उत्तर प्रदेश

नेपाल में बदलती जनसांख्यिकी के बीच हिन्दू राष्ट्र के बहाली की मांग तेज

सुनसरी जिले में कांवड़ यात्रा विवाद से शुरू हिंसा सिरहा, धनुषा, सप्तरी तक फैली। हिंदू आबादी घटी, मुस्लिम-ईसाई बढ़ी। अवैध प्रवासन और मिशनरी गतिविधियों पर बुद्धिजीवियों की चिंता।

Published by
अभय कुमार

नेपाल में जुलाई 2026 में सुनसरी जिले के देवानगंज (कप्तानगंज) इलाके में कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे और धार्मिक झंडों को लेकर दो समुदायों के बीच विवाद के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा के कारण देश में धार्मिक पहचान और सुरक्षा से जुड़ी बहनों को नई गति दे दिया है। यह हिंसा सुनसरी तक ही सीमित नहीं रहकर मधेश प्रदेश के अन्य जिलों जैसे सिरहा, धनुषा और सप्तरी तक फैल गई जिसके कारण कई स्थानों पर अनिश्चितकालीन कर्फ्यू तक लगाने को मजबूर होना पड़ा था। इस हिंसक झड़प और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोगों की मौत के अलावा अनेकों घायल हुए थे।

हिंसा की घटनाओं के बाद विभिन्न हिंदूवादी संगठनों और राजनीतिक दलों ने नेपाल सरकार को ज्ञापन सौंपकर देश को पुनः ‘वैदिक सनातन हिंदू राष्ट्र’ घोषित करने की मांग उठाई है। नेपाल भी भारत के तर्ज़ पर लम्बे समय से घुसपैठ और जनसांख्यिकी परिवर्तन की समस्या से पीड़ित है। रोहिंग्या और बांग्लादेशियों का एक बड़ा जत्था पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के रास्ते नेपाल में प्रवेश करता है। जुलाई में हुए सुनसरी जिले में हिंसा में इन अवैध प्रवासियों का ही हाथ माना जा रहा है। अतएव नेपाल में बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों और कई राजनीतिक दलों ने इस बढ़ती समस्या की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए इसके स्थाई निदान की मांग की है।

नेपाल की लगातार बदलती डेमोग्राफी

नेपाल की इस बदलती जनसांख्यिकी के बीच एक बार फिर से धर्मनिरपेक्षता और हिंदू राष्ट्र की बहाली का मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। नेपाल 2007 तक आधिकारिक रूप से एक संवैधानिक हिंदू राष्ट्र था। 1990 के संविधान में भी इसे ‘हिंदू अधिराज्य’  घोषित किया गया था। नेपाल में 1990 के जन आंदोलन के बाद देश में बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली के बावजूद भी राजा बीरेंद्र द्वारा जारी किए गए संविधान में नेपाल की पहचान एक ‘हिंदू राष्ट्र’ के रूप में ही बरकरार रखी गई थी। इस व्यवस्था परिवर्तन के दौरान भी राजशाही और हिंदू संस्कृति को विशेष संरक्षण यथावत रहा जिसमें गोहत्या और धर्म परिवर्तन पर कानूनी प्रतिबंध था।

वर्ष 2006 के दूसरे जन आंदोलन और राजशाही की व्यवस्था में हुए बदलाव के बाद वर्ष 2007 के अंतरिम संविधान के तहत नेपाल को आधिकारिक तौर पर एक ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य’ घोषित किया गया था। इसे 2015 के संविधान में भी बरकरार रखा गया था।

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में तबाह होता नेपाल

नेपाल में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में धर्मांतरण और इससे जुडी अन्य सामाजिक समस्याओं ने नेपाल को पूरी तरह से जकड़ लिया है। नेपाल में बड़े पैमाने पर विदेशी सहायता प्राप्त स्वयंसेवी संगठनों और मिशनरी गतिविधियों की सक्रियता काफी तेजी से बढ़ने लगी है। देश में बढ़ते धर्मांतरण और विदेशी संस्थाओं के प्रभाव को लेकर पारंपरिक हिंदू संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से समय-समय पर चिंता के कारण नेपाल में इस विषय पर कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर लगातार बहस चल रही है।

विदेशों से फंडिंग प्राप्त एनजीओ बने समस्या

विदेशी सहायता प्राप्त स्वयंसेवी संगठनों और मिशनरी गतिविधियों का मुख्य लक्ष्य सामाजिक और आर्थिक तौर से पिछड़े, दलित और जनजातीय समुदायों के लोग हैं। इन लोगों के बीच सामाजिक सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर विदेशी वित्तपोषित संगठनों तथा ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का दायरा तेजी से जानबूझकर बढ़ाया गया है।

नेपाल का संविधान नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। नेपाल सरकार ने वर्ष 2018 में लागू नए फौजदारी दंड संहिता (क्रिमिनल कोड धारा 158) के तहत किसी भी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराने या इसके लिए प्रोत्साहित करने को एक दंडनीय अपराध बनाते हुए पांच साल तक की सजा का प्रावधान किया था। इसके साथ ही 50,000 नेपाली रुपये तक का आर्थिक जुर्माना भी लगाने का प्रावधान है। नेपाल में यदि कोई विदेशी नागरिक इस अपराध में दोषी पाया जाता है तो सजा पूरी होने के सात दिन के भीतर उसे नेपाल से निष्कासित करने का भी प्रावधान है। मगर इसका पलायन में काफी सुस्ती बरती जा रही है।

धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित होने के बाद नेपाल में सामाजिक संरचना बदली

नेपाल में माओवादी आंदोलन की समाप्ति के बाद आए राजनीतिक बदलावों विशेषकर 2008 में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित होने के बाद देश की जनसांख्यिकी में हुए बदलाव के कारण नेपाल की सामाजिक संरचना में काफी परिवर्तन आया है। इस परिवर्तन पर अब बहस काफी तेज होती जा रही है। नेपाल की 2021 की राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, नेपाल की जनसांख्यिकीय में पिछले एक दशक में नेपाल में हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायियों में कमी आई है, जबकि मुस्लिम, ईसाई और किरात समुदायों की आबादी में वृद्धि हुई है।

हिन्दू बहुल नेपाल में हिन्दू आबादी केवल 81 फीसदी

नेपाल की 2021 की राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार, हिंदू आबादी लगभग 2.36 करोड़ हैं जो कुल आबादी का 81.19% है। हिंदू धर्म नेपाल में माने जाने वाला सबसे बड़ा धर्म है। नेपाल में दूसरा सबसे बड़ा धर्म बौद्ध है, जिसके अनुयायियों की संख्या 8.21 % है जो देश का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। नेपाल में मुस्लिमों की संख्या में भी काफी वृद्धि दर्ज़ की गई है। 2021 की राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार, मुस्लिमों की संख्या लगभग 15 लाख है जो कुल जनसंख्या का 5.09% है। वहीं नेपाल में किरात धर्म के लोग लगभग 9.50 लाख है जो कुल जनसंख्या का 3.17% है।

ईसाइयों की आबादी तेजी से बढ़ी

नेपाल में 2001 में ईसाई आबादी 1,04,180 थी जो कुल आबादी का 0.45% था। वहीं 2011 में ईसाई आबादी बढ़कर 3,75,699 हो गई जो कुल आबादी का 1.41% था। 2021 की अंतिम जनगणना के अनुसार, ईसाई आबादी  बढ़कर  5,12,313 हो गई थी। कुल आबादी का 1.76% है। नेपाल में ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या में काफी वृद्धि दर्ज़ की गई है जो कि पांच लाख की संख्या को पार करते हुए लगभग दो प्रतिशत की संख्या तक पहुंच गया है। ईसाई आबादी में होने वाले बदलावों में बड़ा हाथ इन विदेशी संगठनों का बताया जा रहा है।

मुस्लिमों की जनसंख्या में भी तेजी से वृद्धि

नेपाल में विगत ढाई दशक में मुस्लिम जनसंख्या में भी लगातार और तेज वृद्धि दर्ज की गई है। 2001 में नेपाल में मुस्लिम आबादी लगभग 9.54 लाख थी जो कुल जनसंख्या का करीब 4.2% थी। देश में मुस्लिम आबादी 2011 में बढ़कर लगभग 11.6 लाख हो गई जो कुल आबादी का 4.4% हो गई। नेपाल की अंतिम 2021 के आधिकारिक जनगणना के अनुसार, मुस्लिम जनसंख्या बढ़कर 14,83,602 हो गई है जो कुल जनसंख्या का 5.09% हो गया है। नेपाल के कुल मुसलमानों का लगभग 80% हिस्सा भारत की सीमा से लगे तराई (मधेश) क्षेत्र में रहता है। रौतहट, बांके, कपिलवस्तु, परसा, बारा और सुनसरी जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत सबसे अधिक है। रौतहट में यह आबादी लगभग 19.7% से 22.5% तक दर्ज की गई है। मुस्लिमों की संख्या में वृद्धि मुख्य रूप से प्राकृतिक जनसांख्यिकी बदलाव और उच्च प्रजनन दर का परिणाम मानी जाती है। इसके अलावा नेपाल में भारत की तर्ज़ पर जानबूझकर कराये जा रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशियों के प्रवासन के कारण भी इनकी संख्या बढ़ी है।

नेपाल में हुए जनसांख्यिकी परिवर्तन के बाद हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों और कुछ राजनीतिक दलों का आरोप है कि धर्मनिरपेक्षता का लाभ उठाकर विदेशी वित्तपोषित चर्च संगठनों ने देश के ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ाई है। उनके अनुसार इससे हिंदू और बौद्ध बहुलता वाले नेपाल में जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो रहा है। नेपाल के संविधान में सनातन धर्म की रक्षा का उल्लेख है और जबरन या प्रलोभन देकर कराए जाने वाले धर्मांतरण को कानूनन प्रतिबंधित किया गया है। नेपाल के राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और कई अन्य सांस्कृतिक संगठन नेपाल को फिर से ‘हिंदू राष्ट्र’ घोषित करने और राजशाही की आंशिक वापसी के लिए देशव्यापी आंदोलन कर रहे हैं। उनका तर्क है कि हिंदू पहचान नेपाल की सांस्कृतिक एकता का आधार रही है और धर्मनिरपेक्षता को विदेशी प्रभाव में थोपा गया था।

अलग ही तर्क दे रहे ईसाई

नेपाल के ईसाई संगठनों का कहना है कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के कारण लोग स्वेच्छा से धर्म चुन रहे हैं। वे किसी भी प्रकार के अवैध या जबरन धर्मांतरण के आरोपों को खारिज करते हैं। नेपाल में पिछले कुछ दशकों में ईसाई आबादी और चर्चों की संख्या में तेज वृद्धि दर्ज की गई हैं। इसमें औपचारिक रूप से पंजीकृत और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय अनौपचारिक प्रार्थना स्थल दोनों शामिल हैं। नेपाल क्रिश्चियन सोसाइटी और विभिन्न स्रोतों के अनुसार देश भर में हजारों की संख्या में छोटे-बड़े चर्च और प्रार्थना मंडलियां संचालित हैं। शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में लोग अक्सर घरों के भीतर प्रार्थना सभाएं आयोजित करते हैं। नेपाल के संविधान में धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध होने के बावजूद भी हाल के वर्षों में कुछ चर्च संगठनों और ट्रस्टों को औपचारिक पंजीकरण की अनुमति मिलने की प्रक्रिया किया गया है।

नेपाल क्रिश्चियन सोसाइटी को माओवादी और अन्य प्रमुख कम्युनिस्ट दलों सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-माओवादी सेंटर जैसे दलों का राजनीति का मदद मिल रहा है। इन दलों का मानना है कि धर्मनिरपेक्षता ने नेपाल के बहु-जातीय, बहु-भाषिक और बहु-धार्मिक समाज को समानता का अधिकार देता है। वामपंथी नेता विदेशी ताकतों के अवैध हस्तक्षेप का नाममात्र का विरोध करते हुए हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग को प्रगतिशील बदलावों को पीछे धकेलने का प्रयास करते हैं।

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