भारत की अर्थव्यवस्था : जीडीपी के आंकड़े आशाजनक
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होम भारत

भारत की अर्थव्यवस्था : जीडीपी के आंकड़े आशाजनक

हाल ही में जारी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े देश की आर्थिक मजबूती के संकेत दे रहे हैं। जहां दुनिया में जीडीपी की दर घट रही है, वहीं भारत में यह बढ़ रही है। भले ही इन आंकड़ों को लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हों, लेकिन कहा जाता है कि आंकड़े झूठ नहीं बोलते। इसलिए आंकड़ों को देखें और समझें कि सच क्या है।

Written byडॉ. धनपत राम अग्रवालडॉ. धनपत राम अग्रवाल
Sep 14, 2026, 02:32 pm IST
inभारत, विश्लेषण

भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद अब नजर तीसरे स्थान पर है। आर्थिक वृद्धि की मौजूदा रफ्तार बनी रही तो यह लक्ष्य आने वाले वर्षों में हासिल किया जा सकता है। ऐसे में 31 अगस्त, 2026 को जारी जीडीपी के आंकड़े भी उत्साह बढ़ाने वाले हैं। चालू वित्त पहली तिमाही में भारत की वास्तविक आर्थिक वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में.9 प्रतिशत थी। लेकिन इस आंकड़े ने सवाल भी खड़ा किया है। अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ी है तो आम आदमी को इसका असर कितना दिखाई दे रहा है? महंगाई और बेरोजगारी की चिंता के बीच क्या आर्थिक गतिविधियां सचमुच इतनी तेज हैं?सवाल इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि जून 2025 की तिमाही में जीडीपी करीब 86 लाख करोड़ रुपये था, जबकि जून,2026 में यह करीब 88.27 लाख करोड़ रुपये है। फिर वृद्धि 7.8 प्रतिशत कैसे हुई? पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का सवाल यही है। विपक्ष इसे ‘सांख्यिकीय जुमला’ और ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ बता रहा है।

भ्रम कैसे पैदा हुआ

दरअसल, फरवरी 2026 में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने राष्ट्रीय आय की गणना का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया। इसे ऐसे समझें। मान लीजिए किसी चीज की लंबाई मापने के लिए एक पट्टी है। यदि वह पट्टी बदल दें तो पुरानी और नई पट्टी से मिले परिणामों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती। जीडीपी के साथ भी यही हुआ है। आधार वर्ष बदलने का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में आए बदलावों को बेहतर तरीके से आंकड़ों में शामिल करना है। डिजिटल सेवाएं, नए उद्योग, बदलती खपत और अर्थव्यवस्था की नई संरचना समय के साथ बदलती रहती है। इसलिए दुनिया के बड़े देश समय-समय पर अपना आधार वर्ष बदलते हैं। आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे मान्यता देती हैं। यही कारण है कि जून 2025 की तिमाही के जीडीपी के दो अलग-अलग आंकड़े दिखते हैं।

पुरानी पद्धति में जून 2025 का जीडीपी 86.05 लाख करोड़ रुपये था, जो 29 अगस्त, 2025 को जारी हुआ था। लेकिन नई पद्धति में उसी तिमाही का जीडीपी लगभग 80 लाख करोड़ रुपये हो गया। ऐसे में कोई 86 लाख करोड़ रुपये की तुलना 88.27 लाख करोड़ रुपये से करेगा तो उसे वृद्धि बहुत कम दिखेगी। सही तुलना नई पद्धति के लगभग 80 लाख करोड़ रुपये और जून 2026 के 88.27 लाख करोड़ रुपये के बीच होगी, जिससे 7.8 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि निकलती है। यानी भ्रम की वजह अलग-अलग पद्धतियों से तैयार आंकड़ों की तुलना है, आंकड़ों में हेराफेरी नहीं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने भी अपने स्पष्टीकरण में भी यही कहा है।

नर्ह गणना पद्धति

नई जीडीपी शृंखला में विनिर्माण और कृषि के आंकड़ों की गणना में ‘दोहरी अपस्फीति’ पद्धति अपनाई गई है। यह अर्थव्यवस्था में किसी उद्योग या जीडीपी के वास्तविक मूल्यवर्धन की गणना करने की सांख्यिकीय तकनीक है। मान लीजिए कोई कारखाना 100 रुपये का माल बनाता है, जिसमें 60 रुपये का कच्चा माल लगता है। कारखाने ने उसमें 40 रुपये का मूल्य जोड़ा। अगले साल तैयार माल की कीमत 5 प्रतिशत बढ़ गई, लेकिन कच्चे माल की कीमत 10 प्रतिशत बढ़ गई। ऐसे में केवल तैयार माल की कीमत देखकर पता नहीं चलेगा कि कारखाने ने वास्तव में कितना अधिक मूल्य पैदा किया। इसलिए तैयार माल और कच्चे माल की कीमतों को अलग-अलग देखा जाता है। ण क्षेत्र की वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही, लेकिन कीमतों का असर हटाने के बाद वास्तविक वृद्धि 9.2 प्रतिशत निकली। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में गिरावट आई। उत्पादन अधिक हुआ, लेकिन सामान कम कीमत पर बिका। लेकिन खनन क्षेत्र में तस्वीर बिल्कुल उलटी रही। वास्तविक जीवीए में 2.4 प्रतिशत की गिरावट आई। यानी कोयला, तेल और अयस्क का उत्पादन कम हुआ। लेकिन कच्चे तेल, गैस और धातु अयस्कों की कीमतें बहुत बढ़ गईं। कच्चा तेल-गैस अप्रैल में करीब 70 प्रतिशत, मई में करीब 72 प्रतिशत और जून में करीब 34 प्रतिशत तक महंगा हुआ। इसके कारण रुपयों में मापा गया आंकड़ा 22.3 प्रतिशत बढ़ गया। इन दोनों उदाहरणों से स्पष्ट है कि जीडीपी आंकड़ों में कीमतों का बहुत बड़ा असर होता है। इसलिए रुपयों में दिखने वाली वृद्धि और वास्तविक उत्पादन वृद्धि हमेशा एक जैसी नहीं होती।

जमीन पर भी दिखती आर्थिक मजबूती

अब असली सवाल है कि अगर जीडीपी की गणना की पद्धति बदल गई है, तो क्या दूसरे आर्थिक संकेत भी विकास की पुष्टि करते हैं? सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़े इसका संकेत देते हैं। सीमेंट उत्पादन 8.9 प्रतिशत बढ़ा, जबकि पिछले वर्ष यह 7.3 प्रतिशत था। तैयार स्टील की खपत 8.3 प्रतिशत बढ़ी, जो पिछले वर्ष 8 प्रतिशत थी। पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन 8.8 प्रतिशत से बढ़कर 15.2 प्रतिशत, विद्युत उपकरणों का विनिर्माण 9.7 प्रतिशत से 27 प्रतिशत, वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री 18.3 प्रतिशत बढ़ी, जो पिछले वर्ष गिरी थी। वस्तु और सेवाओं का निर्यात करीब 25-26 प्रतिशत बढ़ा। निवेश करीब 11.9 प्रतिशत बढ़ा, जो लोगों के खर्च में हुई 7.1 प्रतिशत वृद्धि से अधिक है। सेवा क्षेत्र की 10 प्रतिशत वृद्धि में वित्तीय, रियल एस्टेट और आईटी सेवाओं की बड़ी भूमिका रही। यानी 7.8 प्रतिशत की वृद्धि ‘कागजी’ नहीं है। हालांकि यह केवल एक तिमाही की तस्वीर है और आंकड़े प्रारंभिक हैं, जिनमें संशोधन हो सकता है। जीडीपी वृद्धि से पूरी अर्थव्यवस्था की सेहत नहीं समझी जा सकती। यह भी देखना होगा कि विकास किन क्षेत्रों में हो रहा है, कितने रोजगार पैदा हो रहे हैं और आम आदमी की आय तथा क्रय शक्ति पर इसका कितना असर पड़ रहा है।

दूसरी ओर, कुल निवेश में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि उम्मीद जगाती है। मशीनरी के आयात में भी करीब 51.5 प्रतिशत की तेज वृद्धि हुई है। सवाल है कि यह आने वाले उत्पादन के लिए किया गया निवेश है या बढ़ती लागत का बोझ? आर्थिक विकास की असली ताकत किसी एक तिमाही के आंकड़े में नहीं, बल्कि उसकी निरंतरता में दिखाई देती है। 30 नवंबर, 2026 को जुलाई-सितंबर, 2026 की अगली तिमाही के आंकड़े आने पर तस्वीर और साफ होगी। यदि निर्माण, निवेश, विनिर्माण, निर्यात और सेवाओं की गति बनी रहती है और इसका असर रोजगार, आय तथा ग्रामीण मांग में भी दिखाई देता है, तभी कहा जा सकेगा कि 7.8 प्रतिशत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की टिकाऊ मजबूती का संकेत है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषआर्थिक मजबूतीविनिर्माण क्षेत्रटिकाऊ मजबूतीवास्तविक वृद्धिसांख्यिकीय जुमलाआंकड़ों की बाजीगरीदोहरी अपस्फीतिपूंजीगत वस्तुएंक्रय शक्तिखनन क्षेत्रउपभोग व्ययGDPवाणिज्यिक वाहन
डॉ. धनपत राम अग्रवाल
डॉ. धनपत राम अग्रवाल
राष्ट्रीय सह-संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच [Read more]
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