पाकिस्तान में एक बार फिर अहमदिया समुदाय के खिलाफ मामला सामने आया है। इस बार यूनिवर्सिटी के बाहर कुछ ऐसा किया गया, जिसने इस समुदाय के प्रति कट्टरपंथियों की नफरत दिखा दी।
अहमदिया समुदाय ने पाकिस्तान के निर्माण में बढ़-चढ़कर भाग लिया था और उसके प्रति ही वहां नफरत है। पंजाब प्रांत में मंगलवार को लाहौर से 200 किलोमीटर दूर सरगोधा यूनिवर्सिटी के बाहर अहमदिया समुदाय के विषय में अपमानजनक बैनर लगाए गए। कहा जा रहा है कि ये बैनर कट्टरपंथियों ने लगाए थे। पाकिस्तान में यह सब तब हुआ है, जब एक ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने वहां अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाकर की जाने वाली हिंसा और भेदभाव तथा कानूनी प्रतिबंधों पर चिंता व्यक्त की थी।
क्या लिखा था बैनर पर ?
अहमदिया समुदाय के लोगों के प्रति नफरत फैलाने का काम कट्टरपंथियों का बताया जा रहा है। इस समुदाय के लोगों के सामाजिक बहिष्कार और निष्कासन की बात की गई थी। कुछ बैनर में उन्हें ‘पाकिस्तान के प्रति बेईमान’ कहा गया था। यह मांग की गई थी कि उन्हें सरकारी पदों से हटाया जाए। एक बैनर पर लिखा था- ‘हमें कादियानियत से नफरत हैं।’
जमात ए अहमदिया ने आलोचना की
जमात ए अहमदिया ने इन बैनरों को लगाए जाने की निंदा करते हुए कहा कि मजहबी रवायतों में अंतर होने से किसी भी तरह दूसरे समुदाय के प्रति नफरत नहीं फैलनी चाहिए। उसने बैनर को तत्काल हटाने और दोषियों पर कार्रवाई करने की मांग की।
क्या कहा था संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने?
एक ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान सरकार को यह कहते हुए फटकार लगाई थी कि वह अपने मुल्क में मजहबी अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी हिंसा और भेदभाव पर रोक लगाए और साथ उनकी मनमानी गिरफ्तारियों पर रोक लगाई जाए। उनके मजहबी स्थलों पर हमले को रोका जाए। बयान में कहा गया, ‘हम कमजोर समुदायों के खिलाफ उनके धर्म या विश्वास के आधार पर बढ़ती हिंसा की रिपोर्ट से हैरान हैं। इन समुदायों ने महीनों से अपने खिलाफ दुश्मनी और नफरत फैलाने के लिए लगातार हमले, हत्याएं और लगातार परेशानी को अनुभव किया है। पाकिस्तान को माफी का या सजा से बचने के उस तरीके को हर हाल में तोड़ना होगा जिसके चलते हमलों और नफरत और हिंसा भड़काने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। ये हमले सरकारी मिलीभगत से होते हैं, जबकि डर का चक्र लोगों और संस्थाओं को इन अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सम्मान को बनाए रखने से रोकता है।’
इसमें लिखा है कि पिछले वर्ष ही अहमदिया समुदाय के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन की कई घटनाएं हुई हैं, जिनमें हत्या, हिरासत में मौत और गैरकानूनी रूप से हिरासत में लेना है। मजहबी भेदभाव भी होता है, उनकी इबादतगाहों को निशाना बनाया जाता है। दसका में 100 साल पुरानी मस्जिद को तोड़ दिया गया, जबकि कराची में एक मस्जिद को बंद कर दिया गया। कोटली में अहमदिया समुदाय के कब्रिस्तान में 82 कब्रों को विकृत किया गया। सरगोधा में नाबालिगों और दिव्यांग लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह भी कहा जाता है कि लाहौर और कराची जैसे शहरों में भी इनकी इबादतगाहों पर खतरा है।
इसके साथ ही पाकिस्तान में महिलाओं को भी बेअदबी के कानून का शिकार बनाया जा रहा है। इसमें कहा गया है कि ये सभी उल्लंघन यह बताते हैं कि कैसे इस तरह का भेदभाव वाला व्यवहार पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के साथ किया जा रहा है। मजहबी और राजनीतिक लोग अपनी तहरीरों में इस नफरत और खूनखराबे को बढ़ाते हैं।
पाकिस्तान में अहमदिया को नहीं मानते मुसलमान
जिस पाकिस्तान में आज अहमदिया समुदाय को मुसलमान ही नहीं माना जाता है, उसी पाकिस्तान के निर्माण के लिए अहमदिया समुदाय ने जमीन आसमान एक कर दिया था। यहां तक कि 1940 का लाहौर पाकिस्तान प्रस्ताव बना ही एक अहमदिया नेता चौधरी जफरुल्ला खान के हाथों था। पाकिस्तान बनने के बाद वे पहले पाकिस्तानी विदेश मंत्री बने थे, और उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तानी दावे को संयुक्त राष्ट्र में रखा था। जब पाकिस्तान के बनने के शुरुआती दिनों में अधिक संसाधन नहीं थे, तो कहा जाता है कि अहमदिया समुदाय के पढ़े-लिखे और अमीर लोगों ने पाकिस्तान की मदद की थी। पाकिस्तान से केवल एक ही व्यक्ति को अभी तक नोबेल मिला है और वह भी अहमदिया समुदाय के थे।
पाकिस्तान में अहमदिया का इसलिए विरोध
अहमदिया समुदाय के लोग हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद को अपना पैगंबर मानते हैं, जबकि शिया और सुनी समुदाय के लोग यह मानते हैं कि पैगंबर हजरत मोहम्मद ही आखिरी पैगंबर थे और उनके बाद अब कोई पैगंबर नहीं आ सकता। यही कारण है कि पाकिस्तान ने अहमदिया समुदाय को साल 1974 में प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार ने कट्टरपंथी मौलवियों और देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दबाव में आकर गैर मुसलमान घोषित कर दिया था। तब से उनके साथ भेदभाव चलता आ रहा है।

















