भारत माता की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा देने वाले श्री अशोक सिंहल का व्यक्तित्व एक संत जैसा था। वे धर्म और संस्कृति के जितने गहरे ज्ञाता थे, उतने ही प्रखर वक्ता भी। उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी और अद्भुत संगठन क्षमता से श्रीराम जन्मभूमि जैसे अनेक आंदोलनों को जन-जन तक पहुंचाया। आज श्रीराम जन्मभूमि पर जो भव्य और दिव्य मंदिर खड़ा है, उसकी नींव में अशोक जी का तप, त्याग और संघर्ष भी समाहित है।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं, जो केवल अपने समय को प्रभावित नहीं करते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विचार, एक दिशा और एक आंदोलन की विरासत छोड़ जाते हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के इतिहास में ऐसा ही एक विराट नाम है-युगदृष्टा श्री अशोक सिंहल का। उनके बिना इस ऐतिहासिक आंदोलन की कल्पना करना कठिन है। अशोक जी केवल एक संगठनकर्ता नहीं थे। वे संत शक्ति, समाज शक्ति और संगठन शक्ति को एक सूत्र में पिरोकर व्यापक जनचेतना का निर्माण करने वाले आंदोलन-पुरुष थे। उन्होंने धार्मिक आस्था को सामाजिक जागरण से, सामाजिक जागरण को जनशक्ति से और जनशक्ति को राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का अद्भुत कार्य किया। राम जन्मभूमि से लेकर रामसेतु, अमरनाथ से गंगा, कन्वर्जन-विरोध से सामाजिक समरसता और गो-संरक्षण से भारतीय ज्ञान परंपरा तक उनका कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक था। उनका जीवन राष्ट्रीय और सांस्कृतिक उद्देश्य के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है।
संघ से संबंध
उनका जन्म 27 सितंबर, 1926 को हुआ। 1950 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अभियांत्रिकी की शिक्षा के दौरान वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और आगे चलकर पूर्णकालिक प्रचारक बने। इसके बाद उनका पूरा जीवन भारत माता की सेवा में ही बीरता। 1981 में उन्हें विश्व हिंदू परिषद के कार्य में लगाया गया और शीघ्र ही उन्होंने संगठन को व्यापक जनजागरण का माध्यम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी-संगठन को आंदोलन और आंदोलन को जनशक्ति में बदलने की क्षमता। वे संतों को जोड़ते थे, कार्यकर्ताओं को तैयार करते थे, समाज के विभिन्न वर्गों तक नियमित रूप से पहुंचते थे और किसी विषय को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने की रणनीति पर काम करते थे। यही कारण है कि बाद के वर्षों में उन्हें रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख वास्तुकारों में गिना गया।
संत और समाज का एकीकरण
भारत में धार्मिक नेतृत्व सदैव समाज की चेतना को प्रभावित करता रहा है। अशोक जी की सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक उपलब्धियों में से एक थी-संत समाज को आंदोलन की केंद्रीय शक्ति बनाना और इस महान शक्ति को आधुनिक संगठनात्मक ढांचे से जोड़ना।
1989 में प्रयागराज में हुई धर्म संसद में लगभग 3,000 संत-महंत और धर्माचार्य सम्मिलित हुए। कहा जाता है कि राम मंदिर का मॉडल इसी में स्वीकार किया गया। रामशिला पूजन को गांव-गांव तक ले जाने का निर्णय हुआ और रामजन्मभूमि के प्रश्न को उत्तर प्रदेश की सीमा से निकालकर देशव्यापी आंदोलन बनाने की दिशा तय हुई। यह उनका एक असाधारण संगठनात्मक प्रयोग था। एक मंदिर का प्रश्न गांव की चौपाल तक पहुंचा। एक धार्मिक प्रतीक सामाजिक एकता का माध्यम बना। एक स्थानीय विवाद राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का विषय बना। यही वह बिंदु था, जहां अशोक जी की संगठनात्मक क्षमता सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।
जन-आंदोलनों की परंपरा
अशोक जी अयोध्या से अमरनाथ, रामसेतु से सामाजिक समरसता तक राष्ट्र को सांस्कृतिक सूत्र में पिरोने वाले महान आंदोलन-पुरुष थे। उन्हें केवल श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के नेता के रूप में देखना उनके विराट कार्यक्षेत्र को बहुत छोटा कर देना होगा। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि, रामसेतु, अमरनाथ यात्रा, कन्वर्जन-विरोध, घरवापसी, गो-संरक्षण, गंगा और तीर्थ संरक्षण, सामाजिक समरसता, जनजातीय समाज के उत्थान तथा उत्तर और दक्षिण भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ने के लिए अनेक अभियान चलाए।
रामजन्मभूमि आंदोलन
अशोक जी का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक योगदान रामजन्मभूमि आंदोलन के संगठन और विस्तार का था। 1984 में दिल्ली में प्रथम धर्म संसद के आयोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। विभिन्न संप्रदायों के संतों और धर्माचार्यों को एक मंच पर लाकर उन्होंने रामजन्मभूमि के प्रश्न को व्यापक हिंदू समाज के सामने रखा। इसके बाद आंदोलन धीरे-धीरे स्थानीय विवाद से राष्ट्रीय जनआंदोलन में परिवर्तित हुआ। रामशिला पूजन, शिलान्यास, कारसेवा, 13 कोटि विजय महामंत्र के जाप, हनुमत शक्ति जागरण अभियान-इन सबको एक व्यापक संगठनात्मक अभियान में बदलने में उनकी केंद्रीय भूमिका रही। इसके लिए उन्होंने अलग-अलग परंपराओं, अखाड़ों, मठों और संतों को एक मंच पर लाकर इसे एक व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक जनआंदोलन का स्वरूप दिया। दशकों तक चले इस आंदोलन में उन्होंने राजनेताओं और राजनीतिक दलों का सहयोग तो लिया, किंतु उसकी कमान कभी उनके हाथों में नहीं दी। उनके नेतृत्व, पूज्य संतों के मार्गदर्शन तथा रामभक्तों के संघर्ष के कारण ही आज श्रीरामलला अपनी जन्मभूमि पर बने एक गौरवशाली, भव्य और दिव्य मंदिर में विराजमान हैं।
रामसेतु आंदोलन
माता सीता के अपहरण के पश्चात राम सेना को लंका ले जाने के लिए भारत और श्रीलंका के मध्य बनाए गए श्रीरामसेतु की रक्षा के लिए हुआ आंदोलन भी अशोक जी के कार्य का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। 2007 में केंद्र और तमिलनाडु सरकार की ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ कही जाने वाली सेतु-समुद्रम परियोजना के संदर्भ में रामसेतु की रक्षा का प्रश्न भी राष्ट्रीय आंदोलन बना। 26 अगस्त, 2007 को रामेश्वरम् में बड़ी सभा हुई, जिसमें दक्षिण भारत के राज्यों-तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से बड़ी संख्या में रामभक्तों के साथ विभिन्न क्षेत्रों के संत और धार्मिक नेता भी सम्मिलित हुए। इसके बाद 12 सितंबर, 2007 को उनके द्वारा देशभर में एक साथ केवल दो घंटे के चक्का जाम की घोषणा ने पूरे देश में हजारों स्थानों पर सड़क और रेल यातायात पूरी तरह ठप कर दिया और केंद्र सरकार का सिंहासन डोलने लगा। इसके बाद रही-सही कसर रामसेतु शिला पूजन यात्राओं ने पूरी कर दी, जो देश के लगभग 97,000 गांवों और कस्बों तक पहुंचीं। अंततः देश के दक्षिणी छोर पर स्थित रामसेतु पूरे भारत का प्रश्न बन गया।
अमरनाथ यात्रा आंदोलन
बाबा अमरनाथ की यात्रा और उससे जुड़े अधिकारों का प्रश्न भी उनके नेतृत्व में व्यापक जनचेतना का विषय बना। उनका मानना था कि अमरनाथ केवल जम्मू-कश्मीर का तीर्थ नहीं है; करोड़ों हिंदुओं के लिए यह अखिल भारतीय तीर्थ है। चाहे 90 के दशक में आतंकवादियों द्वारा अमरनाथ यात्रा को रोकने हेतु दी गई धमकी का बजरंग दल द्वारा दिया गया करारा जवाब हो या बाबा अमरनाथ की भूमि पर सरकारी संरक्षण में किए गए अवैध कब्जों का प्रश्न-उन्होंने संतों और समाज के नेतृत्व में एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया, जिसके समक्ष तत्कालीन सरकार और आतंकियों दोनों को झुकने को मजबूर होना पड़ा। उनका मत था कि तीर्थ किसी राज्य की सीमा में बंद नहीं होता; वह पूरे समाज की सांस्कृतिक धरोहर होता है।
कन्वर्जन के विरुद्ध अभियान
अशोक जी के जीवन में कन्वर्जन-विरोधी अभियान का एक निर्णायक मोड़ 1981 का मीनाक्षीपुरम प्रकरण था। तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में बड़े पैमाने पर कन्वर्जन की घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने केवल विरोध का रास्ता नहीं चुना, बल्कि उन सामाजिक कारणों को समझने और दूर करने पर भी बल दिया, जिनका उपयोग कन्वर्जन के लिए किया जा रहा था। वंचित क्षेत्रों में उन्होंने पिछड़े समाज के लिए सैकड़ों मंदिरों और सेवा केंद्रों का निर्माण कराकर एक व्यापक सामाजिक संपर्क अभियान चलाया, जो देश के ऐसे अनेक अनुसूचित जाति और जनजाति बहुल क्षेत्रों में अभी तक जारी है। उनका स्पष्ट मानना था कि कन्वर्जन का स्थायी समाधान केवल विरोध नहीं, बल्कि सम्मान, समानता, शिक्षा, स्वावलंबन और समाज के साथ आत्मीय एकात्मता है।
सामाजिक समरसता
अशोक जी हिंदू समाज की आंतरिक विषमताओं को लेकर भी बहुत गंभीर थे। उनका मानना था कि यदि समाज जाति, अस्पृश्यता और सामाजिक विषमता में बंटा रहेगा तो बाहरी चुनौतियों का सामना प्रभावी ढंग से नहीं कर पाएगा। वरिष्ठ और श्रेष्ठ पूज्य संतों की उपस्थिति में 1989 के श्रीराम मंदिर का शिलान्यास दलित समाज से आने वाले श्री कामेश्वर चौपाल के कर कमलों से कराने की घटना ने सामाजिक समरसता का विशेष संदेश दिया।
13-14 दिसंबर, 1969 की उडुपी धर्म संसद में प्रमुख संतों के मुखारविंद से “हिंदव: सोदरा सर्वे, न हिंदू पतितो भवेत” की घोषणा से प्रेरणा लेकर 1994 में काशी की धर्म संसद में संतों के बीच डोम राजा की उपस्थिति की बात हो, वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी और पिछड़ी जाति के हजारों लोगों को ग्राम पुजारी के रूप में प्रशिक्षण देने की बात हो, संगठन द्वारा देशभर में भगवान वाल्मीकि, संत रविदास और डॉ. आंबेडकर आदि महापुरुषों की जयंती व्यापक रूप से मनाने की बात हो या ‘एक गांव-एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान’ का महामंत्र-समरस समाज के बारे में उनकी सोच बड़ी स्पष्ट थी। उन्होंने सामाजिक सम्मान और सहभागिता के आंदोलन के माध्यम से हिंदू एकता को मजबूत करने का प्रयास किया।
उत्तर-दक्षिण की दूरी पाटना
अशोक जी के कार्य का शायद सबसे महत्वपूर्ण और कम चर्चित आयाम था-भारत की सांस्कृतिक एकात्मता को व्यवहार में उतारना। उनका कोई आंदोलन केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। श्रीराम जन्मभूमि उत्तर भारत में थी तो रामसेतु दक्षिण में। अमरनाथ उत्तर के हिमालय में था तो मीनाक्षीपुरम तमिलनाडु में। गंगा हिमालय से निकलती है तो जनजातीय और दूरस्थ क्षेत्रों का विस्तार पूरे देश में है। सांस्कृतिक एकात्मता के उनके इन आंदोलनों ने ही अयोध्या को दक्षिण में, रामसेतु को उत्तर भारत में तथा श्री अमरनाथ को पूरे भारत की आस्था के केंद्र में ला दिया।
गो-रक्षा आंदोलन
अशोक जी गो-रक्षा, गो-संरक्षण और गो-पालन को हिंदू समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक चेतना से जोड़कर देखते थे। उनके नेतृत्व में गो-रक्षा के लिए भी अनेक आंदोलन हुए। गो भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और पारंपरिक जीवन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए एक कठोर देशव्यापी कानून बनाने हेतु अनेक प्रयास किए। उन्हीं का परिणाम है कि आज दर्जन भर से अधिक राज्यों में गोवध के विरुद्ध कठोर कानून लागू हैं तथा सैकड़ों गोशालाओं को सरकार द्वारा अनुदान दिया जा रहा है। साथ ही इस पवित्र कार्य में सामाजिक जागरूकता और सहभागिता दोनों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है।
प्रकृति को जोड़ा संस्कृति से
उनकी चिंता केवल मंदिरों और तीर्थों तक सीमित नहीं थी। उनके आंदोलनों में देवप्रयाग से गंगा तक के संरक्षण हेतु किए गए प्रयासों का भी उल्लेख आता है। वे कहते थे कि भारतीय परंपरा में नदी केवल जल का स्रोत नहीं है; वह संस्कृति, सभ्यता और जीवन की धारा है। इसलिए गंगा-रक्षा को उन्होंने केवल पर्यावरणीय प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय, धार्मिक और सांस्कृतिक दायित्व के रूप में देखा। गंगा रक्षा के लिए भी उन्होंने एक बड़ा आंदोलन चलाया। उन्होंने गो, गंगा और गायत्री की रक्षा हेतु भी एक साथ आह्वान किया था।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण
अशोक जी बौद्धिक आंदोलनों के भी पारंगत महापुरुष थे। उनका वेदों और संस्कृत के प्रचार-प्रसार के प्रति विशेष अनुराग था। संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के लिए उन्होंने प्रयागराज में अपनी करोड़ों रुपए की पूरी कोठी ही समर्पित कर दी, जिसमें आज तक वेद विद्यालय चल रहा है। उनकी दृष्टि में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ केवल अतीत का गौरवगान नहीं था; भारतीय ज्ञान, भाषा, परंपरा और आध्यात्मिक चिंतन को आधुनिक समाज में पुनः प्रतिष्ठित करना भी उसका आवश्यक हिस्सा था। भारत संस्कृत परिषद, वेद विश्वविद्यालयों तथा गुरुकुलीय शिक्षा को उन्होंने एक आंदोलन के रूप में लिया, जिनके परिणाम अब समाज में आने प्रारंभ हो गए हैं।
हिंदू का धन हिंदू के लिए
उन्होंने हिंदू मंदिरों को सरकारों के नियंत्रण से मुक्ति दिलाने के लिए भी कई आंदोलन किए तथा समय-समय पर सरकारों और न्यायालयों में भी अपना और हिंदू समाज का पक्ष दृढ़ता से रखा। अशोक जी की कार्यशैली को तीन शब्दों में समझा जा सकता है-संत शक्ति, समाज शक्ति और संगठन शक्ति। उन्होंने विभिन्न संप्रदायों और परंपराओं के संतों को एक मंच पर लाने का लगातार प्रयास किया। उन्होंने आंदोलन को केवल नेताओं तक सीमित नहीं रखा। गांव, कस्बे, युवा, महिलाएं, सामान्य परिवार और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग तक पहुंच बनाई। उन्होंने भावनात्मक आस्था को व्यवस्थित संगठन और अनुशासित जनभागीदारी में बदलने का प्रयास किया। यदि उनके पूरे जीवन को एक सूत्र में बांधना हो तो वह सूत्र है-भारत को उसकी सांस्कृतिक आत्मा के आधार पर जोड़ना।
उन्होंने अलग-अलग मुद्दों को अलग-अलग संघर्ष के रूप में नहीं देखा। राम उत्तर और दक्षिण को जोड़ते हैं। गंगा हिमालय और मैदानों को जोड़ती है। अमरनाथ कश्मीर को कन्याकुमारी से जोड़ता है। रामसेतु भारत को श्रीलंका से जुड़े रामायण के सांस्कृतिक आख्यान से जोड़ता है। मीनाक्षीपुरम सामाजिक न्याय और धार्मिक पहचान के प्रश्न को जोड़ता है। सामाजिक समरसता हिंदू समाज के भीतर की दूरियां मिटाने का एक आवश्यक प्रयास है। उनके जीवन का संदेश शायद यही था कि आंदोलन किसी एक स्थान या किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए नहीं, बल्कि समाज की चेतना के लिए होता है; और जब चेतना जागती है, तो भूगोल की सीमाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। ऐसे ही कार्य करते हुए वे 17 नवंबर, 2015 को इस दुनिया से प्रस्थान कर गए। ऐसे युगदृष्टा, ऐसे आंदोलन-पुरुष, ऐसे महात्मा को उनकी जन्मशताब्दी पर कोटि-कोटि नमन।

















