पांञ्चजन्य के सुशासन संवाद मुंबई में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य वी भगैय्या जी से विभिन्न मुद्दों पर चर्चाएं की। उन्होंने कहा कि भारत को विश्वगुरू बनने से पहले विश्व बंधुत्व स्थापित करना होगा।
हाल ही में सरसंघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का विदेश प्रवास हुआ था। इसे किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्या संघ अब विदेशों में रहने वाले भारतीयों से संपर्क बढ़ा रहा है या भारतीय सभ्यता को देखते हुए व्यापक दृष्टिकोण के साथ काम कर रहा है?
उन्होंने कहा कि भारत को विश्वगुरू बनने से पहले विश्व बंधुत्व स्थापित करना होगा। वह कहते हैं कि ऐसा ही हमारे पूर्वजों में भी किया था। सारे देशों से मित्रता करनी है। इस यात्रा का लाभ भी हमें मिल रहा है। आज दुनिया में हिंसा नहीं प्रेम की आवश्यकता है। दुनिया को परस्पर सहकारिता और पूरकता की जरूरत है।
विदेशों में भारत की तरह संघ की शाखाएं नहीं चलती। वहां अलग-अलग संगठन इस तरह के कार्य करते हैं। ऐसे में इन संगठनों का मूल उद्देश्य क्या है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व के किसी भी अन्य देश में कार्य नहीं करता है। ये केवल भारत तक ही सीमित है। लेकिन, दुनिया के जिन भी देशों में हिन्दू हैं, वहां उन्होंने हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए संगठन बनाए हैं। हालांकि, विदेशों में जाने के बाद भी वहां हिन्दुओं ने भाषा और रहन-सहन के हिसाब से अलग-अलग संगठन बना रखे हैं। इसके अलावा संघ चाहता है कि अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश में काम करता है तो वो उसकी कर्मभूमि है और उसे उसके प्रति समर्पित होकर कार्य करना चाहिए। वहां के हिन्दू एक होकर जीने की ही अपेक्षा रखते हैं। हां, चूंकि ये अप्रवासी भारतीयों की मातृभूमि है और उसके प्रति संवेदना बनी रहेगी, संघ केवल इतनी ही अपेक्षा रखता है।
हिन्दू समाज को विदेशों में एक अलग ही सम्मान से देखा जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिन्दू परिश्रमी है, ईमानदार है और हिंसा कभी नहीं करता है।
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका-ब्रिटेन समेत कई देशों में संघ और हिन्दुत्व की आलोचनाएं बढ़ी हैं। वहां अल्पसंख्यकों, हिन्दू राष्ट्र, जाति और राजनीति की बात होती रही है। इन आलोचनाओं में कौन से प्रश्न गंभीर विमर्श की मांग करते हैं?
विदेशों में संघ और हिन्दुत्व का नाम पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों को देखें तो इसकी जड़ भारत में है। असल, में यहीं के वो लोग, जो अपनी राजनीति या किसी अन्य मुद्दे को लेकर विदेशों में जाते हैं और ‘संघ भारत में अल्पसंख्यकों के विरोध में कार्य करता है’, जैसे नरैटिव चलाते हैं। जबकि, सत्य यह है कि जहां हिन्दू बहुसंख्यक हैं, वहां अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं। और जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हैं,वहां हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि हिन्दुत्व किसी के विरोध में नहीं है। भारत का जो हिन्दुत्व है, उसमें जन्म से किसी भी तरह की विषमता में हम विश्वास नहीं करते हैं। ऐसा किसी भी शास्त्र में नहीं लिखा है।
ऐसे में विदेशों में हिन्दुत्व के खिलाफ जो नरैटिव चलाया जा रहा है, उसे ध्वस्त करने के लिए हिन्दुत्व के विषय में बताना आवश्यक है। हालांकि, अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम पर विदेशों में कभी भी हमने प्रयास नहीं किया। हां वहां प्रवास पर जाते हैं। हिन्दुत्व बताता है कि किसी भी भगवान की पूजा करो, सदाचार के बिना मोक्ष बिल्कुल नहीं मिलेगा। इसलिए, भगवान पर भरोसा नहीं करने वाला भी अगर सदाचार करता है तो उसे भी मोक्ष मिलता है। यही हिन्दुत्व है।
कुछ प्रश्न बार-बार उठाए जाते हैं, स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की भूमिका, महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध, संविधान की बात होती है। क्या शताब्दी वर्ष पर ऐसा नहीं किया जा सकता है कि इन सभी प्रश्नों के उत्तरों को प्रमाण सहित ऐतिहासिक रूप से प्रस्तुत किया जाय, ताकि बहस प्रमाणिक हो?
सोए और जागे हुए को उठाया जा सकता है। लेकिन, ऐसे व्यक्तियों को कभी नहीं उठाया जा सकता है, जो सोने का नाटक करते हों। कुछ लोग निहित स्वार्थ, विदेशों से प्रेरित होने के कारण इस तरह के सवाल करते हैं। पिछले 50 साल में संघ ने अस्पृष्यता जैसी बुराइयों से उन्मूलन के लिए कार्य किया है। धर्म श्रेष्ठ है। धर्म यानि समानता, प्रेम और करुणा। हमें लोगों के हृदय में परिवर्तन लाने का लंबा रास्ता तय करना है।
संघ में एक प्रश्न महिलाओं को लेकर पूछा जाता है। आज अगर हम देखें तो महिलाओं की संगठनात्मक और निर्णयकारी भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
संघ व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है पुरुषों में। महिलाओं में यह कार्य राष्ट्र सेविका समिति करती है। संघ जो कार्य करता है, उसमें खेल और भाग दौड़ होती है। पुरुष और महिला मिलकर करना संभव नहीं है। इसीलिए दोनों के लिए स्वतंत्र संगठन है। दूसरी बात ये कि भारत की महिला केवल महिला नहीं है, बल्कि मातृमूर्ति है। संघ के विभिन्न संगठनों में आज महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं। भारत के समाज में महिलाओं पर प्रतिबंधों की शुरुआत मध्य युगीन कालखंड में आया है, जब विदेशियों ने देश पर आक्रमण किए। उदाहरण के तौर पर आज भी मेघालय में कोच जनजाति की महिलाओं का भी उपनयन संस्कार होता है।
ये सच है कि समाज में विकृति आई है, लेकिन महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए संघ के स्वयंसेवक विवध क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं।
आज का युवा 100 साल पहले के युवा से अलग है, वो सवाल करता है और प्रमाण भी मांगता है। ऐसे युवाओं को संघ ऐसा क्या दे सकता है और नई पीढ़ी संघ में क्या परिवर्तन ला सकती है?
आज के युवा प्रश्न करते हैं और पहले के युवा प्रश्न नहीं करते थे, ये धारणा ही गलत है। उपनिषदों को देखें तो उसमें सवाल ही किए जाते हैं कि ऐसा क्यों? ये भारत की परंपरा रही है। बीच के कालखंड में सवालों को दबाया गया। भारतीय परंपरा में प्रमाण मांग जाते थे और आज प्रमाण लैब में मिलते हैं। उस समय प्रमाण अनुभूति का था।










