कांग्रेस पार्टी ने घोषणा की है कि सरकारी कार्यक्रमों में कानून का पालन करते हुए पूरा वंदे मातरम गाएंगे, लेकिन पार्टी के कार्यक्रम में सिर्फ शुरुआती दो अन्तरे ही गाए जायेंगे। इतनी महानता से सराबोर इस राष्ट्रगीत के साथ भी कांग्रेस पार्टी एक बार फिर राजनीति कर रही है। कांग्रेस पार्टी की इस घोषणा ने उसकी मानसिकता को सबके सामने उजागर कर दिया है कि वो वंदे मातरम का सम्मान दिल नहीं, बल्कि कानूनी मजबूरी के तहत कर रही है।
प्रश्न उठता है कि कांग्रेस पार्टी जो संविधान बचाओ और देश का गौरव जैसे नारों का उद्घोष करते नहीं थकती है, उसे राष्ट्रगीत के संपूर्ण गायन से आपत्ति क्यों है? कांग्रेस पार्टी या किसी भी संगठन के लिए सरकारी कानून मानना राष्ट्रधर्म के साथ ही कानूनी मर्यादा भी है। सरकारी कार्यक्रमों में कानून मानना एक संवैधानिक दायित्व है। लेकिन, अपने दलगत आयोजनों में राष्ट्रगीत को अधूरा छोड़ना दर्शाता है की कांग्रेस पार्टी इसे लेकर पेशोपेश में है।
स्वतंत्रता संग्राम को सबसे बड़े प्रतीक का अपमान कांग्रेस ने किया
स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े प्रतीक के साथ इतना बड़ा विश्वासघात करने वाली कांग्रेस पार्टी कैसे आजादी के इतिहास का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर सकती है। इतिहास की बार करें तो कांग्रेस का यह कदम 1937 की याद दिलाती है। 1937 का वह दौर था जब आजादी के आंदोलन के दौरान जिन्ना और मुस्लिम लीग सांप्रदायिक तुष्टीकरण की नींव पर खड़ा था। 1937 में प्रांतीय विधान मंडलों के चुनाव के बाद कांग्रेस द्वारा कई प्रांतों में सरकार बनाने के बाद विधानसभा सत्र की शुरुआत वंदे मातरम से करने की परंपरा शुरू किया गया था।
मुस्लिम लीग और उसके नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने यहीं से अपनी आपत्ति दर्ज करानी शुरू कर दी थी। जिन्ना और मुस्लिम लीग का तर्क था कि वंदे मातरम एक मूर्ति पूजक गीत है। उनका मत था कि इसके बाद के अंतरों में भारत माता को देवी दुर्गा और भवानी के रूप में चित्रित किया गया है जो इस्लाम के खिलाफ है। अक्टूबर 1937 में लखनऊ में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण और पारित प्रस्तावों के जरिए ‘वंदे मातरम’ का कड़ा विरोध किया था। मुस्लिम लीग ने प्रस्ताव पास कर कांग्रेस पर मुसलमानों की भावनाओं की उपेक्षा करते हुए इसे राष्ट्रीय गान के रूप में थोपने का आरोप लगाया था।
मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए कांग्रेस ने की वंदे मातरम की उपेक्षा
कांग्रेस पार्टी द्वारा जिन्ना और मुस्लिम लीग के सामने डटकर खड़ा रहने की अपेक्षा थी। मगर 1937 में कोलकाता में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में मुस्लिम लीग और जिन्ना को खुश करने के लिए कांग्रेस ने एक बहुत बड़ा समझौता करते हुए फैसला किया कि आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम की शुरुआत के केवल दो ही अन्तरे का गायन किया जाएगा।
भारत का ही नहीं बल्कि, पूरे विश्व का इतिहास बताता है कि संतुष्टीकरण के लिए किया गया, तुष्टीकरण रुकने के बजाए आगे ही बढ़ता है। जब कांग्रेस ने सिर्फ दो अंतरे गाने का फैसला किया तब जिन्ना ने एक नया रुख अपनाते हुए दो अंतरों को गाने से भी इंकार कर दिया। जिन्ना ने ऐलान किया कि वंदे मातरम को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। जिन्ना की हठधर्मिता के सामने 1937 में कांग्रेस का झुकना भारत के विभाजन के रास्ते में पहला बड़ा वैचारिक समर्पण था। कांग्रेस की योजना दो अंतरे का गायन करके मुस्लिम लीग को शांत कर देने की थी। मगर परिणाम इसके उल्ट हुआ और इससे जिन्ना का अलगाववादी इरादा और मजबूत होता गया।
1937 में ही कांग्रेस ने जिन्ना के आगे किया था समर्पण
इतिहास अपने को दोहराता है। कांग्रेस पार्टी ने 1937 में जिन्ना के सामने समर्पण कांग्रेस किया था। आज 89 साल के बाद भी कांग्रेस पार्टी उससे कोई सबक नहीं लेते हुए उसी पुरानी राह पर चलती दिखाई देती है। उस समय मुस्लिम लीग कहती थी कि हम दो अन्तरे ही गाएंगे और आज कांग्रेस पार्टी कहती है कि हम दो अन्तरे ही गाएंगे। संभव है कि भविष्य में पार्टी मुस्लिम लीग की तरह दो अन्तरे भी गाने से भी इंकार कर दे। कांग्रेस पार्टी का यह कदम 1937 वाली मुस्लिम लीग की मानसिकता का पुनः प्रकटन है।
मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कांग्रेस ने राष्ट्र से किया समझौता
सवाल है कि क्या आज कि कांग्रेस पार्टी भी वोट बैंक और एक विशेष वर्ग को खुश करने के लिए राष्ट्रगीत के साथ समझौता कर रही है। स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्षों के बाद भारत अपने आधुनिक इतिहास में सबसे अखंड और मजबूत राष्ट्र के रूप में ज्यादा मजबूती से खड़ा है तब भी कांग्रेस को पूरा वंदे मातरम गाने में हिचक क्यों हैं? मुस्लिम लीग और जिन्ना ने जिस मुद्दे पर देश का बंटवारा कराया कांग्रेस आज भी उस राजनीतिक तुष्टीकरण की जाल से बाहर नहीं निकल पाई है। सवाल यह है कि जब सरकारी कार्यक्रमों में कानूनन पूरा गाना स्वीकार है तो पार्टी के निजी कार्यक्रमों में यह दूरी क्यों बनाई जा रही है? इसका निहितार्थ हैं कि जब कानून का दबाव नहीं होता तब कांग्रेस पार्टी अपनी पुरानी तुष्टिकरण की नीति पर लौट आती है।
गोवा में खड़गे के सामने जो हुआ वह दिखाता है कि यह कोई अनजाने में हुई गलती नहीं थी, बल्कि ये कांग्रेस की सोची समझी नीति का हिस्सा है। एक ऐसी नीति जहां राष्ट्रीय भावना से ऊपर अपनी राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण को रखा जाता है। इतिहास बार-बार हमें सिखाता है कि जब-जब राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय अस्मिता के साथ राजनीतिक समझौते किए जाते हैं, तब-तब देश की सामाजिक संरचना को नुकसान पहुंचता है। 1930 के दशक में कांग्रेस द्वारा तुष्टिकरण के नाम पर की गई छोटी-छोटी रियायतों ने अंततः मुस्लिम लीग के उस दावे को ताकत दिया और भारत में वर्तमान में तीन अलग-अलग राष्ट्र बन गया है। राष्ट्रगीत जैसी महत्वपूर्ण विषय पर भी समझौता होता है तो अलगाववादी ताकतों का मनोबल बढ़ता है।
21वीं सदी में नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा भारत
भारत 21वीं सदी में एक नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा है, तब भी कांग्रेस का 1937 वाला पुराना कदम दिखाता है कि पार्टी आज भी उसी दौराहे पर खड़ी है, जहां देश के साथ जाने के बजाय अपनी राजनीति को तरजीह दे रही है। जिस वंदे मातरम ने देश को एकजुट किया था कांग्रेस पार्टी फिर से दो अन्तरे बनाम पूरा गीत के विवाद में घसीट दिया है। क्या कांग्रेस पार्टी का यह कदम राष्ट्र की अखंडता की भावना के खिलाफ नहीं है? यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस आज भी उसी राह पर चलती दिखाई दे रही है जिस पर कभी जिन्ना ने देश की राजनीति को धकेला था। क्या वोट बैंक की राजनीति कांग्रेस के लिए इतनी महत्वपूर्ण हो गई कि 150 साल पुराने राष्ट्रगीत के गरिमापूर्ण अस्तित्व को भी किस्तों में स्वीकार किया जा रहा है।
वंदे मातरम केवल शब्दों का समूह नहीं, एक गीत नहीं बल्कि, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है, जिसने भारत को आजादी की हवा में सांस लेने का अवसर दिया है। कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रमों से लेकर 1937 के ऐतिहासिक घटना एक ही ओर इशारा करती है कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कुछ भी कर सकती है। कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रगीत के संपूर्ण गायन से अपने को दूर करते हुए केवल सरकारी मजबूरी तक सीमित रखना राष्ट्र और वंदे मातरम के प्रति उनके नैतिक सम्मान पर गहरे सवाल खड़े करता है। यह बताता है कि आज की कांग्रेस पार्टी जिन्ना की मुस्लिम लीग की राह पर चलने पर आमादा है।
वंदे मातरम केवल दो शब्द नहीं भारत की आत्मा है
वंदे मातरम सिर्फ दो शब्द नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा है, जिसके वंदन ने देश से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाते हुए उसे देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। वंदे मातरम ने बिना शस्त्र उठाए लाखों भारतीयों के दिलों में आजादी की अलख जगाई थी। वंदे मातरम वो मंत्र है, जिसे गाते हुए स्वतंत्रता सेनानियों ने फांसी के फंदों को आत्मसात किया था। आज़ादी के आंदोलन में वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत माता की वंदना थी। जिसमें धरती को मां दुर्गा, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के रूप में देखा गया था। 1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन का ऐलान किया तो अंग्रेजों के खिलाफ उठी आवाज का मुख्य नारा वंदे मातरम ही था। बंगाल की सड़कों से लेकर महाराष्ट्र और पंजाब तक लाखों लोग वंदे मातरम का उद्घोष करते हुए सड़कों पर उतरे थे। रविंद्र नाथ टैगोर ने खुद 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में इसे गाया था। 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस के दौरान मैडम भीकाजी कामा ने भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज फहराया था, जिसके बीच की पीली पट्टी पर देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ था।
यह गीत अंग्रेजों के लिए इतना खतरनाक बन गया था कि ब्रिटिश हुकूमत ने सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम बोलने या फिर गाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस गीत को गाने पर भारतीय युवाओं को जेलों की सजा दी जाती थी। स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों के दिलों में इस गीत ने आजादी की ज्वाला प्रज्वलित किया था।विचारणीय है कि जिस वंदे मातरम को दबाने के लिए अंग्रेजों ने पूरी ताकत लगा दिया था और जिस वंदे मातरम को गाने के कारण हमारे पूर्वजों ने घनघोर यातना साहा उसी वंदे मातरम को कांग्रेस पार्टी अपने आयोजनों में पूरा गाने से मना कर रही है। यह दर्शाता हैं की आज की कांग्रेस पार्टी अपनी ऐतिहासिक चेतना से काफी दूर जा चुकी है।















