुत्व और कट्टरता, ऐसा इतिहास में कभी नहीं हुआ। ये वो हिन्दू हैं, जिन्होंने दुनिया के दूसरे देशों के पीड़ितों को शरण दी, सम्मान दिया। जैसे पारसियों को एक वक्त ईरान से निकाला गया था और वो भारत आए। टाटा ग्रुप आज देश के विकास में बड़ा मील का पत्थर है। हिन्दू सिहष्णु है और ये हमारे खून में है, लेकिन कोई भी आकर हमें थप्पड़ नहीं मार सकता। जब तक कोई अच्छे से रहेगा तो हम सहिष्णु हैं, लेकिन सामने से हमला किया तो जबाव भी मिलेगा।

लोग कई बार हिन्दुत्व को संकुचित नजरिए से देखते हैं। जिस हिन्दुत्व की हम बात करते हैं, वो केवल पूजा-पाठ करने वाला नहीं है, बल्कि ये हिन्दुत्व भू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रतिपादित करने वाला है। भारत की संस्कृति के जितने भी मानक हैं, उन्हें अपनाता है। फिर चाहे राम जी हों या श्रीकृष्ण हों। आप उन्हें मत मानिए भगवान, लेकिन यहां की संस्कृति के वाहक के तौर पर तो मानना ही पड़ेगा।

नेता वादे बहुत करते हैं। क्या चुनाव में किए गए वादे पूरे किए गए और कितने दिनों में किए जाते हैं, इसकी कोई रिपोर्ट है?

लोकतंत्र में कुछ कमियां है और वो ऐसी हैं कि कई बार राजनेताओं को भी ये मालूम है कि जनता वादों को भूल जाती है। लेकिन 2014 में हमारी सरकार आई थी, उस दौरान हमने एक संकल्प पत्र जारी किया था। उसके बाद 2019 के चुनाव के दौरान हमने अपने पुराने संकल्प पत्र में किए गए वादे को रखा और दूसरी तरफ कितने वादों को पूरा किया उसे रखा। हमने 99 फीसदी वादों को पूरा किया था। 2024 में भी हमने जनता के सामने बताया कि हमने क्या-क्या किया है। इस बार हमने जो वादे किए थे उसमें से 40 फीसदी को हम पहले ही पूरा कर चुके हैं।

लाडली बहन योजना को अच्छा रिस्पॉन्स मिला। लेकिन, जब सत्यापन हुआ तो पहले ही चरण में बहुत सारे लोग बाहर हो गए। क्या जब कोई योजना लॉन्च होती है तो पात्रता की जांच उस समय नहीं हो सकती है?

जब भी कोई योजना घोषित होती है तो साथ ही पात्रता भी घोषित की जाती है। ये बहुत ही बड़ी और विस्तृत योजना थी। हमें पता था कि इसकी पात्रता को स्थापित करने के लिए 7-8 माह लगने वाले हैं। हमने सेल्फ सर्टिफिकेशन को मान्य करने का फैसला किया था। इसके तहत अगर कोई भी इंसान अगर अपने सर्टिफिकेट के आधार पर ये कहता है कि वो पात्र है, तो हमने उसे फायदा देना शुरू किया था। लेकिन, इसके साथ ही हमने सत्यापन भी शुरू किया था, जिसमें पता चला था कि कुछ स्थानों पर बहनों की जगह भाईयों ने ही आवेदन कर दिया था। उनसे हमने वसूली की। सरकारी कर्मियों के परिवारों को बाहर किया।

हमने करीब 56 लाख किसानों को कर्जों को भी माफ किया। अभी तक 20 लाख किसानों के अकाउंट में पैसा पहुंच चुका है और अभी भी जा रहा है। किसानों को फ्री बिजली देने के साथ ही उनके पुराने बिलों (50 हजार करोड़) को माफ कर दिया है।

जब सरकार गठबंधन की होती है तो दो अलग-अलग बयान हो सकते हैं। जनता किस बात को माने कि वादे और इरादे में अंतर नहीं है?

गठबंधन (गठ और बंधन) पार्टियों का है। इसमें बंधन तो है ही। जो पार्टी लीड करती है तो उसकी ये जिममेदारी होती है कि कोई भी घोषणा वो सहयोगियों को विश्वास में लेकर करे। हमने जितनी भी घोषणाएं की हैं, एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा ताई को विश्वास में लेकर की हैं। सरकार में मुख्यमंत्री का ही बयान आधिकारिक होता है।

शिवाजी महाराज के प्रतिकूल माहौल में दिखाए गए शौर्य को वामपंथी इतिहासकारों ने कमतर करने की धृष्टता की। आप इस षड्यंत्र को कैसे देखते हैं?

अंग्रेज चाहते थे कि हमारा शौर्य, ओज और तेज समाप्त हो जाए, इसके लिए हमारे नायकों के इतिहास को कुचलने का काम अंग्रेजों ने किया था। अपेक्षा थी कि देश आजाद होने के बाद सच्चा इतिहास सामने आएगा, लेकिन कांग्रेस ने वामपंथी और चाटुकार इतिहासकारों को इतिहास लिखने के लिए रखा। ऐसे में कम से कम 50 साल तक एनसीईआरटी की किताब में 12 पन्ने मुगलों पर ही पढ़ने को विवश थे। जबकि, क्षत्रपति शिवाजी महाराज ने न केवल मुगलों को समाप्त कर हिंदवी स्वराज स्थापित किया था, बल्कि ऐसी व्यवस्था की कि अगल 100 साल तक हिंदवी स्वराज को रखा।

असली इतिहास को हमसे छुपाकर क्षत्रपति शिवाजी महाराज के पूरे चरित्र को एक पन्ने में समेटने का पाप कांग्रेसियों औऱ वामपंथियों ने किया। मोदी सरकार को धन्यवाद कि अब मुगलों के लिए बड़ी जगह नहीं बची। अब मुगलों को 2 पन्नों में समेट दिया गया है।

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