यह श्लोक आधुनिक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘राष्ट्रभारती’ से उद्धृत है। इसकी रचना महान विद्वान एवं राष्ट्रभक्त कवि डॉ. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी द्वारा राष्ट्र-चेतना को जगाने के उद्देश्य से की गई है।
श्लोक :
अकृत्वा धीरवीराणां महासंघटनं दृढम्।
केन राष्ट्रं परायत्तं स्वायत्तीकृतमात्मनः॥
भावार्थ :
अपने देश (राष्ट्र) में निवास करने वाले धैर्यवान् और वीर पुरुषों का एक सुदृढ़ एवं महान् संगठन बनाए बिना किसने भला पराधीन या गुलाम राष्ट्र को स्वतंत्र (स्वाधीन) किया है? अर्थात बिना संगठित शक्ति के राष्ट्र की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा संभव नहीं है।
आज के समय में प्रासंगिकता (Relevance Today)
यद्यपि यह श्लोक ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्रता संग्राम और संगठित शक्ति के महत्व को दर्शाता है, लेकिन आज के आधुनिक भारत और वैश्विक परिदृश्य में भी इसकी प्रासंगिकता उतनी ही गहरी है:
राष्ट्रीय सुरक्षा एवं अखंडता: आज के समय में देश के सामने बाहरी और आंतरिक कई चुनौतियां (जैसे साइबर हमले, आतंकवाद और अलगाववाद) हैं। इनका सामना करने के लिए देश के नागरिकों और सुरक्षा बलों का मानसिक एवं वैचारिक रूप से एकजुट होना अनिवार्य है।
सामाजिक एकता: जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बँटे समाज का विकास संभव नहीं है। समाज के ‘धीर और वीर’ (सकारात्मक सोच रखने वाले बुद्धिजिवी, युवा और कर्मठ लोग) जब तक एकजुट नहीं होंगे, तब तक देश आंतरिक रूप से मजबूत नहीं बन सकता।
वैश्विक मंच पर आत्मनिर्भरता: यह श्लोक आज के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प से सीधे जुड़ता है। आर्थिक, तकनीकी और सामरिक दृष्टि से समर्थ बनने के लिए देश के नागरिकों का संगठित होकर प्रयास करना आवश्यक है।

















