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विरासत पर अतिक्रमण

भारत की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यताएं उसके स्मारकों और पुरास्थलों में जीवित हैं। लेकिन राष्ट्रीय महत्व के 3,688 संरक्षित स्मारकों में 414 पर अतिक्रमण का सरकारी आंकड़ा चिंता बढ़ाता है। यह केवल जमीन पर कब्जे का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और विरासत की सुरक्षा से जुड़ी चुनौती है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 10, 2026, 10:50 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल कुछ प्रसिद्ध किलों, मंदिरों और मकबरों तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में फैले हजारों पुरास्थल भारत की सभ्यता के हजारों वर्षों के विकास के साक्षी हैं। ऐसे में केंद्र सरकार का हालिया आंकड़ा गंभीर चिंता पैदा करता है। देश में राष्ट्रीय महत्व के 3,688 प्राचीन स्मारक, पुरातात्त्विक स्थल और अवशेष घोषित हैं। इनमें से 414 स्मारकों और स्थलों पर अतिक्रमण है। यानी लगभग 11 प्रतिशत (लगभग हर नौ में से एक) संरक्षित स्‍थल अतिक्रमण से प्रभावित हैं।

यह आंकड़ा 13 अगस्त 2026 को संस्कृति मंत्रालय ने राज्यसभा में दिया। ये वे स्मारक और पुरास्थल हैं जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में आते हैं। महत्‍वपूर्ण बात यह है कि केवल चार राज्‍यों- उत्तर प्रदेश (78), तमिलनाडु (72), कर्नाटक (60) और महाराष्‍ट्र (49) में ही अतिक्रमण के 259 मामले दर्ज हुए हैं, जो कुल अतिक्रमण का 63 प्रतिशत है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि इन राज्यों के सभी स्मारक समान रूप से खतरे में हैं या अतिक्रमण का क्षेत्रफल समान है। सरकारी आंकड़ा अतिक्रमण वाले स्मारकों और स्थलों की संख्या बताता है, अतिक्रमित भूमि का क्षेत्रफल नहीं।

उत्तर प्रदेश सबसे आगे

उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 78 संरक्षित स्थलों पर अतिक्रमण है। एएसआई की राज्यवार सूची में उत्तर प्रदेश में 743 केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारक और स्थल दर्ज हैं, जो देश में सर्वाधिक है। इनमें आगरा, झांसी, लखनऊ, मेरठ और सारनाथ जैसे अलग-अलग पुरातात्त्विक सर्किलों के स्थल शामिल हैं। यहां चुनौती यह भी है कि संरक्षित स्मारक तेजी से बढ़ते शहरों, कस्बों और ग्रामीण आबादी के बीच स्थित हैं। पुरास्थल के आसपास की जमीन का दबाव बढ़ने के साथ उसकी सीमा, पहुंच मार्ग और संरक्षित क्षेत्र की सुरक्षा भी चुनौती बनती है। वहीं, तमिलनाडु में एएसआई के संरक्षण में 412 केंद्रीय संरक्षित स्मारक-स्थल दर्ज हैं। एएसआई और संसद के आधिकारिक दस्तावेजों में तमिलनाडु के पुरास्थलों का विस्तार प्रागैतिहासिक पाषाण युग से लेकर मेगालिथिक और ऐतिहासिक काल तक बताया गया है। यानी यहां संरक्षित विरासत केवल मध्यकालीन मंदिरों तक सीमित नहीं है।

स्मारक कितने पुराने?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य समझना जरूरी है। प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्त्विक स्थल और अवशेष अधिनियम (एएमएएसआर अधिनियम) , 1958 के तहत किसी संरचना या स्मारक को ‘प्राचीन स्‍मारक’ की श्रेणी में आने के लिए उसका कम-से-कम 100 वर्ष पुराना होना आवश्यक है, बशर्ते उसमें ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक या कलात्मक महत्व हो। इसी प्रकार पुरातात्त्विक स्थल और अवशेष भी कम-से-कम 100 वर्ष पुराने होने की वैधानिक कसौटी से जुड़े हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत के सभी 3,688 स्थल केवल 100-200 वर्ष पुराने हैं।

इनकी आयु सैकड़ों से लेकर हजारों वर्ष तक जाती है। कुछ पुरास्थल तो प्रागैतिहासिक काल से संबंधित हैं। जैसे-एएसआई की सूची में कर्नाटक के अंतर्गत प्रागैतिहासिक स्थल, अशोक के अभिलेख, मेगालिथिक डोलमेन, प्राचीन मंदिर और मध्यकालीन किले—सभी एक ही राष्ट्रीय संरक्षण व्यवस्था का हिस्सा हैं। यानी 414 अतिक्रमित स्थलों का प्रश्न केवल पुराने भवनों की जमीन बचाने का प्रश्न नहीं है। कहीं यह ‘प्रागैतिहासिक मानव की उपस्थिति का प्रमाण’ है, कहीं प्राचीन राजवंशों का अभिलेख, कहीं मंदिर स्थापत्य, कहीं किला और कहीं मध्यकालीन नगरीय सभ्यता का अवशेष।

अतिक्रमण का मतलब

अतिक्रमण का मतलब केवल किसी स्मारक की दीवार के भीतर अवैध निर्माण भी नहीं होता। संरक्षित स्मारकों के आसपास कानून द्वारा निषिद्ध और विनियमित क्षेत्र बनाए जाते हैं। किसी भी संरक्षित स्मारक के चारों ओर 100 मीटर का दायरा निषिद्ध क्षेत्र होता है, जहां किसी भी तरह की निर्माण गतिविधि पूरी तरह प्रतिबंधित होती है। निषिद्ध क्षेत्र से आगे के 200 मीटर के दायरे को विनियमित क्षेत्र माना जाता है, जहां निर्माण या विकास कार्य केवल राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए) की अनुमति से ही किए जा सकते हैं। एएमएएसआर कानून का उद्देश्य केवल स्मारक की इमारत बचाना नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के लिए आवश्यक आसपास के क्षेत्र और पहुंच को भी सुरक्षित रखना है।

सरकार के अनुसार, एएसआई अतिक्रमण या अनधिकृत गतिविधि सामने आने पर एएमएएसआर अधिनियम और उसके नियमों के तहत कार्रवाई करता है। स्मारकों की सीमाएं निर्धारित करने के लिए स्थानीय राजस्व अधिकारियों के साथ संयुक्त सर्वेक्षण भी किया जाता है। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भौगोलिक सीमांकन और डिजिटलीकरण है। संरक्षित स्मारकों और स्थलों की सीमाओं का सर्वेक्षण, जियो-रेफरेंसिंग और डिजिटलीकरण पूरा किया जा चुका है और इन सीमाओं को ‘भुवन पोर्टल’ पर अपलोड किया गया है। जहां आवश्यक है, इन आंकड़ों को राज्यों के भूमि अभिलेखों के साथ जोड़ा जा रहा है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जमीन के पुराने कागजी रिकॉर्ड और वास्तविक भौगोलिक स्थिति के बीच अंतर अतिक्रमण विवादों को जटिल बनाता है। डिजिटल सीमा-निर्धारण से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि संरक्षित क्षेत्र वास्तव में कहां तक है।

खतरा केवल अतिक्रमण नहीं

संरक्षित स्मारकों के सामने चुनौती सिर्फ अतिक्रमण की नहीं है। वायु प्रदूषण, रासायनिक क्षरण, बढ़ता शहरी दबाव, मौसम में बदलाव और पर्यटकीय दबाव भी इनके संरक्षण को प्रभावित करते हैं। अप्रैल 2026 में सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि वायु प्रदूषण के कारण रासायनिक क्षरण झेल रहे संरक्षित स्मारकों के वैज्ञानिक उपचार और संरक्षण के लिए 2025-26 में 2.17 करोड़ रुपये का आवंटन/व्यय हुआ। सूची में राजस्थान का जैसलमेर किला, तमिलनाडु का बृहदीश्वर मंदिर और उत्तर प्रदेश के कुछ स्थल भी शामिल थे।

414 संरक्षित स्थलों पर अतिक्रमण का आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत की विरासत और वर्तमान विकास के बीच पैदा हो रहे तनाव की ओर संकेत करता है। तेजी से फैलते शहरों और बदलती भूमि-आवश्यकताओं के बीच हजारों वर्ष पुराने पुरास्थलों को सुरक्षित रखना आसान नहीं है। लेकिन यहां प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए। जिस पुरास्थल ने हजारों वर्ष की सभ्यताओं को पार करके हमारे समय तक पहुंच बनाई है, उसे कुछ दशकों की अनियोजित बस्ती या निर्माण के कारण नष्ट नहीं होने दिया जा सकता।

सरकार का डिजिटल सीमांकन, भूमि अभिलेखों से एकीकरण और अतिक्रमण पर कार्रवाई सही दिशा में कदम हैं। अब जरूरत इस बात की है कि 414 मामलों में स्थलवार स्थिति सार्वजनिक हो, अतिक्रमण का क्षेत्रफल और प्रकृति स्पष्ट की जाए, जिम्मेदारी तय हो और समयबद्ध कार्रवाई की निगरानी हो। ये केवल पत्थर, ईंट और पुरानी इमारतें नहीं हैं। इनमें भारत की स्मृति दर्ज है। किसी स्मारक पर हुआ अतिक्रमण केवल जमीन पर कब्जा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों से उनके इतिहास का एक हिस्सा छीनने का खतरा भी है।

Topics: पुरास्थलअवशेषजियो-रेफरेंसिंगभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभागभुवन पोर्टलअवैध निर्माणऐतिहासिक स्मृतिसंरक्षित स्मारकपाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक पहचानविरासत पर अतिक्रमणएएमएएसआर अधिनियमराष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण
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