भारत सरकार ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) नाम से एक नई योजना शुरू की है। इसका बजट 62,500 करोड़ रुपये का है। यह पुरानी प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम का अगला चरण है, जो मार्च 2026 में खत्म हो गई थी। नई योजना 2026-27 से 2030-31 तक पांच साल चलेगी।
इसका मुख्य मकसद दो चीजें हैं। एक, बड़े पैमाने पर मोबाइल उत्पादन को जारी रखना और बढ़ाना। दो, भारतीय कंपनियों को अपना ब्रांड बनाने में मदद करना, ताकि वे सिर्फ असेंबलिंग न करें बल्कि डिजाइन और रिसर्च भी खुद करें।
दो हिस्से वाली योजना
योजना को दो टारगेट सेगमेंट में बांटा गया है। टारगेट सेगमेंट 1 बड़े मैन्युफैक्चरर्स और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) कंपनियों के लिए है। इसमें वे कंपनियां शामिल हो सकती हैं जिनका 2025-26 में टर्नओवर कम से कम 10,000 करोड़ रुपये हो। मौजूदा ब्रांड्स को हर साल बिक्री बढ़ानी होगी। 2026-27 में 5,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त बिक्री, फिर 2027-28 में 10,000 करोड़, और इसी तरह बढ़ते हुए 2030-31 में 25,000 करोड़ रुपये तक। नए ब्रांड को पहले साल 10,000 करोड़ रुपये की बिक्री करनी होगी।
इन कंपनियों को बढ़ी हुई बिक्री पर 2.25 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक इंसेंटिव मिलेगा। दर साल-दर-साल थोड़ी कम होती जाएगी। बेसलाइन हर साल पिछली बिक्री प्लस 15 प्रतिशत के हिसाब से तय होगी। इंसेंटिव सिर्फ उससे ऊपर की बिक्री पर मिलेगा। एक्सपोर्ट भी गिना जाएगा।
टारगेट सेगमेंट 2 भारतीय ब्रांड्स के लिए है। यहां शर्तें आसान हैं। कंपनी का टर्नओवर 2025-26 में 1,000 करोड़ रुपये हो, 51 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भारतीय नागरिकों के पास हो, बौद्धिक संपदा और ट्रेडमार्क भारत में हो, प्रबंधन नियंत्रण भारतीयों के पास हो और देश में ही डिजाइन व रिसर्च की क्षमता हो। इन ब्रांड्स को न्यूनतम बिक्री थ्रेशहोल्ड की जरूरत नहीं है। इन्हें बढ़ी हुई बिक्री पर फ्लैट 5 प्रतिशत इंसेंटिव मिलेगा। अगर फोन भारत में डिजाइन और विकसित हुआ तो अतिरिक्त 3 प्रतिशत और मिलेगा।
घरेलू पार्ट्स पर अतिरिक्त फायदा
दोनों सेगमेंट में कंपनियां अगर डिस्प्ले, कैमरा मॉड्यूल, बैटरी, एनक्लोजर जैसे महत्वपूर्ण पार्ट्स भारत से खरीदें तो अतिरिक्त 1.5 प्रतिशत तक इंसेंटिव मिल सकता है। इसके लिए साल की कम से कम 25 प्रतिशत यूनिट्स में घरेलू पार्ट्स इस्तेमाल करने होंगे।
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लक्ष्य क्या हैं?
योजना के दौरान कुल मोबाइल उत्पादन करीब 39 लाख करोड़ रुपये पहुंचने का लक्ष्य है। पुरानी स्कीम में यह करीब 22 लाख करोड़ रुपये रहा था। एक्सपोर्ट को भी लगभग 15 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाने की उम्मीद है। सीधे करीब 60,000 नई नौकरियां पैदा होने का अनुमान है।
सरकार का जोर सिर्फ असेंबलिंग बढ़ाने पर नहीं है। घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ाने, सप्लाई चेन मजबूत करने और भारतीय ब्रांड्स को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने पर है। पुरानी स्कीम से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता बन चुका है। स्थानीय वैल्यू एडिशन 24 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है। नई योजना इसे और आगे ले जाने की कोशिश है। योजना का बजट दोनों सेगमेंट के बीच साझा है। भारतीय ब्रांड्स को कुछ गैर-वित्तीय सहयोग भी मिलेगा।
भारत की 62,500 करोड़ रुपये की नई स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम कैसे काम करेगी?











