26 अगस्त 2026 को नेपाल और तिब्बत की सीमा पर अचानक बाढ़ आने के कारण वहां बहुत ही भयानक तबाही हुई। इस आपदा में अब तक 165 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि, 844 से अधिक लोगों के लापता होने की खबर सामने आ रही है। इसमें करीब 133 भारतीय भी शामिल हैं।
ये बाढ़ ल्हेंदे खोला और भोटे कोशी नदी प्रणाली में आई। इसने सड़कें, पुल और मकान बहा दिए। साथ में कीचड़ का भूस्खलन भी हुआ, जिससे तिब्बत-नेपाल का बड़ा सीमा पार बिंदु ग्यिरोंग पोर्ट ठप पड़ गया। बिजली और संचार व्यवस्था भी चरमरा गई क्योंकि जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो गया।
यह पहली बार नहीं है। पिछले साल भी इसी नदी प्रणाली में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) आया था। उससे चार बड़े हाइड्रोपावर प्लांट क्षतिग्रस्त हुए थे और नेपाल की बिजली आपूर्ति का करीब 8 प्रतिशत प्रभावित हो गया था। इस बार की बाढ़ का असली कारण अभी साफ नहीं है। अधिकारी कह रहे हैं कि ऊपर की तरफ भूकंप से हिमस्खलन हुआ होगा, लेकिन आधिकारिक जांच अभी बाकी है।
फ्लैश फ्लड कैसे होता है?
फ्लैश फ्लड यानी अचानक और तेज पानी का उफान। यह कम समय में निचले इलाकों को पानी से भर देता है। पहाड़ी इलाकों में यह पानी बहुत तेजी से चलता है और रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले जाता है। नीचे रहने वाले लोगों को अक्सर चेतावनी का समय नहीं मिल पाता। इस बार भी बाढ़ ने हाइड्रोपावर प्लांट और संचार उपकरण जैसे भारी इंफ्रास्ट्रक्चर को तुरंत नुकसान पहुंचाया। प्रभावित सीमा क्षेत्रों का बाहर से संपर्क टूट गया।
भूकंप एवलांच कैसे ट्रिगर कर सकता है?
हिमालय की ऊंची चोटियों पर बड़े ग्लेशियर और ढीले चट्टान-मिट्टी के ढेर होते हैं। भूकंप आने पर ये असंतुलित हो जाते हैं और चट्टान, बर्फ, कीचड़ सब एक साथ खिसक पड़ता है। रिपोर्टों के मुताबिक, अधिकारियों को शक है कि ल्हेंदे खोला नदी में भूकंप से बर्फ-चट्टान का एवलांच हुआ। यह नदी भोटे कोशी की ऊंचाई वाली सहायक नदी है और संकरी है। एवलांच का मलबा पानी के साथ बहते हुए बीच में अस्थायी बांध जैसा बन गया। पानी पीछे जमा होता गया और दबाव बढ़ने पर यह बांध टूट गया। फिर पानी और मलबा मिलकर तेज गति से नीचे बस्तियों की तरफ चला गया।
अधिकारी बता रहे हैं कि ऊपर ल्हेंदे खोला में अभी भी मलबा अटका हो सकता है, इसलिए दूसरी बाढ़ का खतरा भी बना हुआ है।
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नेपाल की भौगोलिक स्थिति क्यों खास है?
नेपाल में दुनिया की कुछ सबसे ऊंची चोटियां हैं और साथ में संकरी लेकिन गहरी नदी घाटियां भी। यह मिलाजुला स्वरूप पानी को फनल की तरह तेजी से नीचे भेजता है, जिससे विनाश की क्षमता बढ़ जाती है। इस भूगोल की वजह से राहत कार्य भी मुश्किल हो जाते हैं। अधिकारी कह चुके हैं कि बाढ़ का पानी उतरने तक रेस्क्यू हेलीकॉप्टर प्रभावित इलाकों में नहीं उतर सकते। रहने लायक घाटियां संकरी होने से लोग एक जगह इकट्ठा रहते हैं, इसलिए एक बाढ़ से पूरा समुदाय अलग-थलग पड़ सकता है।
पानी नीचे उतरते समय नदी के तल और किनारों से मिट्टी-पत्थर भी उखाड़ ले जाता है। इससे चीन के 574 रेस्क्यू कर्मियों को ग्यिरोंग पोर्ट पर काम करने में दिक्कत हो रही है। ल्हेंदे खोला एक सीमा पार नदी है। यह नेपाल और चीन दोनों से होकर गुजरती है और भोटे कोशी की सहायक है। भोटे कोशी, त्रिशूली और नारायणी नदियों का नेटवर्क जुड़ा हुआ है। ये सब पहाड़ों से नीचे मैदान की तरफ बहती हैं। इसी वजह से भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश में भी बाढ़ की चेतावनी जारी कर दी गई।
ये तेज बहने वाली नदियां हाइड्रोपावर के लिए भी इस्तेमाल होती हैं। विदेशी निवेश और मजदूर यहां आते हैं। बाढ़ में एक हाइड्रोपावर प्लांट प्रभावित होने से आठ दक्षिण कोरियाई मजदूर भी लापता बताए जा रहे हैं।

















