दुनिया जानती है कि पाकिस्तान अपना खर्चा किसी न किसी को ब्लैकमेल करके ही चलाता है। ऐसा ही वो एक बार फिर से अमेरिका के साथ करने जा रहा है। चीन के कर्ज के बोझ तले दबा पाकिस्तान अब उस पर से ही निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका से पैसे की मांग कर रहा। इसी क्रम में पाकिस्तान की सरकार अमेरिका से करीब 10 अरब डॉलर की मदद मांग रही है। यह मदद विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने और रुपये पर दबाव कम करने के लिए है।
देश लंबे समय से चीन, सऊदी अरब और आईएमएफ जैसी जगहों से पैसे लेता आया है। अब वह इस निर्भरता को थोड़ा कम करने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका से क्या मांगा गया है
वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने वाशिंगटन में अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट से मुलाकात के दौरान यह अनुरोध किया। उन्होंने एक द्विपक्षीय एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सपोर्ट फैसिलिटी की बात कही, जिसकी राशि 10 अरब डॉलर है और अवधि पांच साल तक हो सकती है।
इसके अलावा पाकिस्तान ने अमेरिकी EXIM बैंक के साथ एक अलग ट्रेड-फाइनेंस फैसिलिटी का भी प्रस्ताव रखा। इससे पाकिस्तानी खरीदार अमेरिकी निर्यातकों को एक से तीन साल तक भुगतान टाल सकेंगे।
क्यों जरूरत पड़ी
पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के पास करीब 18 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। यह तीन महीने के आयात के लिए काफी है। देश हर साल चीन और सऊदी अरब से कर्ज रोलओवर और डिपॉजिट पर निर्भर रहता है। आईएमएफ से 7 अरब डॉलर का कार्यक्रम भी चल रहा है।
ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में यातायात प्रभावित होने से भंडार पर और दबाव बढ़ा। पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की भूमिका भी निभाई थी।
वित्त मंत्री का बयान
अगस्त 2026 में औरंगजेब ने पुष्टि की कि अमेरिका के ट्रेजरी विभाग से यह अनुरोध किया गया है। बातचीत चल रही है, कोई फैसला अभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि यह साधारण कर्ज नहीं है, बल्कि बाजार को संकेत देने के लिए है कि मुद्रा और विदेशी मुद्रा स्थिति स्थिर है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार से लंबी अवधि का पैसा जुटाने में मदद मिल सकती है।
सरकार का लक्ष्य बार-बार द्विपक्षीय रोलओवर पर निर्भर रहने की बजाय बाजार आधारित फाइनेंसिंग की ओर जाना है।
मौजूदा हालात
पाकिस्तान 2023 में डिफॉल्ट के करीब पहुंच गया था। तब आईएमएफ और दोस्त देशों की मदद से स्थिति संभली। अब भी बाहरी भुगतान का दबाव बना हुआ है। कुल कर्ज करीब 138 अरब डॉलर के आसपास है। चीन के साथ सुरक्षा और आर्थिक संबंध मजबूत हैं, लेकिन फाइनेंसिंग के स्रोतों को फैलाने की कोशिश चल रही है। अमेरिका की तरफ से अभी कोई आधिकारिक मंजूरी नहीं मिली है। बातचीत जारी है।











