छत्तीसगढ़ HC का बड़ा फैसला, कहा- "शरिया संस्थाएं नहीं बन सकतीं अदालत"
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“शरिया संस्थाएं नहीं बन सकतीं अदालत”: छत्तीसगढ़ HC का बड़ा फैसला, मुस्लिम महिला के तलाक पर ‘इदारे-शरिया’ का आदेश अमान्य

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शरिया अदालतों को मुस्लिम महिला के तलाक या वैवाहिक स्थिति तय करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Sep 10, 2026, 07:21 pm IST
inभारत, छत्तीसगढ़
chhattisgarh high court ruling private sharia bodies cannot decide muslim woman divorce

चित्र प्रतीकात्मक है, जिसे AI की मदद से तैयार किया गया है

रायपुर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मुस्लिम वैवाहिक अधिकारों और समानांतर धार्मिक अदालतों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी निजी शरिया निकाय या धार्मिक संस्था के पास यह तय करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि कोई मुस्लिम महिला कानूनी रूप से तलाकशुदा है या नहीं. अदालत ने दो-टूक कहा कि किसी भी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति (Marital Status) तय करने का न्यायिक अधिकार केवल कानून द्वारा स्थापित सक्षम अदालतों के पास है, किसी निजी मजहबी संस्था के पास नहीं.

7 सितंबर 2026 को दिए गए फैसले में न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि न्यायिक या निर्णयकारी शक्ति केवल सक्षम विधायिका द्वारा पारित कानून से ही मिल सकती है, जिसे कोई भी निजी धार्मिक संस्था अपने स्तर पर नहीं अपना सकती.

“संविधान और कानून का शासन सर्वोपरि”- हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत रायपुर स्थित ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ द्वारा जनवरी 2022 में जारी उस आदेश/पत्र के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ता मुस्लिम महिला को उसके पति द्वारा तलाकशुदा घोषित कर दिया गया था.

“धर्म किसी व्यक्ति की अंतरात्मा और व्यक्तिगत आस्था का मार्गदर्शन कर सकता है, लेकिन किसी भी धार्मिक संस्था या निजी निकाय को कानून द्वारा स्थापित अदालत का अधिकार हथियाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। धार्मिक मान्यताओं का उपयोग किसी नागरिक के कानूनी अधिकारों और दर्जे को तय करने या लागू करने के लिए नहीं किया जा सकता। संविधान का ढांचा और कानून का शासन सर्वोपरि है।” – न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: एक नजर में समझें सभी मुख्य बिंदु

मामले का पहलू

उच्च न्यायालय का आधिकारिक आदेश / विवरण

निर्णय देने वाली पीठन्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ (7 सितंबर 2026).
चुनौती का विषयइदारा-ए-शरिया (रायपुर) द्वारा मुस्लिम महिला को तलाकशुदा घोषित करने का पत्र.
अदालती आदेशशरिया कोर्ट का फैसला कानूनी डिक्री नहीं; यह किसी का कानूनी वैवाहिक दर्जा नहीं बदल सकता.
सुप्रीम कोर्ट नजीर‘विश्व लोचन मदान बनाम भारत संघ’ (2014) फैसले के तहत फतवे या दारुल कजा कानूनी न्यायिक प्रणाली का हिस्सा नहीं.
तलाक-ए-हसन पर रुखसंवैधानिक वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं, मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने से प्रश्न खुला रखा.

क्या था पूरा मामला? दहेज प्रताड़ना से शरिया अदालत तक की कहानी

याचिका के अनुसार, पीड़िता ने अपने पहले पति के निधन के बाद जुलाई 2020 में दूसरा निकाह किया था. कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया और पति ने उसे तलाक देने की कोशिश की. महिला ने उत्पीड़न और क्रूरता का आरोप लगाते हुए नवंबर 2021 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी.

इसके बाद पति ने दावा किया कि उसने 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को तीन चरणों में ‘तलाक-ए-हसन’ दिया था. पति का तर्क था कि इदारा-ए-शरिया ने केवल इन घोषणाओं को दर्ज किया था, कोई स्वतंत्र न्यायिक फैसला नहीं दिया.

सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले का हवाला:

  • दारुल कजा और फतवे बाध्यकारी नहीं: सर्वोच्च न्यायालय ने विश्व लोचन मदान बनाम भारत संघ (2014) मामले में स्पष्ट किया था कि दारुल कजा या शरिया संस्थाएं देश की औपचारिक न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं और उनके द्वारा जारी फतवे कानूनन बाध्यकारी नहीं होते.
  • जबरन लागू नहीं कराया जा सकता: किसी भी फतवे को कानूनी डिक्री की तरह जबरन या दबाव डालकर लागू नहीं किया जा सकता.
  • शरिया निकाय का क्षेत्राधिकार शून्य: हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इदारा-ए-शरिया के पास याचिकाकर्ता के वैवाहिक दर्जे को समाप्त करने, बदलने या उसे तलाकशुदा घोषित करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है.

हालांकि, उच्च न्यायालय ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर फैसला देने से परहेज किया, क्योंकि यह विषय पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है.

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Topics: Muslim Woman Legal Divorce Rights High Courtछत्तीसगढ़ हाईकोर्ट शरिया अदालत तलाक फैसलाChhattisgarh High Court Sharia Court Talaq Order InvalidRaipur Idara E Sharia Islamic Court Verdict Quashed
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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