
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
इतिहास गवाह है कि कोई भी तानाशाह खुद को भले ही कितना ताकतवर क्यों न दिखाए, लेकिन बहुत जल्दी वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है, जहां उसे अपने आसपास के लोगों और सहयोगियों पर भी शक होने लगता है। यहां तक कि वह अपने साए से भी डरने लगता है। इसका सबसे ताजा और सटीक उदाहरण चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग हैं। वे चीन की ताकत के मद में भले ही पूरी दुनिया को हड़काते फिरते हों, लेकिन अपने ही देश के भीतर उनका हाल यह है कि वे अपने आसपास ऐसे हर व्यक्ति, संगठन और शक्ति से डरने लगे हैं, जिसमें अपने बूते पर हिलने-डुलने या खड़े रहने की क्षमता है। फिर चाहे वह चीन की हान जाति के विशाल समुद्र में लाचार अवस्था में तैरने वाली, सबसे निरीह और नाममात्र की संख्या वाली कोई अस्तित्वविहीन और असहाय जनजाति ही क्यों न हो। गत एक जुलाई से चीन में शी जिनपिंग की पहल पर इन निरीह जनजातियों के बचे-खुचे अधिकार भी छीन लेने के लिए एक नया कानून लागू हुआ है, जिसे ‘जातीय एकता और विकास संवर्धन का कानून’ कहा जा रहा है।
इस कानून को इस वर्ष 12 मार्च को चीन की राष्ट्रीय संसद, ‘नेशनल पीपल्स कांग्रेस’, ने पारित किया था। संसद के अनुसार इस कानून का लक्ष्य चीन द्वारा 2035 तक देश की सभी जातियों के लिए समृद्धि का लक्ष्य हासिल करना है। चीन की कुल आबादी लगभग 150 करोड़ है, जिसमें से लगभग 138 करोड़ लोग चीन की मूल हान जाति के हैं। बाकी 10 से 12 करोड़ आबादी उन 55 जातियों और राष्ट्रीयताओं की है, जो या तो हान जाति के विशाल समुद्र में घिरे अर्थहीन टापू जैसे बन चुके हैं या फिर उन तिब्बती, उइगुर, मंगोल, हांगकांगर्स और मंचूरियन जैसे समाजों के लोग हैं, जिन पर पिछले सात-आठ दशक से चीनी हान शासकों ने जबरन कब्जा जमाया हुआ है।
1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना के बाद कम्युनिस्ट शब्दावली में इन सभी जातियों और राष्ट्रीयताओं को मिलाकर ‘56-बहनों’ के ‘संयुक्त और खुशनुमा परिवार’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। 2021 के चीनी जनगणना आंकड़ों के अनुसार शेष गैर-हान नागरिकों का कुल अनुपात लगभग 8 प्रतिशत है। इस नए कानून की सबसे बड़ी ‘खासियत’ यह है कि इसका लक्ष्य इन सभी गैर-हान जातियों की जातीय, भाषायी और सांस्कृतिक पहचान को पूरी तरह समाप्त करके उन्हें हान जाति में रंग देना है, ताकि पूरा चीन ‘जातीय एकता’ की एक अनूठी मिसाल बन सके।
हैरानी की बात यह है कि शी जिनपिंग के सत्ता में आने से पहले चीन के पहले कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग (जेदोंग) ने चीन के नए संविधान में चीन के अल्पसंख्यकों और राष्ट्रीयताओं के लिए अपनी अलग सांस्कृतिक और भाषायी पहचान बनाए रखने तथा जातीय स्वायत्तता की रक्षा के लिए समुचित व्यवस्था रखी थी। यहां तक कि इस संविधान में केंद्र सरकार को इसके लिए समुचित वातावरण बनाने का भी निर्देश था। लेकिन राष्ट्रपति शी के नए कानून में एकदम स्पष्ट कर दिया गया है कि पूरे चीनी राष्ट्र की एक ‘साझा पहचान’ होगी, जो देश की सभी जातियों से जुड़े सभी मामलों के केंद्रीय नियमों का आधार होगी। इस कानून में चीन की ऐतिहासिक पहचान का मूल आधार उसकी हान संस्कृति होगी, जो ‘चीन रूपी वृक्ष का तना’ होगी, जबकि बाकी जातियों का स्थान उसकी टहनियों और पत्तों जैसा होगा। नए कानून में चीन की विभिन्न जातियों की भाषायी पहचान को लगभग पूरी तरह समाप्त करने का प्रावधान तय कर दिया गया है।
इसमें पूरे चीन में किंडरगार्टन से लेकर हाई स्कूल तक की स्कूली शिक्षा के लिए केवल चीनी मंदारिन भाषा का प्रावधान है और स्पष्ट कर दिया गया है कि अब तक तिब्बती, उइगुर, मंगोल तथा अन्य स्थानीय भाषाओं की पढ़ाई की जो व्यवस्था थी, उसे समाप्त कर दिया गया है। यहां तक कि अगर कहीं सार्वजनिक बोर्डों पर गैर-चीनी भाषा का उपयोग करना पड़े तो वहां चीनी भाषा को मोटे अक्षरों में लिखा जाएगा। जिन क्षेत्रों में गैर-हान जातियों के लोग रहते हैं, वहां स्थानीय प्रशासन के लिए निर्देश जारी किया गया है कि वहां सबके लिए साझा रूप से ‘रहने, शिक्षा प्राप्त करने, निर्माण करने और काम करने’ की व्यवस्था रखना अनिवार्य होगा। इस कानून में अल्पसंख्यक समाजों को हान जाति में घोलने के लिए स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाएगा और यदि कोई व्यक्ति या परिवार धार्मिक या जातीय आधार पर ऐसे विवाह के रास्ते में आने का प्रयास करेगा तो उसे दंडित किया जाएगा।
नए कानून में अल्पसंख्यक समाजों के लिए स्पष्ट आज्ञा है कि भविष्य में उन्हें अपनी सभी रीति-रिवाजों, सामाजिक परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियमों और ‘सामाजिक नैतिकता’ के अनुकूल ढालना अनिवार्य होगा। परिवारों के बच्चों को चीन के कम्युनिस्ट नियमों के अनुकूल ढालने के लिए भी इस कानून में कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं। बच्चों के माता-पिता और अन्य अभिभावकों के लिए यह कानूनी बाध्यता है कि वे अवयस्क बच्चों को ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति प्रेम’ करने का पाठ पढ़ाएं और उन्हें ऐसी किसी भी परंपरा या विचार से परिचित कराने का प्रयास न करें, जो देश की ‘जातीय एकता’ के अनुकूल न हो। इससे पहले पिछले कुछ वर्षों से तिब्बत और शिंजियांग में वहां के 4 से 14-15 साल के बच्चों को उनके परिवारों से जबरन अलग करके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ऐसे आवासीय विद्यालयों में डाला जा चुका है, जहां उन्हें हान संस्कृति और चीनी भाषा के ज्ञान के अलावा उनकी ‘कम्युनिस्ट ब्रेनवॉशिंग’ की जाती है।
पूरे चीन को हान चीनी रंग में रंग डालने और गैर-हान जातियों की सांस्कृतिक तथा सामाजिक पहचान को सिरे से समाप्त करने वाले इस नए कानून में जातीय एकता को सीधे-सीधे ‘चीन की सीमाओं की सुरक्षा, राष्ट्रीय संसाधनों के बंटवारे और सामाजिक स्थायित्व’ जैसे विषयों से जोड़ा गया है। इसमें इंटरनेट के अलग-अलग प्लेटफार्मों को चलाने वाली कंपनियों और सामान्य नागरिकों पर इंटरनेट पर चलने वाली ऐसी जानकारी और सामग्री पर नजर रखने, उसे सेंसर करने और उसके बारे में सरकार को सूचित करने की जिम्मेदारी डाली गई है, जो किसी भी मायने में ‘जातीय एकता को हानि पहुंचाने’ की क्षमता रखती हो। लेकिन इस नए कानून का सबसे शक्तिशाली प्रावधान यह है कि यह केवल चीन के अपने नागरिकों और चीन में रहने वाले अल्पसंख्यक समाजों पर ही लागू नहीं होगा, बल्कि चीन के बाहर पूरी दुनिया पर भी लागू होगा। इस कानून में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि चीन के बाहर किसी भी देश में कोई विदेशी व्यक्ति या संगठन इस कानून का उल्लंघन करते हैं या इस चीनी कानून की आलोचना करते हैं तो उन्हें चीन के जातीय कानूनों को तोड़ने का दोषी माना जाएगा और चीन की जातीय एकता को तोड़ने के अपराध में उन्हें सजा दी जाएगी।
इस नए कानून की भले ही दुनिया भर में आलोचना हो रही हो, लेकिन चीन पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों और शी के आलोचकों को इस पर हैरानी नहीं है। 2012 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वशक्तिमान महासचिव और मिलिटरी कमीशन के चेयरमैन के पद पर आने के चार महीने बाद ही वे देश के राष्ट्रपति पद पर भी काबिज हो गए। उसके बाद से ही शी ने तेजी से सत्ता प्रतिष्ठान के हर उस अंग पर निजी कब्जा जमा लिया है, जहां से वे पूरे तंत्र पर अपनी जकड़ बनाए रख सकते हैं। अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए वे भ्रष्टाचार के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टी, चीनी सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और चीनी प्रशासन में से अपने विरोधियों का विशाल पैमाने पर सफाया कर चुके हैं।
चीन के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वे इस तरह के कम से कम 50 लाख लोगों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर चुके हैं और लाखों को उनके पदों से हटा चुके हैं या जेल भेज चुके हैं। इनमें 500 से ज्यादा पीएलए जनरल और अति वरिष्ठ सैन्य अधिकारी तथा पोलित ब्यूरो जैसे स्तर के पार्टी नेता भी शामिल थे, जिन्हें उनके लिए खतरा माना जा रहा था। कोविड के दिनों में जब पूरे देश में लॉकडाउन चल रहा था, तब भी शी जिनपिंग के आदेश पर ऐसे सैकड़ों अधिकारी और नेता सिरे से गायब हो गए, जिन्हें वे अपनी गद्दी के लिए खतरा मानते थे। इन सबके बाद भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ यह कड़ा कानून दिखाता है कि शी अभी भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में चीनी जनसंख्या की मात्र आठ प्रतिशत आबादी को नियंत्रित करने के लिए लाया गया यह कानून किसी भी मनोवैज्ञानिक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि शी जिनपिंग और उनकी कम्युनिस्ट पार्टी आखिर क्यों इस हद तक खौफजदा हैं?
इस सवाल का एक जवाब चीन की सरकारी व्यवस्था और दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियों के चरित्र में ढूंढा जा सकता है। पिछले 76 साल में चीन जैसे देश में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी पुलिस, सेना और प्रशासन के हिंसक उपयोग के बूते पर आम नागरिक को इस हद तक आतंकित करने में सफल रही है कि वे कभी भी संयुक्त रूप से स्वयं को संगठित नहीं कर पाए। 1989 के तिएन अनमन के युवा आंदोलन और कोविड के दिनों में अचानक उठ खड़े हुए जन-उभार के सामने कम्युनिस्ट शासन कुछ देर के लिए जरूर डगमगा गया था। लेकिन समाज के स्तर पर किसी साझा सोच या संगठन के अभाव में ये दोनों आंदोलन शासन की हिंसा और कुटिलता के सामने लंबे समय तक नहीं टिक पाए।
संयोग से फालुन-गांग जैसे सांस्कृतिक आंदोलन की विशाल लोकप्रियता के बावजूद उसमें भी सदस्यों को जोड़ने वाली कोई सांस्कृतिक पहचान और संगठन क्षमता नहीं थी, जिस कारण कम्युनिस्ट सरकार उसे कुचलने में सफल रही। इतिहास में एक संभावना मंचूरिया में थी। यह मंचूरियन जाति ही थी, जिसने हान चीनियों पर 296 साल तक (1616 से 1912) राज किया था। लेकिन 1945 के बाद के आठ दशक में जिस तरह से चीन की हान जाति और हान सरकारों ने मंचूरियन संस्कृति और पहचान को नष्ट करने में सफलता पाई, उसके बाद मंचूरियन जाति उठने योग्य नहीं रही।
चीनी जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार आज भी लगभग एक करोड़ मंचूरियन चीन में रहते हैं। लेकिन उनकी सांस्कृतिक पहचान को हान चीनियों ने इस हद तक नष्ट कर डाला है कि पूरे चीन में आज मंचूरियन भाषा बोलने वालों की कुल संख्या 200 से भी कम बची है। मंचूरिया का अस्तित्व या तो दुनिया भर में लोकप्रिय ‘मंचूरियन फूड’ के रूप में बचा है या फिर चीन के कुनमिंग शहर के उस जनजातीय संग्रहालय में, जहां हान जाति के कर्मचारी मंचूरियन पहचान ओढ़कर विदेशी पर्यटकों को मूर्ख बनाते हैं। लेकिन फालुन-गांग और मंचूरिया के ठीक विपरीत तिब्बत, शिंजियांग (चीनी कब्जे से पहले का नाम ‘रिपब्लिक ऑफ ईस्ट तुर्किस्तान’), दक्षिणी मंगोलिया और हांगकांग की साझा पहचान तथा वहां की जनता की ऐतिहासिक स्मृति ऐसे दो तत्व हैं, जिनका जवाब या तोड़ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और सरकार दोनों के पास नहीं है। इसीलिए उन्हें इन कब्जाई हुई राष्ट्रीयताओं पर नई पाबंदियां लगाने के लिए यह कानून लाना पड़ा है।
(लेखक की नवीनतम पुस्तक ‘चायना कोलोनियल गेम्स इन टिबेट’ इन दिनों काफी चर्चा में है। )