9/11 : स्वामी विवेकानंद और सनातन का विश्वघोष
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9/11 : स्वामी विवेकानंद और सनातन का विश्वघोष

क्या था वह भाषण जिसने केवल अमेरिका को ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी जगत को भारत की आध्यात्मिक शक्ति से परिचित कराया?

Written byगौरव सिंह राजावतगौरव सिंह राजावत
Sep 11, 2026, 04:18 pm IST
inभारत
स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद

9/11 एक ऐसी तारीख है जिसे याद करते ही मन में दो ऊंची इमारतें, उनसे टकराते हवाई जहाज, ओसामा बिन लादेन, जॉर्ज बुश और न जाने कितनी घटनाएं घूमने लगती हैं। 9/11 के नाम पर हमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का विध्वंस तो दिखाई देता है, लेकिन विश्व शांति और सनातन हिंदू संस्कृति को पश्चिम के पटल पर उद्घोषित करने वाले स्वामी विवेकानंद की अमृतवाणी सुनाई नहीं देती। क्योंकि 9/11 यानी 11 सितंबर 1893 भी है। वह ऐतिहासिक दिन जब शिकागो की धरती पर भारत के एक युवा संन्यासी ने पूरी दुनिया के सामने सनातन संस्कृति का स्वर बुलंद किया था।

क्या था वह भाषण जिसने केवल अमेरिका को ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी जगत को भारत की आध्यात्मिक शक्ति से परिचित कराया? उनके शुरुआती पांच शब्द “Sisters and Brothers of America” सुनते ही सभागार में उपस्थित हजारों लोग खड़े हो गए और लंबे समय तक तालियों की गड़गड़ाहट से उस युवा संन्यासी का स्वागत करते रहे।
वह केवल एक भाषण नहीं था। वह भारत की आत्मा का विश्व के सामने उद्घोष था। वह संदेश था कि भारत केवल एक भूखंड नहीं बल्कि एक ऐसी सभ्यता है जिसने सहिष्णुता, स्वीकार्यता, एकात्मता और विश्वबंधुत्व का विचार सदियों से दिया है।

और हमने उस शिकागो से क्या सीखा?

हमने सीखा कि भारत की शक्ति केवल उसकी भौतिक सामर्थ्य में नहीं बल्कि उसके विचारों में है। हमने सीखा कि सनातन संस्कृति किसी एक पंथ या समुदाय तक सीमित नहीं बल्कि समस्त मानवता के कल्याण की कामना करने वाली जीवन दृष्टि है। हमने सीखा कि भारत अपनी जड़ों से जुड़कर ही विश्व को दिशा दे सकता है। मेरे लिए 9/11 का अर्थ नरेंद्र है।
नरेंद्रनाथ दत्त जिन्हें पूरा विश्व आज स्वामी विवेकानंद के नाम से जानता और स्मरण करता है।

भारतवासियों को 9/11 क्यों याद रखना चाहिए?

क्योंकि उस दिन भारत के एक युवा संन्यासी ने पश्चिम के बड़े-बड़े विद्वानों के बीच खड़े होकर भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐसी प्रभावशाली प्रस्तुति दी जिसने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया। 9/11 हमें इसलिए याद रखना चाहिए क्योंकि उस दिन सनातन संस्कृति के एक संदेशवाहक ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को विश्व मंच पर स्थापित किया। इसलिए अब 9/11 को हम शिकागो के लिए भी याद करेंगे। विध्वंस के लिए नहीं, विश्व शांति के लिए याद करेंगे। आतंकवाद के लिए नहीं, सनातन संवाद के लिए याद करेंगे। आज के बाद 9/11 हम लादेन के लिए नहीं, स्वामी विवेकानंद के लिए याद करेंगे। क्योंकि हमारे लिए 9/11 केवल एक तारीख नहीं है। यह भारत के उस विश्वघोष का दिन है जब सनातन की आवाज़ शिकागो से उठी और पूरी दुनिया ने उसे सुना।

आपको ले चलता हूं आज से 133 साल पीछे।

तारीख: 11 सितंबर 1893

जगह: लेक मिशिगन के तट पर बसा अमेरिका का घनी आबादी वाला शहर शिकागो

अवसर: विश्व धर्म संसद

पूरी दुनिया से अलग-अलग धर्मों के प्रतिनिधि आए थे और भारत से आया था एक युवा तपस्वी स्वामी विवेकानंद। मौका था धर्म पर विचार-विमर्श का, लेकिन दूसरों को छोटा और खुद को बड़ा समझने वाली पश्चिमी संस्कृति सैकड़ों विद्वानों के बीच बैठे विवेकानंद का मजाक उड़ा रही थी। उनके कपड़े सूट-बूट वाले विद्वानों से मेल नहीं खा रहे थे और कद-काठी भी साधारण थी। लेकिन उनके मस्तक पर ज्ञान का तेज था, अहंकार नहीं।

भारत को सपेरों का देश और तीसरी दुनिया कहने वाले मन ही मन स्वामी जी पर हंस रहे थे। वे सोच रहे थे कि यह भारत को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता बताने वाला और बड़ी-बड़ी बातें करने वाला भगवाधारी लड़का मुकाबला आते ही पीछे हट गया। वे सोच रहे थे कि यह भगवाधारी हमारी पैनी तलवारों का सामना कैसे करेगा, यह तो लकड़ी का सिपाही है जो तुरंत चटक जाएगा। लेकिन, स्वामी विवेकानंद निश्चिंत बैठे रहे। वे अलग-अलग देशों के विद्वानों को एकाग्र होकर सुनते रहे। धर्म अलग थे, लोग अलग थे, लेकिन दावा सबका एक ही था: “मेरा धर्म जैसा कोई धर्म नहीं, मेरे सिद्धांत जैसा कोई सिद्धांत नहीं और मेरे वंश जैसा कोई वंश नहीं।”

कुछ देर बाद विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद का नाम पुकारा गया। वे अपनी जगह से उठे और मंच की ओर बढ़ने लगे। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 30 वर्ष थी।

30 वर्ष का ज्योतिपुंज था, ज्ञान पुष्प का सुलभ कुंज था।
मस्तक पर अर्हम् की रेखा, चकित रह गया जिसने देखा।
शब्द सुदर्शनधारी था वो, देवदूत अवतारी था वो।

स्वामी जी मंच की ओर अकेले नहीं बढ़े, उनके साथ भारत की सनातन संस्कृति और लाखों वर्षों का इतिहास भी मंच तक पहुंचा। अब पूरा विश्व सुनना चाहता था कि भारत क्या कहेगा। जहां इतने बड़े-बड़े धर्म योद्धा बोल चुके हैं, वहां यह भगवाधारी लड़का सनातन धर्म की श्रेष्ठता कैसे सिद्ध करेगा। स्वामी विवेकानंद माइक तक पहुंचे, लेकिन कुछ बोले नहीं। लोगों की उत्सुकता बढ़ने लगी और सभा में हलचल सी मच गई कि स्वामी जी कुछ कह क्यों नहीं रहे हैं।

कुछ लोगों ने उपहास किया, “What happened? Has India gone silent?” लेकिन स्वामी जी पूरे सभागार को निहार रहे थे, मानो हर चेहरे को पढ़ रहे हों। फिर उन्होंने सिर्फ पांच शब्द बोले और उन्हीं पांच शब्दों ने आने वाले पाँच सौ वर्षों के लिए पश्चिम की धरती पर सनातन सभ्यता की नींव रख दी। वे पांच शब्द सुनने वालों की छाती पर ऐसे गड़े कि पूरी दुनिया के लिए विश्व बंधुत्व का संदेश बनकर गूँज उठे और आज तक गूंज रहे हैं। शिकागो की धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के पहले पांच शब्द थे: “Sisters and Brothers of America” यानी “अमेरिका के भाइयों और बहनों”। वहां मौजूद 7 हज़ार लोग मंत्रमुग्ध रह गए, जैसे ईश्वर की आवाज़ सुन ली हो। 2 मिनट तक लगातार तालियां बजती रहीं, जबकि स्वामी विवेकानंद ने अभी भाषण शुरू भी नहीं किया था।
ये पांच शब्द इसलिए भी अनमोल हैं क्योंकि ये किसी व्यक्ति के शब्द नहीं थे, बल्कि सनातन संस्कृति की आत्मा थे। महोपनिषद के चौथे अध्याय के 71वें श्लोक में कहा गया है:

“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्॥”

इसका अर्थ है कि यह मेरा अपना है और यह पराया है, ऐसी गणना छोटे हृदय वाले लोग करते हैं। उदार और बड़े हृदय वालों के लिए तो संपूर्ण धरती ही उनका परिवार है।

पश्चिमी समाज के लिए यह एक सांस्कृतिक झटका था। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि हजारों मील दूर से आया एक व्यक्ति, जिससे न खून का रिश्ता है और न भाषा का, उन्हें भाई-बहन कह सकता है। जिसे दुनिया के बड़े से बड़े बुद्धिजीवी आज तक नहीं समझ पाए कि कैसे हम भारतवासी परायों को अपना बना लेते हैं, मनुष्य मात्र में भेदभाव नहीं करते और चमड़ी के रंग से किसी को छोटा या बड़ा नहीं समझते। हमारे यहां “Black Lives Matter” का प्लेकार्ड दिखाकर इंसानी जिंदगी की कीमत याद नहीं दिलानी पड़ती, क्योंकि “वसुधैव कुटुंबकम” हमारी संस्कृति थी और हमेशा रहनी चाहिए। हमारे लिए विश्व का हर व्यक्ति वही है जो स्वामी विवेकानंद जी द्वारा उस दिन कह दिया गया था, “Sisters & Brothers”। पश्चिम वाले हमें तीसरी दुनिया कहते रहें, उनकी मर्ज़ी। हमारे लिए दुनिया दूसरी या तीसरी नहीं होती, सिर्फ एक होती है और उसमें सभी समाहित हैं: गोरे-काले, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदियां और सागर।
मुझे एक गीत याद आता है:

काले-गोरे का भेद नहीं, हर दिल से हमारा नाता है।
भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ।

उन पांच शब्दों के बाद स्वामी विवेकानंद धाराप्रवाह बोलने लगे:

“आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है, उससे मेरा दिल भर आया है। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूँ। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूँ।”

इस वक्तव्य पर आगे बात करने से पहले यह जान लीजिए कि विश्व धर्म संसद में बोलने से तकरीबन डेढ़ महीने पहले जब स्वामी जी अमेरिका आए थे, तब अमेरिका ने उनका स्वागत उसी घृणा से किया था जो उस समय अश्वेत लोगों के लिए उनके मन में हुआ करती थी, “You Black, Get Out!” डेढ़ महीने तक स्वामी जी बस यही सुनते रहे, लेकिन उन्होंने अपने अंदर कड़वाहट नहीं भरने दी।

स्वामी जी ने डेढ़ महीने अपमान का विष पिया, लेकिन उनके होंठों से जो शब्द निकले वे केवल आभार के थे। हमें यह सीखना है कि दुनिया की कड़वाहट हमारी आत्मा पर हावी न होने पाए। बुराई का जवाब बुराई से देना हमारी परंपरा नहीं है।

ऋग्वेद में प्राचीन काल से यह महान सत्य घोषित किया गया है कि सत्य एक ही है, किंतु विद्वान और मनीषी अपनी-अपनी समझ और दृष्टि के अनुसार उसकी विभिन्न व्याख्याएँ करते हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 164वें सूक्त की 46वीं ऋचा में स्पष्ट रूप से कहा गया है:

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति, अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।”

अर्थात परम सत्य एक ही है, लेकिन ज्ञानी जन उसे अग्नि, यम, मातरिश्वा आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं। यह यूनिवर्सल एक्सेप्टेंस है कि मेरा धर्म भी सही है और तुम्हारा भी, मेरा रास्ता भी सही है और तुम्हारा भी। मेरे सही होने के लिए आपका गलत होना जरूरी नहीं है।
“I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance.” Swami Vivekananda जी की यह एक पंक्ति दुनिया के चार हजार से भी ज्यादा धर्मों के विचारों को एक सूत्र में पिरोने के लिए पर्याप्त है।

अगली सुबह अमेरिकी अखबारों के पन्ने स्वामी विवेकानंद के यशगान से भरे पड़े थे। New York Herald ने लिखा कि विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद सबसे महान वक्ता थे। उन्हें सुनने के बाद लगता है कि जिस देश में इतने विद्वान और बुद्धिमान लोग रहते हैं, वहां ईसाई प्रचारकों (Missionaries) को भेजना कितना मूर्खतापूर्ण है।

The New York Critics ने लिखा कि कई विद्वानों का भाषण बहुत अच्छा था, लेकिन इस हिंदू साधु के प्रभाव के आगे कोई टिक नहीं पाया। यदि किसी को लगता है कि स्वामी जी का योगदान सिर्फ हिंदू धर्म तक सीमित है और राष्ट्र धर्म में नहीं, तो थोड़ा और गहरे उतरकर देखिए। उन साहित्यिक दस्तावेज़ों को पढ़िए जिनमें अंग्रेजों ने स्वयं लिखा है कि 1897 के बाद ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध क्रांति करने वाले जिन भी स्वतंत्रता सेनानियों को उन्होंने गिरफ्तार किया, उनमें से अधिकांश के पास स्वामी जी की तस्वीर या उनसे संबंधित साहित्य अवश्य पाया गया।

महान अमेरिकी विद्वान John Henry Wright की रचनाओं में भी यह स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि एक अकेले स्वामी विवेकानंद का ज्ञान अमेरिका के सभी प्रोफेसरों के संयुक्त ज्ञान से भी अधिक था: “More than the sum total of all the knowledge of American professors.”

उठो जवान देश की वसुंधरा पुकारती,
ये देश है पुकारता, पुकारती माँ भारती।

भारत माता की जय!
वन्दे मातरम्!

Topics: सनातन धर्मधर्म संसदस्वामी विवेकानंदस्वामी विवेकानंद शिकागो भाषण
गौरव सिंह राजावत
गौरव सिंह राजावत
केन्द्रीय सचिवालय सचिव, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद [Read more]
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