क्यों फ्रांस की गैर मुस्लिम फेमिनिस्ट हिजाब के समर्थन में उतरीं?
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क्यों फ्रांस की गैर मुस्लिम फेमिनिस्ट हिजाब के समर्थन में उतरीं?

पूरे यूरोप में हिजाब और नकाब को लेकर अगर सबसे कड़े नियम यदि कहीं हैं तो वह फ्रांस में ही हैं

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Sep 5, 2026, 09:15 pm IST
inविश्व
फ्रांस में हिजाब का समर्थन कर रहीं फेमिनिस्ट

फ्रांस में हिजाब का समर्थन कर रहीं फेमिनिस्ट

क्या यह कल्पना की जा सकती है कि परदे का विरोध करने वाली और महिलाओं की आजादी का समर्थन करने वाली फेमिनिस्ट महिलाएं हिजाब और नकाब के समर्थन में अभियान चलाएंगी? यह प्रश्न इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि फ्रांस में लेफ्ट फेमिनिस्ट महिलाएं हिजाब का समर्थन करते नजर आ रही हैं। वे सोशल मीडिया पर अपने हिजाब पहनने वाले वीडियो पोस्ट कर रही हैं।

ऐसा क्यों कर रही हैं महिलाएं?

दरअसल फ्रांस की राष्ट्रवादी पार्टी की नेता मैरीन ले पेन ने कहा कि अगर उन्हें फ्रांस का राष्ट्रपति बनाया जाता है तो वे पूरे देश में हिजाब और नकाब को प्रतिबंधित करेंगी और सार्वजनिक स्थानों पर इन्हें पहनने वालों पर दंड लगाया जाएगा। हिजाब एक मजहबी प्रतीक नहीं है बल्कि वह फ्रांस की धर्मनिरपेक्षता और महिलाओं की आजादी के खिलाफ जाता है।

फ्रांस में कड़े प्रतिबंध

अल जजीरा ने एक्स पर पोस्ट लिखा कि फ्रांस में 18-49 साल के बीच की लगभग 26 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनती हैं। हालांकि पूरे यूरोप में हिजाब और नकाब को लेकर अगर सबसे कड़े नियम यदि कहीं हैं तो वह फ्रांस में ही हैं। साल 2011 में ही सार्वजनिक स्थानों पर बुर्के अर्थात पूरी तरह से चेहरा ढके जाने पर प्रतिबंध है और साल 2004 से ही स्कूलों में किसी भी प्रकार के धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध है।

गैर मुस्लिम महिलाएं कर रहीं विरोध

मैरीन ले पेन के इस बयान का और कोई नहीं बल्कि गैर मुस्लिम महिलाएं विरोध कर रही हैं।

Women in France launch a solidarity movement with Muslim women after France's far-right party calls for a hijab ban. pic.twitter.com/cYZP8E5tTX

— 𝐌𝐚𝐥𝐜𝐨𝐥𝐦 (@Malcolm_Pal9) September 3, 2026

अगर यह मजहबी चॉइस पर आक्रमण होता तो मुस्लिम महिलाएं इस बयान का विरोध करतीं और हिजाब पहने नजर आतीं, परंतु ऐसा नहीं दिख रहा है। क्या उन्हें ऐसा करने पर पछतावा होगा? या नहीं? या फिर कहा नहीं जा सकता?, पता नहीं! परंतु एक बात तो सच है कि उनके ऐसा करने से उन लोगों की लड़ाई जरूर कमजोर पड़ रही है, जो ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों में अपनी मूलभूत आजादी के लिए लड़ रही हैं।

ईरान में लेफ्ट फेमिनिस्ट का क्रांति के बाद क्या हुआ था?

जिस समय फ्रांस में लेफ्ट फेमिनिस्ट इस बात के आधार पर हिजाब और नकाब पहनने का समर्थन कर रही हैं, उसी समय ईरान में उन मुस्लिम महिलाओं को लगातार शोषण का शिकार बनाया जा रहा है, जो शासन के अनिवार्य हिजाब का विरोध कर रही हैं।

एक समय में ईरान के शाह के विरोध में लेफ्टिस्ट और इस्लामिक ताकतें एक साथ आई थीं और लेफ्टिस्ट महिलाओं ने ईरान के शाह को हटाने के लिए हर तरह का प्रयास किया था। मगर शाह के जाते ही सत्ता खोमेनी और उनके कट्टरपंथी समर्थकों के हाथों में आई और देखते ही देखते उन्होंने सत्ता के सभी प्रमुख संस्थानों (अदालत, मीडिया, सेना और शासन) पर कब्जा कर लिया और साथ ही उनके अधिकारों को भी छीन लिया।

हिजाब अनिवार्य कर दिया गया और लेफ्टिस्ट महिलाएं ही खोमेनी के खिलाफ प्रदर्शन करने पर विवश हुईं और आज 46 सालों बाद भी महिलाएं वहां पर अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। उन्हें पछतावा भी हुआ और यह उन्होंने कहा भी उनकी क्रांति की चोरी हो गई, मगर पछतावे के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह गया था।

भारत की फेमिनिस्ट भी हिजाब को चॉइस बताकर चुप रहती हैं

यह बहुत ही हैरानी की बात है कि ईरान में लेफ्टिस्ट और इस्लामिक क्रांति के बाद महिलाओं के अधिकारों पर डाके के बाद भी फ्रांस सहित यूरोप एवं एशिया में भारत की लेफ्टिस्ट फेमिनिस्ट महिलाएं हिजाब को व्यक्तिगत चॉइस बताकर कट्टरपंथियों के पक्ष में जाकर खड़ी हो जाती हैं।

इतिहास की त्रासदी गलतियां नहीं होती हैं, बल्कि उन गलतियों को बार-बार दोहराना होता है। साल 1979 की ईरान की फेमिनिस्ट महिलाओं की हालत से सबक न लेते हुए भारत और यूरोप की तमाम लेफ्टिस्ट फेमिनिस्ट केवल इस कारण हिजाब के पक्ष में जाकर खड़ी हो जाती हैं कि कहीं उन पर राष्ट्रवादी होने का टैग न लग जाए!

मुस्लिम ब्रदरहुड को दे रहीं मजबूती

दक्षिणपंथी राजनीति के विरोध में फ्रांस की लेफ्टिस्ट और इंटरसेक्शनल फेमिनिस्ट महिलाएं आज हिजाब के समर्थन में हिजाब पहनकर वीडियो पोस्ट कर रही हैं। “दुश्मन का दुश्मन, हमारा दोस्त” के सिद्धांत पर चलकर वे लोग मुस्लिम ब्रदरहुड सहित अन्य कट्टर वैचारिक संगठनों को मजबूती दे रही हैं। वे राष्ट्रवादी सोच का विरोध करने के चलते न ही अनिवार्य हिजाब के कारण मारी जा रही ईरान की महिलाओं के पक्ष मे बोल रही हैं और न ही अफगानिस्तान की लगभग कैद हो चुकी महिलाओं के पक्ष में बोल पा रही हैं। वे अपने अंधे वैचारिक विरोध में उन ताकतों को सामाजिक मान्यता प्रदान कर रही हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं को घरों की चारदीवारी में कैद करना है।

फ्रांस की इन महिलाओं का सोशल मीडिया पर लगातार विरोध हो रहा है। परंतु प्रश्न यही है कि क्या विरोध के ये स्वर लेफ़्टिस्ट फेमिनिस्ट महिलाओं को आईना दिखा सकेंगे? शायद नहीं!

Topics: फ्रांस में हिजाबफ्रांस
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