भारत में खेल संस्कृति हजारों वर्षों से हमारे जीवन का अभिन्न भाग रही है। मल्लयुद्ध, धनुर्विद्या, रथ-दौड़, घुड़सवारी, मल्लखंभ, कुश्ती और योग जैसी परंपराएं शरीर, मन और चरित्र निर्माण का माध्यम रही हैं। महाभारत और अन्य ग्रंथों में शारीरिक सामर्थ्य, अनुशासन, कौशल और आत्मसंयम को जीवन-मूल्यों से जोड़ा गया है। ‘मल्लपुराण’, ज्येष्ठीमल्ल अखाड़ों और धोलावीरा के सार्वजनिक परिसरों में इसकी ऐतिहासिक झलक मिलती है। आज आधुनिक खेल विज्ञान और वैश्विक प्रतियोगिताओं ने भारत की खेल यात्रा को नई गति दी है। टोक्यो ओलंपिक में 7, टोक्यो पैरा-ओलंपिक में 19 और पेरिस पैरा-ओलंपिक में 29 पदक इस परिवर्तन के प्रमाण हैं। आवश्यकता है कि आधुनिक खेल विज्ञान को भारतीय ज्ञान-परंपरा से जोड़कर स्वस्थ, अनुशासित और राष्ट्रभाव से संपन्न खिलाड़ियों का निर्माण किया जाए। यही भारतीय खेल-दृष्टि का आधुनिक पुनर्जागरण होगा।

भारत में खेलों की तस्वीर पिछले एक दशक में जितनी बदली, उतनी शायद स्वतंत्र भारत के किसी अन्य दशक में नहीं। खेल अब केवल कुछ प्रतिभाशाली खिलाड़ियों, चुनिंदा संघों या क्रिकेट तक सीमित नहीं। इसे युवा विकास, स्वास्थ्य, अनुशासन, रोजगार, महिला सशक्तीकरण, सामाजिक समावेशन और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़ा जा रहा है। गांवों और छोटे शहरों से निकलकर खिलाड़ी विश्व मंच पर तिरंगा फहरा रहे हैं और खेलों को आजीविका का विकल्प मानने वाले युवा भी बढ़ रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रदर्शन है। टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत ने 7 पदक जीते। पेरिस ओलंपिक 2024 में 6 पदक रहे, पर कई खेलों में भारत की मौजूदगी दिखी। पैरा-खिलाड़ियों का प्रदर्शन असाधारण रहा। एशियाई स्तर पर भी तस्वीर बदली। हांगझोउ एशियाई खेलों में भारत ने 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य सहित 107 पदक जीते और चौथे स्थान पर रहा। यह पहला मौका था, जब भारत ने एशियाई खेलों में 100 से अधिक पदक जीते। फिर एशियाई पैरा खेलों में 111 पदक जीतकर इतिहास रचा।
अब ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल-2026 में निशानेबाजी और कुश्ती जैसे पारंपरिक पदक-खेलों की अनुपस्थिति के बावजूद 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित 39 पदक जीते और चौथा स्थान हासिल किया। मुक्केबाजों ने 7 स्वर्ण सहित 10 पदक जीते। यह बढ़ती विविधता और नई प्रतिभाओं के उभार का संकेत है। इन उपलब्धियों के पीछे केवल व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं, बल्कि पिछले दशक में तैयार नया खेल पारिस्थितिकी तंत्र है। भारत ने मजबूत नींव रखी है, पर विश्व खेल शक्ति बनने की मंजिल अभी दूर है। स्कूल से ओलंपिक पोडियम तक की पूरी व्यवस्था को अधिक वैज्ञानिक, पारदर्शी, समावेशी और परिणामोन्मुख बनाना होगा।
खेल नीति में आया बुनियादी बदलाव
भारत में खेल नीति का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब खेलों को केवल पदक जीतने की गतिविधि नहीं माना जा रहा। ‘खेलो इंडिया’ जैसी योजनाओं का उद्देश्य जनभागीदारी बढ़ाने के साथ प्रतिभा पहचान, अवसंरचना, प्रशिक्षण, महिला भागीदारी, दिव्यांग खिलाड़ियों और ग्रामीण व पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देना है। सरकार के अनुसार इसके पांच प्रमुख घटक हैं- खेल अवसंरचना, प्रतियोगिता एवं प्रतिभा विकास, खेलो इंडिया केंद्र एवं अकादमियां, फिट इंडिया और समावेशी खेल। 2016-17 में शुरू हुई ‘खेलो इंडिया’ योजना ने लगातार विस्तार किया। 2021-22 से 2025-26 तक पांच वर्ष के लिए 3,790.50 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय स्वीकृत हुआ, जिसका उद्देश्य खेल संस्कृति और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना था।
2025-26 में योजना के लिए 1,000 करोड़ रुपये आवंटित हुए, जो वर्षांत में 700 करोड़ रुपये रह गया। 2026-27 के बजट में ‘खेलो इंडिया’ के लिए 924.35 करोड़ रुपये का प्रावधान है। साथ ही, खेल सामग्री निर्माण के लिए 500 करोड़ रुपये की नई पहल शुरू की गई, जिसका लक्ष्य घरेलू उत्पादन, अनुसंधान, नवाचार और रोजगार को बढ़ावा देना है। 2026-27 में युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय का कुल आवंटन 4,479.88 करोड़ रुपये रहा, जो अब तक का सर्वाधिक। यह बदलाव केवल बजट में नहीं, संस्थागत ढांचे में भी दिखता है। 2025 तक 1,045 से अधिक खेलो इंडिया केंद्र, 34 राज्य उत्कृष्टता केंद्र और 306 मान्यता प्राप्त खेल अकादमियां दर्ज हुईं। 2,845 खेलो इंडिया खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा सहायता और मासिक भत्ता जैसी सुविधाएं मिल रही थीं। इसका अर्थ है कि भारत अब केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता से कुछ महीने पहले तैयारी के बजाय दीर्घकालिक प्रतिभा-निर्माण की दिशा में बढ़ रहा है।
गांव से खेल मैदान तक
भारत की खेल शक्ति का वास्तविक आधार शहरों के स्टेडियम नहीं, बल्कि गांवों, कस्बों और स्कूलों के मैदान हैं। यदि करोड़ों बच्चों को नियमित खेल का अवसर नहीं मिलेगा, तो ओलंपिक स्तर के खिलाड़ियों की बड़ी संख्या में पहचान संभव नहीं होगी। इस दिशा में खेलो इंडिया केंद्रों का विस्तार महत्वपूर्ण कदम है। 2023 तक 679 जिलों में 1,000 खेलो इंडिया केंद्र और 31 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में 32 राज्य उत्कृष्टता केंद्र अधिसूचित हो चुके थे। साथ ही, 341 खेल अवसंरचना परियोजनाओं को मंजूरी मिली। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न संख्या नहीं, उपयोगिता का है। किसी जिले में मैदान या केंद्र बना देना पर्याप्त नहीं है।
वहां प्रशिक्षित कोच, नियमित प्रतियोगिताएं, उपकरण, चिकित्सा सहायता, प्रतिभा पहचान की व्यवस्था और खिलाड़ियों के लिए आगे बढ़ने का स्पष्ट मार्ग भी चाहिए। स्कूल स्तर पर भी सुधार की कोशिश हुई है। समग्र शिक्षा के तहत सरकारी विद्यालयों में खेल उपकरणों के लिए वार्षिक अनुदान का प्रावधान है- प्राथमिक के लिए 5,000 रुपये, उच्च प्राथमिक के लिए 10,000 रुपये और माध्यमिक/उच्च माध्यमिक के लिए 25,000 रुपये। फिर भी चुनौती बड़ी है। अनेक विद्यालयों में खेल का समय अकादमिक दबाव के चलते सबसे पहले कम किया जाता है। कई स्कूलों में मैदान सीमित हैं और प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की उपलब्धता असमान है। इसलिए खेल को पाठ्यक्रम का वास्तविक हिस्सा बनाना होगा, केवल सह-पाठ्यक्रम गतिविधि नहीं।
बड़ी चुनौती प्रतिभा पहचान
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं, समस्या है समय पर पहचान और सही दिशा देने की। ग्रामीण भारत में अनेक बच्चे शारीरिक क्षमता, गति, सहनशक्ति या कौशल के स्तर पर राष्ट्रीय प्रतिभा बन सकते हैं, पर उन्हें न सही प्रतियोगिता मिलती है, न प्रशिक्षित कोच। इस अंतर को पाटने के लिए ‘खेलो इंडिया’ ने प्रतिभा खोज और विकास को केंद्रीय गतिविधि बनाया है। खेलो इंडिया केंद्रों में स्थानीय स्तर पर पूर्व चैम्पियन खिलाड़ियों को प्रशिक्षक के रूप में जोड़ना भी इसी सोच का हिस्सा है। जुलाई 2025 तक 306 अकादमियां ‘खेलो इंडिया’ खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए मान्यता प्राप्त थीं और 1,096 स्वीकृत पूर्व चैम्पियन खिलाड़ी प्रशिक्षक पदों में से 951 तैनात हो चुके थे।
यह मॉडल महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल आधुनिक स्टेडियम से खिलाड़ी तैयार नहीं होते। खिलाड़ी को तकनीक सिखाने, कमियों को पहचानने और मनोवैज्ञानिक विकास में प्रशिक्षक की भूमिका केंद्रीय होती है। अगला कदम प्रतिभा पहचान को डेटा-आधारित बनाना चाहिए। स्कूल स्तर पर बच्चों की गति, शक्ति, सहनशक्ति, प्रतिक्रिया समय, लचीलापन और शरीर की संरचना का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है। इसके आधार पर सुझाव दिया जा सकता है कि किसी बच्चे की प्राकृतिक क्षमता एथलेटिक्स, तैराकी, भारोत्तोलन, कुश्ती, मुक्केबाजी, तीरंदाजी या किसी अन्य खेल के लिए अधिक उपयुक्त है।
खेल विज्ञान अब विलासिता नहीं
विश्व खेल में प्रतिस्पर्धा अब केवल प्रतिभा से नहीं जीती जाती। पोषण, बायोमैकेनिक्स, स्पोर्ट्स मेडिसिन, फिजियोथेरेपी, मनोविज्ञान, रिकवरी और डेटा एनालिटिक्स मिलकर उच्च प्रदर्शन की पूरी व्यवस्था बनाते हैं। भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। भारतीय खेल प्राधिकरण के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्रों में खेल विज्ञान, पोषण, विशेषज्ञ प्रशिक्षकों और हाई-परफॉर्मेंस स्टाफ को जोड़ने का प्रयास हुआ है। इन केंद्रों का उद्देश्य विकासशील से लेकर अभिजात स्तर के खिलाड़ियों तक के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण व्यवस्था तैयार करना है। टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण उदाहरण है। सितंबर 2014 में शुरू हुई इस योजना में 2018 में तकनीकी सहायता के लिए विशेषज्ञ व्यवस्था जोड़ी गई। इसके तहत खिलाड़ियों को विदेशी प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं, उपकरण, कोचिंग कैंप और अन्य आवश्यक सहायता मिलती है। अब आवश्यकता यह है कि खेल विज्ञान की सुविधा केवल शीर्ष 100-200 खिलाड़ियों तक सीमित न रहे। जिला और राज्य स्तर तक स्पोर्ट्स मेडिसिन, फिजियोथेरेपी, पोषण तथा मनोवैज्ञानिक सहायता की बुनियादी सुविधाएं पहुंचानी होंगी। चोट के बाद उचित उपचार न मिलने से वर्षों की मेहनत समाप्त हो सकती है।
महिलाओं ने बदली तस्वीर
भारतीय खेलों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव महिला खिलाड़ियों की बढ़ती उपस्थिति है। पिछले वर्षों में पीवी सिंधु, मीराबाई चानू, साक्षी मलिक, मनु भाकर, निकहत जरीन, लवलीना बोरगोहेन, अवनि लेखरा, प्रवीण कुमार और अनेक महिला खिलाड़ियों ने यह धारणा तोड़ी कि खेल पुरुषों का क्षेत्र है। पेरिस पैरालंपिक में भारत की 29 पदकों की उपलब्धि में महिलाओं की भूमिका उल्लेखनीय रही। महिला खिलाड़ियों के लिए अलग प्रतियोगिताओं और लीगों का विस्तार इस बदलाव को संस्थागत आधार दे रहा है। अस्मिता खेलो इंडिया महिला योजना 30 से अधिक राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों और 550 जिलों तक पहुंच चुकी है।
34 खेलों में 2,600 से अधिक लीग आयोजित हुए, जिनमें 3 लाख से अधिक महिला एथलीट्स ने हिस्सा लिया। इसमें अंडर-13, 13-18 वर्ष और 18 से अधिक वर्ष की श्रेणियां शामिल हैं। फिर भी महिला खेलों की सबसे बड़ी चुनौती केवल मैदान पर नहीं है। सुरक्षित आवास, परिवहन, स्वच्छ शौचालय, महिला प्रशिक्षक, पोषण, परिवार का सहयोग और खेल के बाद रोजगार की सुरक्षा महिला खिलाड़ियों की भागीदारी को प्रभावित करते हैं। इसलिए महिला खेल नीति का लक्ष्य केवल पदक नहीं होना चाहिए। खेलों में लड़कियों की भागीदारी को सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रम से जोड़ना होगा। यदि किसी गांव की लड़की नियमित मैदान तक पहुंच सके, खेल छात्रवृत्ति प्राप्त कर सके और खेल के माध्यम से शिक्षा व रोजगार का रास्ता बना सके, तभी खेल वास्तव में महिला सशक्तीकरण का साधन बनेंगे।
‘सहानुभूति’ से ‘सामर्थ्य’ तक
भारतीय खेल परिवर्तन की सबसे प्रेरक कहानी पैरा-स्पोर्ट्स की है। 2016 रियो पैरालंपिक में भारत ने 4, 2020 टोक्यो में 19 और 2024 पेरिस में 7 स्वर्ण, 9 रजत और 13 कांस्य सहित 29 पदक जीतकर 18वें स्थान पर रहा। यह देश का अब तक का सर्वश्रेष्ठ पैरालंपिक प्रदर्शन था। यह केवल पदकों की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव का भी प्रमाण है जिसमें दिव्यांगता को कमजोरी के बजाय क्षमता के संदर्भ में देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने पैरा खेलों के लिए विशेष प्रतियोगिताओं और प्रशिक्षण की व्यवस्था को बढ़ाया है। 2023 में आयोजित खेलो इंडिया पैरा गेम्स में 1,068 खिलाड़ियों ने भाग लिया, जबकि 2025 संस्करण में 1,233 पैरा खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। अब जरूरत है कि जिला स्तर पर पैरा-स्पोर्ट्स के लिए सुलभ मैदान, उपकरण और प्रशिक्षक उपलब्ध हों।
राज्यवार असमानता बड़ी चुनौती
खेल व्यवस्था का एक कमजोर पक्ष राज्यों के बीच असमानता है। हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, मणिपुर और कुछ अन्य राज्यों ने विशिष्ट खेलों में मजबूत आधार तैयार किया है। इसके पीछे खेल संस्कृति, राज्य सरकार की नीतियां, अकादमियां, स्थानीय प्रशिक्षक और रोजगार की व्यवस्था जैसे कारण हैं। दूसरी ओर कई राज्यों में मैदानों, प्रशिक्षकों, उपकरणों और प्रतियोगिताओं की कमी बनी हुई है। पूर्वोत्तर राज्यों ने मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, फुटबॉल, तीरंदाजी और एथलेटिक्स में असाधारण प्रतिभा दिखाई है, लेकिन भौगोलिक दूरी और अवसंरचना की सीमाएं प्रगति में बाधा बनती हैं। इसलिए भारत को एक राष्ट्रीय खेल मानचित्र तैयार करना चाहिए। हर जिले की खेल-क्षमता, उपलब्ध मैदान, प्रशिक्षक, स्थानीय लोकप्रिय खेल और संभावित प्रतिभा का डिजिटल डेटाबेस बने। जिस क्षेत्र में तीरंदाजी की प्राकृतिक या सांस्कृतिक क्षमता है, वहां तीरंदाजी केंद्र विकसित हों; जहां कुश्ती या मुक्केबाजी की परंपरा मजबूत है, वहां उसी खेल को उत्कृष्टता केंद्र से जोड़ा जाए।
खेल और रोजगार का संबंध
खेलों को रोजगार से जोड़ना आने वाले वर्षों में निर्णायक होगा। हर खिलाड़ी ओलंपिक पदक विजेता नहीं बन सकता, पर इसका अर्थ यह नहीं कि उसका खेल करियर समाप्त हो जाता है। कोचिंग, फिटनेस, खेल प्रबंधन, फिजियोथेरेपी, पोषण, स्पोर्ट्स साइंस, डेटा एनालिटिक्स, उपकरण निर्माण, खेल पत्रकारिता, आयोजन प्रबंधन और खेल पर्यटन जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। 2026-27 के बजट में 500 करोड़ रुपये की खेल सामग्री निर्माण पहल इसी व्यापक दृष्टिकोण का संकेत देती है। इसका उद्देश्य भारत को खेल उपकरणों के निर्माण और नवाचार का केंद्र बनाना भी है। भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी और पारंपरिक खेलों की बड़ी विरासत है। यदि खेल उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो इससे खिलाड़ियों की लागत घट सकती है और रोजगार भी बढ़ सकता है।
खेल संघों में पारदर्शिता जरूरी
खिलाड़ियों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता, समय पर प्रतियोगिताएं, प्रशिक्षकों की नियुक्ति, वित्तीय जवाबदेही और शिकायत निवारण की व्यवस्था किसी भी खेल व्यवस्था की विश्वसनीयता का आधार है। भारत में विभिन्न खेल संघों को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। इनका सबसे अधिक नुकसान खिलाड़ियों को होता है, क्योंकि उनका प्रशिक्षण, प्रतियोगिता और मानसिक तैयारी प्रभावित होती है। इसलिए प्रत्येक राष्ट्रीय खेल महासंघ के लिए न्यूनतम प्रशासनिक मानक तय किए जाने चाहिए। चयन प्रक्रिया को अधिक डेटा-आधारित और सार्वजनिक बनाया जा सकता है। खिलाड़ियों की शिकायतों के लिए स्वतंत्र तंत्र होना चाहिए। महिला खिलाड़ियों के लिए यौन उत्पीड़न और सुरक्षा संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र तथा त्वरित सुनवाई अनिवार्य होनी चाहिए।
पदक से आगे
2025 में घोषित राष्ट्रीय खेल नीति ‘खेलो भारत नीति 2025’ ने खेल को उत्कृष्टता, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और नागरिकों के समग्र कल्याण से जोड़ते हुए व्यापक दृष्टि प्रस्तुत की है। नीति का लक्ष्य जमीनी स्तर से ओलंपिक पोडियम तक प्रतिभा विकसित करना और 2036 ओलंपिक की संभावित मेजबानी के लिए भारत को तैयार करना है। अब भारत को खेल नीति के अगले चरण की दिशा स्पष्ट करनी होगी। लक्ष्य केवल छह या दस ओलंपिक पदक नहीं, बल्कि ऐसा खेल समाज होना चाहिए, जिसमें करोड़ों बच्चे नियमित खेलें, हजारों प्रशिक्षित कोच हों, हर जिले में प्रमुख खेलों की उत्कृष्ट व्यवस्था हो, महिला और दिव्यांग खिलाड़ियों को समान अवसर मिले और प्रतिभाएं आर्थिक चिंता से मुक्त होकर प्रशिक्षण ले सकें।
भारत को यह भी तय करना होगा कि किन खेलों में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है। सभी खेलों में एक साथ विश्व शक्ति बनना व्यावहारिक नहीं। कुश्ती, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, तीरंदाजी, बैडमिंटन, भारोत्तोलन, एथलेटिक्स, हॉकी, टेबल टेनिस और पैरा-स्पोर्ट्स में दीर्घकालिक मिशन बनाए जा सकते हैं। वहीं फुटबॉल, तैराकी, साइकिलिंग और जिम्नास्टिक्स जैसे खेलों का व्यापक आधार तैयार करना होगा।
भविष्य की असली कसौटी
पिछला दशक खेलों में बदलाव का दशक रहा है। ‘खेलो इंडिया’ से TOPS तक, जिला स्तरीय केंद्रों से राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्रों तक और महिला लीगों से पैरा गेम्स तक नया ढांचा विकसित हुआ है। बढ़ता बजट, खेल विज्ञान पर जोर और संस्थागत प्रतिभा पहचान ने इस बदलाव को गति दी है। लेकिन विश्व खेल शक्ति बनने की असली परीक्षा अभी बाकी है। भारत की विशाल युवा आबादी को खेल प्रतिभा में बदलने के लिए मैदान, प्रशिक्षक, पोषण, प्रतियोगिता, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और खेल को करियर बनाने का भरोसा जरूरी है।
खेल परिवर्तन का अगला चरण ‘पदक-केंद्रित’ नहीं, ‘खिलाड़ी-केंद्रित’ होना चाहिए। स्कूल का मैदान पहला पड़ाव और ओलंपिक पोडियम अंतिम। गांव के बच्चे से अंतरराष्ट्रीय चैम्पियन तक निरंतर मार्ग तैयार करना होगा।
स्कूलों में खेल संस्कृति, जिलों में बुनियादी ढांचा, राज्यों में उत्कृष्टता केंद्र, राष्ट्रीय स्तर पर खेल विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता प्रणाली को एक सूत्र में जोड़कर भारत व्यापक खेल संस्कृति विकसित कर सकता है, जहां खेल स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का माध्यम बने। भारत के सामने चुनौती प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि उसे पहचानने, तराशने और विश्वस्तरीय प्रदर्शन में बदलने की है। यही तय करेगा कि भारत केवल उभरती खेल शक्ति रहेगा या विश्व की अग्रणी खेल शक्तियों में स्थान बनाएगा।

















