प्रश्न केवल यह नहीं है कि डॉ. भागवत के कार्यक्रम का विरोध क्यों किया गया, बल्कि यह भी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलतावाद के सबसे बड़े दावेदार माने जाने वाले समाजों में असहमति के अधिकार की सीमाएँ आखिर कौन और किस आधार पर निर्धारित कर रहा है?
इसी प्रश्न की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति 29 अगस्त 2026 को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ (सार्वभौमिक एकता समारोह) में देखने को मिली। कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के बीच संवाद, एकता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को सामने रखना था। आयोजन ‘अमेरिकन हिंदूज़ फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग’ द्वारा किया गया था और इसे विभिन्न हिंदू-अमेरिकी संगठनों का समर्थन प्राप्त था। इस आयोजन में अमेरिका के लगभग 29 राज्यों, 850 शहरों सहित 29 देशों से आए लगभग 6,000 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए और इसे 250 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों का समर्थन प्राप्त होने की रिपोर्ट सामने आई।
जोहरान ममदानी का मोहन भागवत का विरोध
इसके बावजूद न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने कार्यक्रम के प्रति सार्वजनिक असहमति जताई और 61 संगठनों ने कार्यक्रम को रद्द करने की मांग की। कार्यक्रम अंततः संपन्न हुआ और अपने घोषित उद्देश्य की पूर्त्ति में पूर्णतया सफल रहा, लेकिन इससे एक बुनियादी लोकतांत्रिक प्रश्न अवश्य उभरा, क्या किसी वक्ता को सुने बिना ही उसके विचारों और संगठन को ‘बहिष्कारी’ घोषित कर देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलतावाद की उस तथाकथित उदार परंपरा के अनुरूप है, जिसका पश्चिम और अमेरिका लंबे समय से वैश्विक मानक के रूप में दावा करते रहे हैं?
विरोध की व्यापकता इसे केवल किसी एक व्यक्ति की आपत्ति या त्वरित-तात्कालिक प्रतिक्रिया का विषय नहीं रहने देती। 61 संगठनों के अभियान में विभिन्न धार्मिक और नागरिक अधिकार समूह एक साझा मंच पर दिखाई दिए। इनमें ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HFHR) भी प्रमुख रूप से सक्रिय था और उसकी कार्यकारी निदेशक सुनीता विश्वनाथ ने स्वयं कहा कि उनका संगठन उन 61 अंतरधार्मिक एवं धर्मनिरपेक्ष संगठनों में शामिल था, जिन्होंने कार्यक्रम के विरोध में खुला पत्र जारी किया। सोचने वाली बात है कि सुनीता विश्वनाथ जिस संगठन का प्रतिनिधित्व करती हैं, वह घोषित तौर पर भले ही हिंदू समाज एवं सरोकार को समर्पित है, परंतु लंबे समय से उनका संगठन और वे स्वयं भारत, हिंदुत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुद्दों पर मुखर अंतरराष्ट्रीय आलोचनात्मक अभियानों में सक्रिय रही हैं।
दुनियाभर में हिन्दुओं को बांटने की साजिश
ऐसा प्रतीत होता है कि इस संगठन का नाम भी इस सोच के साथ रखा गया है कि दुनिया को यह संदेश दिया जा सके कि स्वयं हिंदुओं के भीतर भी संघ व उसकी विचारधारा को लेकर व्यापक असंतोष है। उल्लेखनीय है कि ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ की स्थापना 2019 में हुई और संगठन स्वयं को मानवाधिकार, नागरिक अधिकार और धार्मिक बहुलतावाद के पक्ष में काम करने वाला संगठन बताता है। किंतु उसके सार्वजनिक अभियानों को देखें तो भारत की नीतियों, हिंदुत्व और निर्वाचित-सत्तारूढ़ केंद्र सरकार की तीखी आलोचना उनमें लगातार दिखाई देती है। नागरिकता संशोधन कानून, ‘हाऊदी मोदी’ कार्यक्रम और ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ जैसे अभियानों तथा विमर्शों में उसकी सक्रियता ने उसे भारत और हिंदुत्व की आलोचना करने वाले अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में एक मुखर नाम बनाया है।
इसे भी पढ़ें: ‘अगर हिंदू जागेगा तो दुनिया जागेगी’ – टोरंटो में सरसंघचालक मोहन भागवत का शक्तिशाली संदेश
भारत विरोधी नैरेटिव्स को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया
भारत से जुड़े विभिन्न आलोचनात्मक नैरेटिव्स को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाने में ऐसे संगठनों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इनके द्वारा प्रयुक्त शब्दावली और आरोप बाद में मीडिया, राजनीतिक समूहों तथा नीति-विमर्श में भी दिखाई देने लगते हैं। उनकी राजनीतिक सक्रियता का एक उल्लेखनीय संदर्भ राहुल गांधी की अमेरिकी यात्रा भी है। 2023 में वॉशिंगटन डीसी में राहुल गांधी के थिंक-टैंक संवाद से जुड़ी तस्वीरों में वे उनके साथ दिखाई दी थीं। इस संपर्क को लेकर भारत में राजनीतिक विवाद भी हुआ और उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि तथा राहुल गांधी के साथ उनके संबंधों पर सार्वजनिक प्रश्न उठाए गए।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी राजनीतिक नेता के साथ किसी एक्टिविस्ट की तस्वीर मात्र उसके विचारों को गलत सिद्ध नहीं करती। लेकिन, जब कोई व्यक्ति लंबे समय से भारत से संबंधित एक विशिष्ट आलोचनात्मक आख्यान के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय प्रसार में सक्रिय हो और बाद में उसी वैचारिक पृष्ठभूमि के अनुरूप किसी कार्यक्रम के विरोध में प्रमुख भूमिका निभाए, तो उसकी प्रतिक्रिया, उसके तर्कों और उसके व्यापक नेटवर्क की स्वतंत्र पड़ताल स्वाभाविक रूप से आवश्यक हो जाती है। और यही वह बिंदु है जहाँ न्यूयॉर्क में दिए गए डॉ. मोहन भागवत जी के संदेश को भी साथ रखकर देखने की आवश्यकता है। जिस मंच पर वे ‘अस्तित्व की एकता’ को मानवता का सत्य बताते हुए विविधता को स्वीकार करने, उसका सम्मान करने और उसे अपनी एकात्मता से जोड़ने की बात कर रहे थे, उसी व्यापक विमर्श में किसी वक्ता को उसके विचार सुने बिना ही ‘बहिष्कारी’ अथवा अस्वीकार्य घोषित करने की प्रवृत्ति अपने आप में एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।
ध्यान रहे कि विरोध की यह शृंखला केवल सुनीता विश्वनाथ तक सीमित नहीं है। डॉ. मोहन भागवत जी के न्यूयॉर्क कार्यक्रम के विरोध में सामने आए 61 संगठनों की सूची को देखें तो इसमें ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ के साथ ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (आईएएमसी), ‘जस्टिस फॉर ऑल’, ‘इंटरफेथ सेंटर ऑफ न्यूयॉर्क’ सहित अनेक धार्मिक, नागरिक अधिकार और एक्टिविस्ट संगठन दिखाई देते हैं। इन संगठनों की पृष्ठभूमि और उनके पिछले अभियानों को एक साथ रखकर देखने पर एक महत्वपूर्ण पैटर्न सामने आता है। आईएएमसी के मामले में यह पैटर्न विशेष रूप से स्पष्ट है। यह संगठन और इसके वर्तमान प्रमुख मुहम्मद जवाद भारत में हिंदुत्व, संघ और मोदी सरकार से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाते रहे हैं।
साथ ही, गाजा और इजरायल के प्रश्न पर भी उनका रुख अत्यंत मुखर रहा है। 2023 में गाजा युद्ध के दौरान आईएएमसी ने अमेरिकी नगर परिषदों से तत्काल युद्धविराम की मांग की और अपने वक्तव्य में इजरायल के कब्जे तथा फिलिस्तीनी क्षेत्रों की स्थिति को लेकर तीखी भाषा का इस्तेमाल किया। विरोध की इस परिपाटी को साथ रखकर देखने पर स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत और इजरायल संबंधी उसकी राजनीतिक सक्रियता किसी समान वैचारिक ढाँचे में काम करती है और क्या उसकी भारत अथवा इजरायल संबंधी आलोचनात्मक टिप्पणियों के पीछे राजनीतिक एवं वैचारिक आग्रहों के साथ इस्लामिक रुझान या मजहबी कट्टरता की भी भूमिका है?
अमेरिका में बैठा अब्दुल मुजाहिद भी करता है भारत विरोध
विरोध की इसी कड़ी में तीसरा नाम ‘जस्टिस फॉर ऑल’ के अध्यक्ष अब्दुल मलिक मुजाहिद का है। मुजाहिद भी लंबे समय से अमेरिकी मुस्लिम एक्टिविज्म और अंतर्धार्मिक गतिविधियों में सम्मिलित रहे हैं। उनके संगठन के वर्तमान अभियानों में फिलिस्तीन को लेकर इजरायल पर अत्यंत गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं। जून 2026 में उसकी रिपोर्ट का शीर्षक ही था, “पैलेस्टाइन; अपरथेड फ्यूल्स जेनोसाइड।” इस संगठन द्वारा प्रसारित विभिन्न सामग्रियों और अभियानों में “सेव इंडिया फ्रॉम फासिज्म”, “कश्मीर एक्शन” जैसे विवादित अभियान प्रमुख रहे हैं।
इन तथ्यों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत और इजरायल से जुड़े प्रश्नों पर उनकी यह सक्रियता केवल एक-दो प्रतिक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से चले आ रहे एक ढाँचागत वैचारिक आग्रह का हिस्सा है। इस परिदृश्य की एक और महत्वपूर्ण परत अमेरिकी धार्मिक-स्वतंत्रता विमर्श में दिखाई देती है। 26 अगस्त को अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) के पाकिस्तानी मूल के अध्यक्ष आसिफ महमूद ने डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा के संदर्भ में भारत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गंभीर आरोप लगाए तथा संघ से जुड़े लोगों के विरुद्ध प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की मांग का समर्थन किया। भारत पर आयोग के पूर्ववर्ती वक्तव्यों और सुनवाइयों में भी सीएए, एनआरसी, जम्मू-कश्मीर, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे विषयों को धार्मिक स्वतंत्रता के विमर्श से जोड़ा गया है।
न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी भी अपने फिलिस्तीन समर्थक रुख तथा इजरायल, भारत, यहूदी और सनातन विरोधी सुरों के लिए जाने जाते हैं। यह कोई पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने अपनी मजहबी सोच के वशीभूत होकर संघ-प्रमुख डॉ. मोहन भागवत जी का विरोध किया हो। इससे पूर्व भी अनेक अवसरों पर वे अपनी इस्लामिक कट्टरपंथी सोच को उजागर कर चुके हैं। उन्होंने एक संप्रभु राष्ट्र के निर्वाचित एवं लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “युद्ध अपराधी” तक कह डाला। इतना ही नहीं, 2023 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान उनके विरोध में अन्य दक्षिण एशियाई जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया तथा भारत सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने का मुखर विरोध किया।
वे यूएपीए कानून के अंतर्गत जेल में बंद उमर खालिद के समर्थन में बयान जारी कर चुके हैं, विवादित ढाँचे के स्वतःस्फूर्त विध्वंस पर भाजपा पर दंगे भड़काने का आरोप लगा चुके हैं, नेतन्याहू की गिरफ्तारी का आह्वान कर चुके हैं, “हमास” जैसे संगठन को आतंकवादी कहने से बचते रहे हैं और “ग्लोबलाइज द इंतिफादा”, यानी हिंसक विद्रोह के वैश्वीकरण जैसे नारों की निंदा करने से भी इनकार कर चुके हैं। स्पष्ट है कि उनका यह रुख उन्हें एक संप्रभु राष्ट्र के निर्वाचित मेयर से अधिक एक कट्टरपंथी-मजहबी राजनेता के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी निष्पक्षता और तटस्थता पर गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं।
मुद्दे और प्रसंग भले अलग-अलग रहे हों, लेकिन भारत को लेकर निर्मित यह चयनात्मक आलोचनात्मक आख्यान केवल एक्टिविस्ट समूहों तक सीमित नहीं दिखाई देता। उसका प्रभाव अमेरिकी संस्थागत और नीति-विमर्श में भी परिलक्षित होता है। न्यूयॉर्क की स्थानीय राजनीति, एक्टिविस्ट संगठनों, भारत-केंद्रित मुस्लिम एवं मानवाधिकार समूहों और धार्मिक-स्वतंत्रता संस्थाओं की भूमिकाओं को एक साथ रखकर देखने पर एक ऐसा वैचारिक ईकोसिस्टम सामने आता है, जिसमें अलग-अलग मंचों से उठने वाले तर्क, आरोप और नैरेटिव कई बार एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं। एक मंच पर लगाया गया आरोप दूसरे मंच पर संदर्भ बनता है, दूसरा मंच उसे वैधता देता है और अंततः वही आरोप सार्वजनिक विमर्श में स्थापित तथ्य की तरह प्रस्तुत होने लगता है। इसलिए भारत और उसकी सनातन सांस्कृतिक चेतना के बारे में निर्मित किए जा रहे आख्यानों की पड़ताल जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक उन आख्यानों के पीछे सक्रिय वैचारिक शक्तियों, उनके वैश्विक अंतर्संबंधों और उनके बीच बनने वाले अभियानगत गठजोड़ों को समझना भी है।














