डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : राष्ट्र को समर्पित अद्वितीय शिक्षक
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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : राष्ट्र को समर्पित अद्वितीय शिक्षक

शिक्षक तब गौरवशाली होता है जब उसके ज्ञान के आलोक में राष्ट्र का गौरव बढ़ता है : डा. राधाकृष्णन

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Sep 5, 2026, 11:01 am IST
inभारत, शिक्षा
शिक्षक दिवस, 5 सितंबर

शिक्षक दिवस, 5 सितंबर

बीसवीं सदी के अमेरिकी पत्रकार डा. जेम्स थॉमस अपने पत्र ‘द हर्बट जनरल’ में लिखते हैं कि ऑक्सफोर्ड के मंच पर सफेद धोती-कुर्ता, सिर पर पगड़ी व माथे पर तिलक लगाये डा. राधाकृष्णन जब “हिन्यू व्यू ऑफ लाइफ” पर बोलने के लिए उतरे तो उनको देखते ही शिकागो के विश्वधर्म मंच पर मौजूद स्वामी विवेकानन्द की याद सहज ही ताजा हो आयी। अकाट्य तर्कों के साथ हिन्दू जीवनशैली पर उनके धारदार प्रतिपादन ने विदेशी भूमि पर भारत का एक नया गौरवमंडित स्वरूप उजागर किया।

राष्ट्र को समर्पित था समूचा जीवन

जीवन के 40 वर्ष एक सफल व लोकप्रिय शिक्षक के रूप में व्यतीत करने वाले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शिक्षा के क्षेत्र में किये गये अमूल्य योगदान के कारण हम भारतवासी प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को उनकी जयंती शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। जाने-माने विद्वान, शिक्षक, वक्ता, प्रशासक, राजनयिक, देशभक्त और शिक्षा शास्त्री के रूप में उन्होंने अपना समूचा जीवन राष्ट्र को समर्पित किया और राष्ट्र ने उन्हें “भारत रत्न” से अलंकृत किया। भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक, आस्थावान हिन्दू विचारक के रूप में उनकी स्मृतियां देशवासियों के हृदय में सदैव जीवित रहेंगी।

दर्शन के महापंडित के रूप में वैश्विक स्वीकार्यता

डा. राधाकृष्णन के उद्बोधनों को सुनकर पाश्चात्य जगत के सभी बुद्धिजीवियों ने एकमत से उन्हें पूर्वी व पश्चिमी दर्शन का महापंडित स्वीकार कर लिया था। ऑक्सफोर्ड के हुए उद्बोधन के बाद विदेशी भूमि पर डॉ. राधाकृष्णन की विद्वता का परचम लहरा गया और देश-विदेश से उन्हें व्याख्यान के आमंत्रण आने लगे। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए भारतीय जीवनदृष्टि का प्रतिपादन करते हुए उन्होंने कहा था कि विश्व मानव की जाति एक होनी चाहिये। मगर यह तभी सम्भव है जब सभी देशों की नीतियों का मूल आधार विश्व-शान्ति की स्थापना का हो। डॉ. राधाकृष्णन की यह जीवनदृष्टि महायुद्ध के मुहाने पर खड़ी आज की दुनिया में आज भी प्रासंगिक है।

जीवन में संभावनाओं के विविध द्वार खोलता है शिक्षक

सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन कहते हैं, “शिक्षक मनुष्य के जीवन में संभावनाओं के विविध द्वार खोलता है। शिक्षक तब गौरवशाली होता है जब उसके ज्ञान के आलोक में राष्ट्र का गौरव बढ़ता है और राष्ट्र अपने जीवन मूल्यों, राष्ट्र की संस्कृति व उत्कृष्ट परम्पराओं को नवजीवन देता है। कोई भी राष्ट्र तब सफल होता है जब उसका शिक्षक अपने उत्तरदायित्वों का; अपने कर्तव्यों का समुचित निर्वहन करता है। वही शिक्षक सफल माना जाता है जब वह अपने विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण, राष्ट्रीयता, करुणा, संवेदनशीलता व सहभागिता का निर्माण करने में सफल होता है। उनका कहना था कि यदि सही तरीके से शिक्षा दी जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। शिक्षक जब तक शिक्षा के प्रति समर्पित नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। शिक्षक उन्हीं लोगों को बनना जाना चाहिए जो सबसे अधिक बुद्धिमान, सहृदय व धैर्यवान हों। शिक्षक का काम है ज्ञान को प्राप्त करना और फिर उसे बांटना। शिक्षा के व्यवसायीकरण के घोर विरोधी डा.राधाकृष्णन विद्यालयों को ज्ञान के शोध केन्द्र, व संस्कृतिक मूल्यों को विकसित करने की टकसाल के रूप में गढ़ना चाहते थे।

शिक्षा से संभव है मानव मस्तिष्क का सर्वोत्तम सदुपयोग

डॉ. राधाकृष्णन की स्पष्ट मान्यता थी कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सर्वोत्तम सदुपयोग किया जा सकता है लेकिन जानकारियां देना मात्र शिक्षा नहीं है। शिक्षा के प्रति मनुष्य के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतान्त्रिक भावना का भी बड़ा महत्व होता है। ये बातें व्यक्ति को एक उत्तरदायी नागरिक बनाती हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डा. राधाकृष्णन अपने बुद्धिमतापूर्ण व्याख्यानों, आनन्ददायी अभिव्यक्तियों और गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। वे अपने छात्रों को सदैव उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने को प्रेरित करते रहते थे। दर्शन जैसे गम्भीर विषय को भी वे अपनी अनूठी शैली से बेहद सरल और रोचक बना देते थे। उनकी शिक्षण शैली इतनी प्रभावशाली थी कि आवारा समझे जाने वाले छात्र भी उनकी कक्षाओं में नियमित उपस्थित रहते थे।

भारत की ज्ञान सम्पदा का परचम लहराने वाले महामानव

इस भारतीय महामानव ने भारत की ज्ञान सम्पदा के एक अभिनव रूप से दुनिया को परिचित कराया। पहली कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले डा. राधाकृष्णन को भौतिक सम्पदा विरासत में भले ही न मिली हो लेकिन ईश्वर अनुरक्ति, हिन्दू धर्म के प्रति आत्मिक अनुराग व शास्त्रों के प्रति अनन्य प्रेम की अक्षय सम्पदा उन्हें पैतृक विरासत में जरूर मिली। इन्हीं जीवन मूल्यों ने उन्हें गांव के एक सामान्य बालक से ऊपर उठाकर विश्व के महान दार्शनिक व देश के राष्ट्रपति के गरिमामय पद तक पहुंचाया। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों “द फिलॉसफी ऑफ रवीन्द्रनाथ टैगोर”, “द रीजन ऑफ रिलीजन इन कोन्टेम्परेरी फिलॉसफी”, और “द हिन्दू व्यू ऑफ लाइफ” ने तत्कालीन विश्व में उनकी विद्वता का डंका बजा दिया।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में डा. राधाकृष्णन की विशेष उपलब्धियां

वर्ष 1913 से 1935 के मध्य डा. राधाकृष्णन उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विशेष रूप से सक्रिय रहे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के मानद कुलपति, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के अलावा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बौद्धिक सहयोग के लिए स्थापित “इन्टरनेशनल इन्टेलैक्चुअल कोऑपरेशन कमेटी” के सदस्य भी रहे। यही नहीं, 1949 से 1952 तक उन्होंने रूस में भारत के राजदूत का पद भी सुशोभित किया था।

स्टालिन पर डा. राधाकृष्णन का गहरा प्रभाव

रूस प्रवास के दौरान उन्होंने वहां के शासक स्टालिन से विशेष भेंट के मौके पर कहा था कि भारत के महान सम्राट अशोक युद्ध में विजयी होने के बाद भिक्षु हो गये थे, कौन जाने; आप भी उस मार्ग का अनुसरण कर लें। कहा जाता है कि रूस से विदा होते समय जब डा. राधाकृष्णन ने भेंट के दौरान स्टालिन के सिर पर स्नेह से हाथ रखा तो उसका गला रुंध गया। उसने डा. राधाकृष्णन को भावपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा कि आप पहले व्यक्ति हैं जिसने मुझे मानव समझा, वरना तो सभी मुझे दैत्य समझते रहे।

 

Topics: शिक्षक दिवसडॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन5 सितंबर का इतिहाससर्वपल्ली राधाकृष्णन कौन थेशिक्षक दिवस क्यों मनाते हैं
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