क्या मोटापा भी 'क्रांतिकारी' हो सकता है? शिकागो में हुई कॉन्फ्रेंस, जीनोसाइड बताया
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क्या मोटापा भी ‘क्रांतिकारी’ हो सकता है? शिकागो में हुई कॉन्फ्रेंस, जीनोसाइड बताया

डशॉन एल. हैरिसन ने कई ऐसे दावे किये, जो हैरानी से भर देंगे। उन्होंने कहा कि पतले होने की दवाई दरअसल दवाई न होकर मोटे लोगों का जीनोसाइड (genocide) करने का माध्यम है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Sep 11, 2026, 05:54 pm IST
inस्वास्थ्य
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

आपसे कोई कहे कि मोटा होना दरअसल एक क्रांतिकारी कदम है और फिट होना फासीवादी ताकतों के हाथों में खेलना? क्या आपको यह समझ आएगा या फिर आपको लगेगा कि इस मोटापे के कारण पैदा होने वाली समस्याओं से छुटकारा पाया जाए? फिर आपसे कहा जाए कि इन समस्याओं को हल करने के बाद आप पूंजीवादी ताकतों के हाथों खेलने लगेंगे? यह सब सुनने में अजीब लग सकता है, मगर यह सच है। शिकागो में एक समाजवाद अर्थात सोशलिज़म के बैनर तले “रेडिकल/समाजवादी विचारों से जुड़े प्रकाशक” Haymarket Books द्वारा एक सालाना कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। उसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स देखते ही देखते अजीबोगरीब पोस्ट्स और राजनीतिक बातों से भर गया।

कॉन्फ्रेंस का आयोजन हयात रीजेन्सी, शिकागो में हुआ था और उसमें भाग लेने के लिए 500 डॉलर देने थे, हालांकि उसमें डिस्काउंट भी उपलब्ध था। इसमें मोटे लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले डशॉन एल. हैरिसन ने कई ऐसे दावे किये, जो हैरानी से भर देंगे। उन्होंने कहा कि पतले होने की दवाई दरअसल दवाई न होकर मोटे लोगों का जीनोसाइड (genocide) करने का माध्यम है। ओजेमपिक (मोटापा कम करने वाली) जैसी दवाइयां लोग इसलिए नहीं ले रहे हैं, क्योंकि वे बीमार हैं, बल्कि इसलिए लेते हैं क्योंकि यह दुनिया मोटे लोगों का जीनोसाइड कराना चाहती है।

इस वक्तव्य को चरमपंथ वामपंथी विचार प्रक्रिया का एक उदाहरण माना जा सकता है क्योंकि यहां स्वास्थ्य सुधार या फिर वैज्ञानिक प्रगति को भी एक दमनकारी कदम बताकर लोगों को भड़काया जा रहा है। मौजूदा समय में लेफ्ट और सोशलिज़म में लोगों को उन बातों के प्रति भड़काया या उकसाया जाता है, जो दरअसल होती ही नहीं हैं। इसके लिए पहले एक काल्पनिक शत्रु का निर्माण मस्तिष्क में किया जाता है और फिर उसे वास्तविक बनाने के लिए विमर्श का निर्माण किया जाता है। जैसे कि लेखिका हैरिसन ने किया। मीडिया के अनुसार वे पहले ही एक प्रकाशित लेख में लिख चुकी हैं कि body fascism का अर्थ ऐसे आदर्श शरीर से होता है, जिसे स्वास्थ्य, अनुशासन, विश्वसनीयता और सामाजिक मूल्य का प्रतीक बनाया जाता है और जिसके बाहर के शरीरों को हिंसा या सामाजिक अदृश्यता का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि ऐसे विमर्श सड़कों पर नहीं बनते, ऐसे विमर्श अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं। जैसा कि spiked में इस रिपोर्ट के संबंध में लिखा है कि ये एक्टिविस्ट सड़कों या फिर हाउसिंग कालोनी के टावर ब्लॉक का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, बल्कि ये अकादमिक हॉल का प्रतिनिधित्व करते हैं।

हेल्थ फासिज़्म से बचकर रहें

एक बहुत ही हैरान करने वाला शब्द इस समाचार से निकलकर आया, और वह था हेल्थ फासिज़्म। हालांकि यह कई वर्षों से प्रयोग किया जा रहा है, परंतु भारत के लोगों के लिए यह नया शब्द है। इसके विषय में और तलाशा तो पता चला कि यह अवधारणा बताती है कि कैसे स्वास्थ्य, फिटनेस और शरीर के नियमों को समाज पर नियंत्रण रखने, लोगों को सही या गलत ठहराने और उन्हें समाज से बाहर करने का जरिया बना दिया जाता है।

क्या मोटापे को लेकर यह किया जाना चाहिए?

प्रश्न उठता है कि क्या यह सब मोटापे को लेकर भी किया जाना चाहिए? मोटापे को अधिकांश बीमारियों की जड़ बताया जाता है। परंतु शिकागो में जो आवाज उठी उसमें यह कहा गया कि जब ठीक होने की बात की जाती है, तो वह हेल्थ फ़ासिज़्म है! एक पैनलिस्ट ने कहा कि हमें फासीवादियों से ज्यादा स्वस्थ होने की कल्पना से बाहर निकल आना चाहिए।

वहीं इस कॉन्फ्रेंस में लेखिका Da’Shaun L. Harrison ने एक और कदम आगे बढ़कर अश्वेत लोगों के मोटापे को अलग से कहा। उन्होंने कहा कि समाज मोटे शरीर और खासकर अश्वेत लोगों के मोटे शरीर को नियंत्रित रखना चाहता है। उन्होंने अश्वेत लोगों के मोटापे के नियंत्रण को पूरे शासन और प्रशासन के साथ जोड़ा। उनका कहना था कि अश्वेत लोगों पर जबरन नियंत्रण रखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर नहीं होता तो बीएमआई, मोटापे की महामारी जैसी बातें नहीं होतीं और साथ ही मोटापे को नियंत्रित करने के विषय में कोई भी मेडिकल या वैज्ञानिक संस्थान भी नहीं होते। अब यह प्रश्न भी उठता है कि क्या मोटापे को लेकर यह कहा जाना चाहिए? क्योंकि अपने शरीर से प्यार करने का अर्थ मोटापे या उससे जुड़ी बीमारियों से प्यार करना नहीं, बल्कि उनसे छुटकारा पाना होता है।

लेखिका ने मोटापे को लेकर फूड कॉर्पोरेशंस पर प्रश्न उठाए। उसका कहना था कि मोटापा कम करने के नाम पर मेडिकल इंडस्ट्री को फायदा होता है और जिन्हें फायदा होता है, वह एक ऐसा सामाजिक क्रम बनाए रखना चाहते जिसमें मोटे लोगों की निगरानी हो, उन्हें प्रतिबंधित किया जाए, उनके भीतर अपराध बोध भरा जाए और उन्हें दंडित किया जाए।

उनका कहना था कि डाइट कल्चर हमेशा ही भोजन को नैतिकता से जोड़ता है, और ‘गिल्टी प्लेजर’ जैसी भाषा के माध्यम से खुशी को खतरे में बदलता है। yahoo news के अनुसार हेल्थ फासिज़्मपर इस कॉन्फ्रेंस में 200 लोग शामिल हुए थे। हालांकि कुछ लोग इसमें शामिल होने वालों की संख्या 100 भी बताते हैं।

Topics: Haymarket BooksChicago Conferenceमोटापा और स्वास्थ्यडाइट कल्चरवामपंथी विचारDa'Shaun HarrisonBody FascismHealth FascismOzempic
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