गुजरात के मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकार हसमुख अढ़िया लंबे प्रशासनिक अनुभव वाले पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह हैं। साबरमती संवाद में उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल, क्षेत्रीय संतुलन, जीएसटी, रोजगार, आर्थिक चुनौतियों, प्रशासनिक सुधार और युवाओं के लिए कर्मयोग पर वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा के साथ विस्तार से बात की। प्रस्तुत हैं उसके संपादित अंश
इस समय दुनिया गंभीर आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे दौर में ब्रिक्स में भारत की भूमिका और हालिया घोषणाओं को आप किस रूप में देखते हैं? विशेष रूप से गुजरात जैसे बड़े विनिर्माण राज्य के लिए इससे किस तरह के अवसर पैदा हो सकते हैं?
ब्रिक्स सम्मेलन में अंतिम घोषणा-पत्र को सर्वसम्मति से स्वीकार कराना भारत की बड़ी उपलब्धि है। मौजूदा संघर्षों, आर्थिक अनिश्चितताओं और बढ़ते संरक्षणवाद के बीच ब्रिक्स विकासशील देशों का दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखने का महत्वपूर्ण मंच है। इसमें शामिल देशों की हिस्सेदारी विश्व जीडीपी में करीब 40 प्रतिशत है। ब्रिक्स सहयोग से राज्यों के लिए भी नए अवसर पैदा होंगे। गुजरात को विशेष लाभ मिल सकता है, क्योंकि राज्य की करीब 36 प्रतिशत जीडीपी विनिर्माण क्षेत्र से आती है और देश के कुल विनिर्माण उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत है। व्यापार और निर्यात बढ़ने के साथ-साथ सेमीकंडक्टर, नवाचार और नई तकनीकों में सहयोग से गुजरात को फायदा होगा।
गुजरात को भारत का ‘ग्रोथ इंजन’ क्यों कहा जाता है? ‘डबल इंजन’ सरकार से राज्य के विकास को कितना लाभ मिला है और 2047 तक गुजरात के सामने कौन से लक्ष्य हैं?
गुजरात देश की करीब 5 प्रतिशत आबादी और 6 प्रतिशत क्षेत्रफल के बावजूद जीडीपी में 8.3 प्रतिशत योगदान देता है। 2025-26 में राज्य की जीडीपी लगभग 29 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो 2001 की तुलना में करीब 20 गुना अधिक है। इसलिए गुजरात को भारत का ‘ग्रोथ इंजन’ कहा जा सकता है। हमारा लक्ष्य राज्य को विकसित बनाना है। जब जीडीपी 25 वर्ष में 20 गुना बढ़ सकती है, तो अगले 20 वर्ष में इसे 10 गुना या उससे अधिक बढ़ाने की क्षमता भी गुजरात में है। राजनीतिक स्थिरता और केंद्र-राज्य समन्वय ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2047 तक अर्थव्यवस्था को 3.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लिए राज्य ने स्पष्ट रणनीति बनाई है। इसके तहत ‘विजन 2047 गुजरात’ में 55 क्षेत्रों के लिए 726 हस्तक्षेप और करीब 1,100 प्रदर्शन संकेतक तय किए गए हैं, जिनकी वार्षिक समीक्षा होती है। छह क्षेत्रों के लिए अलग-अलग आर्थिक विकास योजनाएं भी बनाई गई हैं। गुजरात का विकास किसी एक योजना या एमओयू का नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता, संस्थागत व्यवस्था, बेहतर समन्वय और दीर्घकालिक रणनीति का परिणाम है।

गुजरात के विकास का केंद्र लंबे समय तक अमदाबाद-वडोदरा-सूरत जैसे क्षेत्र रहे हैं। अब इस विकास को राज्य के दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए क्या रणनीति अपनाई जा रही है?
संतुलित विकास के लिए हर क्षेत्र को मजबूत बुनियादी ढांचे और बेहतर कनेक्टिविटी से जोड़ना जरूरी है। गुजरात में सड़कों और बंदरगाहों के विकास से दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंच आसान हुई है। कच्छ इसका उदाहरण है। 2001 के भूकंप के बाद बड़े उद्योगों और कारखानों की स्थापना से वहां आर्थिक गतिविधियां बढ़ीं और राज्य की जीडीपी में कच्छ की हिस्सेदारी करीब 5-6 प्रतिशत हो गई। क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए छह क्षेत्रीय ‘वाइब्रेंट गुजरात’ सम्मेलन आयोजित किए गए। इनके माध्यम से वडोदरा, राजकोट, मेहसाणा और सूरत जैसे क्षेत्रों के उद्यमियों, स्टार्टअप और एमएसएमई को निवेश और नए अवसरों से जोड़ा गया। शिक्षा के क्षेत्र में भी विकेंद्रीकरण पर जोर है। वडोदरा में केंद्रीय विश्वविद्यालय और अहमदाबाद-गांधीनगर से बाहर गुजरात ट्रिपल आईटी की स्थापना इसी दिशा में कदम है। इस तरह बुनियादी ढांचे, उद्योग, उद्यमिता और शिक्षा के माध्यम से गुजरात के संतुलित क्षेत्रीय विकास को गति दी जा रही है।
गुजरात के विकास मॉडल में ब्यूरोक्रेसी की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं? राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन के बीच किस प्रकार का तालमेल जरूरी है?
विकास के लक्ष्यों को लेकर राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन में मतभेद नहीं होना चाहिए। मतभेद केवल क्रियान्वयन की रणनीति पर हो सकते हैं। राजनीतिक नेतृत्व दिशा और लक्ष्य तय करता है, जबकि ब्यूरोक्रेसी उन्हें जमीन पर उतारने का काम करती है। अधिकारियों को काम करने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। सक्रिय, संवेदनशील और देशहित के प्रति प्रतिबद्ध अधिकारी नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू कर बड़ा बदलाव ला सकते हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं कि ब्यूरोक्रेसी सरकार चलाती है। वह सरकार की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जीएसटी को लागू करना एक बड़ा प्रशासनिक और आर्थिक बदलाव था। इसे लागू करने के दौरान क्या प्रशासनिक स्तर पर असहमति या कोई बड़ी चुनौती सामने आई थी?
जीएसटी लागू करने की राजनीतिक इच्छा स्पष्ट थी, जबकि मेरी जिम्मेदारी उसे प्रशासनिक रूप से लागू करना था। प्रारंभिक लक्ष्य 1 अप्रैल 2017 था, लेकिन प्रशासनिक तैयारियों के कारण मैंने अतिरिक्त समय मांगा। इसके बाद जीएसटी 1 जुलाई 2017 को लागू हुआ। नई व्यवस्था की शुरुआत में कुछ अव्यवस्था स्वाभाविक थी। जीएसटी में भी शुरुआती समस्याएं आईं, जिन्हें कानून, नियम और सर्कुलर में बदलाव करके दूर किया गया। धीरे-धीरे व्यवस्था सुचारु हुई और लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया।
वाइब्रेंट गुजरात निवेश सम्मेलनों के माध्यम से बड़े पैमाने पर एमओयू हुए हैं। इनमें से कितने एमओयू वास्तव में जमीन पर उतर पाए हैं और इस प्रक्रिया का मूल्यांकन आप कैसे करते हैं?
अब तक हुए वाइब्रेंट गुजरात के करीब 80 प्रतिशत एमओयू लागू हो चुके हैं या क्रियान्वयन की प्रक्रिया में हैं। लगभग 20 प्रतिशत एमओयू अभी शुरू नहीं हुए हैं। इनमें कुछ आगे बढ़ सकते हैं, जबकि कुछ नहीं भी बढ़ें। हालांकि गुजरात की विकास रणनीति केवल एमओयू या वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन पर निर्भर नहीं है। इसके लिए दीर्घकालीन और संस्थागत योजना भी बनाई गई है।
‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ पर काफी चर्चा होती है, लेकिन आम नागरिक के लिए ‘ईज ऑफ लिविंग’ उतना ही महत्वपूर्ण है। गुजरात में बेहतर जीवन की सुविधाओं को लेकर सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं?
‘ईज ऑफ लिविंग’ का अर्थ केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और शहरी सुविधाएं भी हैं। अच्छी सड़कें, पेयजल, सार्वजनिक परिवहन और मेट्रो जैसी सुविधाएं जीवन आसान बनाती हैं। गुजरात में शहरी प्रशासन और टाउन प्लानिंग पर काम हुआ है। नगर निगमों की संख्या 9 से बढ़ाकर 17 की गई है। टाउन प्लानिंग के जरिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण के बिना सड़क और अन्य बुनियादी ढांचा विकसित किया जा सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य में भी प्रयास जारी हैं, हालांकि राज्य अपनी कमियों को स्वीकार कर उनमें सुधार की जरूरत मानता है। हम यह दावा नहीं करते कि हर क्षेत्र में गुजरात की स्थिति आदर्श है। अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए उन्हें सुधारने की कोशिश जरूरी है।
गुजरात ने आर्थिक विकास के कई मानक स्थापित किए हैं, फिर भी कुपोषण की चुनौती बनी हुई है। इसके पीछे प्रमुख कारण क्या हैं और इस क्षेत्र में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
कुपोषण गुजरात के लिए अब भी चुनौती है। राज्य की करीब 15 प्रतिशत आबादी जनजातीय क्षेत्रों में रहती है, जहां दूरदराज की बस्तियों तक सेवाएं पहुंचाना कठिन है। पूर्वी पट्टी में जनजातीय और अन्य वंचित आबादी की बड़ी हिस्सेदारी है। शिक्षा, आयरन की गोलियों और पोषण को लेकर जागरूकता भी कम है। इस क्षेत्र में गुजरात को अभी और काम करना होगा।
मुख्यमंत्री के सलाहकार के रूप में आपकी भूमिका और अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को देखते हुए क्या निर्णय प्रक्रिया में सत्ता के केंद्रीकरण की कोई संभावना बनती है?
ऐसा कोई सत्ता का केंद्रीकरण नहीं है। मेरी वर्तमान भूमिका मूल रूप से सलाहकार की है। अपने अनुभव के आधार पर मैं मुख्यमंत्री को यह सुझाव देता हूं कि राज्य की प्रगति के लिए किन क्षेत्रों में क्या किया जा सकता है। मेरे पास कोई फाइल नहीं आती और मेरे पास निर्णय लेने की कोई प्रशासनिक शक्ति नहीं है। यदि मेरे अनुभव से राज्य को कोई लाभ मिल सकता है तो मैं उसे उपलब्ध कराने की कोशिश करता हूं।
जीडीपी के आंकड़ों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आप इन सवालों और आलोचनाओं को किस तरह देखते हैं? साथ ही, भारत की आर्थिक वृद्धि के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
ऐसी आलोचना के बजाय वास्तविक आर्थिक गतिविधि के संकेतकों को देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, गुजरात में इस वित्तीय वर्ष के पहले पांच महीनों में जीएसटी संग्रह पिछले वर्ष की समान अवधि से करीब 28 प्रतिशत बढ़ा है। बाद में दरों में कटौती के बावजूद यह वृद्धि बताती है कि आर्थिक गतिविधियां जारी हैं और इसका असर जीडीपी पर भी दिख रहा है। आगे महंगाई, खासकर तेल की बढ़ती कीमतें, बड़ी चुनौती हो सकती हैं। इसके बावजूद मेरा मानना है कि भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत से नीचे नहीं जाएगी। 8-8.5 प्रतिशत की वृद्धि दर देश के लिए बहुत अच्छी होगी।
आर्थिक विकास के आंकड़ों के साथ रोजगार को लेकर भी सवाल उठते हैं। गुजरात में आर्थिक वृद्धि और रोजगार के बीच किस तरह का संबंध दिखाई देता है? और युवाओं को कर्तव्य, कर्मयोग और सफलता के बारे में आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
गुजरात में रोजगार की स्थिति अच्छी है और निर्माण, उद्योग व बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश हो रहा है। करीब चार लाख करोड़ रुपये के बजट में लगभग 35 प्रतिशत, यानी 1.5 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित हैं। इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। युवाओं को हर काम कर्मयोग की भावना से करना चाहिए-पूरी लगन, ईमानदारी और सर्वोत्तम गुणवत्ता के साथ। काम को स्वार्थ, पद या पुरस्कार से नहीं जोड़ना चाहिए और सफलता मिलने पर अहंकार से बचना चाहिए। कर्मयोग का अर्थ है बिना लापरवाही, स्वार्थ और अहंकार के अपने कर्तव्य का पालन करना। लक्ष्य तय कर निरंतर प्रयास करने से निराशा से बचते हुए सफलता की राह आसान होती है।















