अमेरिकी दार्शनिक और कवि जार्ज सांतायाना ने कहा था, “जो विगत की गलतियों को याद नहीं रख सकते उन्हें उन गलतियों को दोहराने का दंड भोगना पड़ता है।” हिंदू समाज को अपना इतिहास भूलने में महारत हासिल है। यह कितनी विचित्र बात है कि हम वर्षों से भारत विभाजन की त्रासदी को भुलाने की कोशिश करते रहे हैं। वर्षों तक इस सवाल को छेड़ने का साहस नहीं जुटा पाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भाजपा सरकार को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने 2021 में 14 अगस्त को प्रतिवर्ष ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान किया। यदि 15 अगस्त को मिली आजादी, जिसे खंडित आजादी कहा जाना चाहिए, एक ऐतिहासिक घटना थी, तो 14 अगस्त, जिस दिन भारत को चीर कर सांप्रदायिक आधार पर पाकिस्तान नामक एक नया मुल्क वजूद में लाया गया, एक ऐतिहासिक दुघर्टना ही थी। पाकिस्तानी पंजाब के मुस्लिम कवि अहमद रियाज ने अपनी पुस्तक ‘प्यारी पंजाब की धरती’ में बंटवारे पर दिल में उठी हूक को इन शब्दों में व्यक्त किया है-
‘किसकी बेरहम सियासत ने उठाकर खंजर
पांच दरियाओं की धरती का जिगर चीर दिया।’
आजादी के करीब आठ दशक बाद भी बंटबारे की त्रासदी लाखों लोगों के दिलों में नासूर की तरह जिंदा है। खासकर उनके दिलों में, जिन्होंने इसे अपनी आंखों से देखा और भुगता। इस त्रासदी में सरहद के दोनों ओर करीब 10 लाख लोग मारे गए और 1 करोड़ 60 लाख लोग अपने घर से बेघर हुए। अनगिनत जवान लड़कियों और महिलाओं का अपहरण और शीलहरण हुआ।
आजादी से भी बड़ी घटना
दरअसल, भारत की आजादी से भी बड़ी घटना है भारत विभाजन। यह तो साम्राज्यवादी ब्रिटिश सत्ता का राजनीतिक खेल था, जिसने मजहब के नाम पर इस अलग देश का गठन किया। भारत के नक्शे पर कलम की नोंक से लाइन खींचकर इसे बनाया गया है। इस तरह कोई देश नहीं बनता। कोई भी स्वाभाविक देश सैकड़ों-हजारों वर्षों के अपने भौगोलिक व राजनीतिक स्वरूप और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता को सजाते-संवारते, निखारते हुए अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाता है। जहां तक आजादी की बात है भारत को तो देर-सबेर आजाद होना ही था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परिस्थितियों का ऐसा दबाव हो गया था कि एक-दो साल में भारत आजाद हो ही जाता। लंबे युद्ध के कारण ब्रिटिश सरकार का दिवाला निकल चुका था। ब्रिटिश साम्राज्य का बिखरना आरंभ हो गया था। उसके सैनिक थक चुके थे। भारत की आजादी के बाद, एक के बाद एक देश, जहां कोई स्वाधीनता आंदोलन हुआ ही नहीं था, आजाद होते गए।
प्रश्न है कि भारत विभाजन की नौबत कैसे आई? हमें यह याद रखना होगा कि यदि भारत आजाद नहीं होता तो पाकिस्तान नहीं बनता। वास्तव में पाकिस्तान अंग्रेजों द्वारा मुहम्मद अली जिन्ना को मुफ्त में दिया गया एक तोहफा था, जो उन्होंने भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटते समय जिन्ना को इनायत फरमाया था। कूटनीति के परम गुरु अंग्रेजों ने अपने राजनीतिक और रणनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस कूटचाल को अमली जामा पहनाया था। अंग्रेजों को जहां भी अपना उपनिवेश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, वहां उन्होंने कुछ न कुछ कारस्तानी की या देश को बांट दिया।
साम्राज्यवादी षड्यंत्र का परिणाम
वास्तविकता यही है कि पाकिस्तान के असली संस्थापक अंग्रेज ही थे और जिन्ना हर तरह से उनके एक हस्त्तक या एजेंट के रूप में थे। गांधी जी ने 17 जून, 1947 को दिल्ली में अपनी सायंकालीन प्रार्थना सभा में कहा था- ‘पाकिस्तान जिन्ना ने नहीं बनाया है। हमें ख्वाब में भी ख्याल नहीं था कि जिन्ना पाकिस्तान बना पाएगा। अंग्रेजों की मार्फत उसने पाकिस्तान हासिल कर लिया।’ गांधीजी को ख्वाब में भी ख्याल नहीं था कि जिन्ना पाकिस्तान हासिल कर पाएंगे। लेकिन जिन्ना ने भी ख्वाब में भी यह नहीं सोचा था कि आखिर उन्हें पाकिस्तान मिल ही जाएगा। पाकिस्तान के स्थापना दिवस के लिए जिन्ना 7 अगस्त, 1947 को दिल्ली से कराची पहुंचे। जिन्ना जब अपने विमान से उतरे तब उनका चेहरा भावशून्य था। कमजोर स्वास्थ्य के कारण गवर्नमेंट हाउस (गवर्नर जनरल आवास) की सीढ़ियों पर चढ़ते समय उनकी सांस फूलने लगी। ऊपर पहुंचते ही उन्होंने अपने ए. डी. सी. सैयद एहसान की ओर मुड़कर देखा और भर्राई हुई आवाज में धीरे से कहा, ‘क्या तुम जानते हो, मैंने कभी यह उम्मीद नहीं की थी कि मैं अपनी जिंदगी में पाकिस्तान देख सकूंगा।’ इसका उल्लेख कॉलिन्स और लापियर ने भी अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘स्वाधीनता आई आधी रात’ में किया है। देखते ही देखते यह सब कैसे हो गया? दरअसल, ब्रिटिश अधिकारियों की शद्र प्राप्त मुस्लिम लीग ब्रिटिश वाइसरायों की कूटचालों और कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीतियों ने सारा खेल बिगाड़ दिया।
जवाब दो मुस्लिम लीग को
विश्वविख्यात फार्मा कंपनी ‘सिपला’ के संस्थापक ख्वाजा अब्दुल हमीद (1898-1972) एक अद्भुत राष्ट्रवादी थे। वे देश के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। वे लगातार यह कहते रहे कि मुस्लिम लीग मुसलमानों को बरगला रही है, उन्हें झूठे सब्जबाग दिखा रही है। यदि देश के बंटवारे पर विचार करना हो तो सबसे रायशुमारी (जनमत संग्रह) ली जाए और मुसलमानों को साफ बता दिया जाए कि अगर पानिस्तान निर्माण के पक्ष में वोट दिया, तो वहीं जाना होगा। लेकिन कांग्रेस ने देश के अति कामयाब उद्यमी, जिसने बहुत मामूली हैसियत से दवा उद्योग में प्रवेश कर विश्वविख्यात फार्मा कंपनी बना ली थी, की सलाह को अनसुना कर दिया। ख्वाजा हमीद का कहना था कि मुस्लिम लीग को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए। कांग्रेस ने अगर इस गुर को अपना लिया होता तो मुस्लिम लीग को चित्त करने में कोई दिक्कत नहीं होती। लेकिन गांधी और नेहरू समझते थे कि वे अपने स्वप्निल आदर्शों से जिन्ना को मात दे देंगे। इसी को कहते हैं ‘यूटोपियन ख्याली दुनिया’ अर्थात् अव्यवहार्य-स्वप्रदर्शी होना। प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी व लेखक रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर, जो केंद्र में सूचना व प्रसारण मंत्री और बिहार के राज्यपाल भी रहे, ने फरवरी 1970 में ‘हिंदू-मुस्लिम दंगों की राजनीति’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। उसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि क्या कारण था कि राजनीतिक सत्ता का लोभ नहीं रखने वाला गांधी जैसा धार्मिक व्यक्ति भारत को विभाजित करने से न जिन्ना को रोक सका, न अपने अन्य अनुयायियों को?
गांधीजी ने जिन्ना को कायदे आजम बनाया
गाधीजी ने अगस्त, 1942 मे ‘भारत छोड़ो’ नारे से जो आंदोलन शुरू किया था उसका सुझाव नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ते ही दिया था। अंग्रेज उस वक्त पस्त-हिम्मत थे। 1942 का आंदोलन सफल नहीं हुआ, क्योंकि बिना नेतृत्व वाली असंगठित और निहत्थी जनता साम्राज्यवादी सरकार से सीधी मुठभेड़ में जीत नहीं सकती थी। गांधीजी के 1942 के आंदोलन को सही करार देने वाले लोगों का कहना है कि इस विद्रोह ने अंग्रेजों को अंततः भारत छोड़ने पर विवश किया। यदि इसे सही माना जाए तो यह भी मानना होगा कि अपने हिंसक रुख के कारण आंदोलन फलदायी हुआ।
मई, 1944 में गांधीजी अपने खराब स्वास्थ्य के कारण जेल से रिहा कर दिए गए। जेल से छूटते ही उन्होंने जिन्ना की खुशामद आरंभ कर दी। उस समय भारतीय राजनीतिक मंच पर जिन्ना का कोई बहुत महत्व नहीं था। वे जिन्ना से अपने निवास स्थान पर या किसी अन्य स्थान पर मिलने के बजाय बार-बार उनके घर हाजिर होते रहे। 9 सितंबर से 27 सितंबर, 1944 तक 19 दिन लगातार जिन्ना के निवास स्थान पर उनकी बातचीत हुई, लेकिन उसका नतीजा था एक बड़ा सिफर। गांधीजी ने जिन्ना को हमेशा कायदे आजम (महान नेता) या मेरे भाई के रूप में संबोधित किया। जिन्ना गांधीजी के लिए हमेशा-मिस्टर गांधी संबोधन ही इस्तेमाल करते थे। जिन्ना को अनावश्यक महत्व देने और अपनी मर्जी की सरकार बनाने की गांधीजी की पेशकश पर सरदार पटेल बहुत नाराज व दु:खी थे। जिन्ना को इतनी मान्यता मिल जाने से वे मुसलमानों की दृष्टि में ‘हीरो’ बन गए।
जिन्ना की हठधर्मी बढ़ती गई। उन्होंने कांग्रेस को डराने और झुकाने के इरादे से 16 अगस्त, 1946 को देशभर के मुसलमानों के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ घोषित कर दिया। बंगाल में सुहरावर्दी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग की सरकार थी। 16 अगस्त, 1946 का दिन भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन था। इस दिन सत्ताधारी मुस्लिम लीग द्वारा प्रायोजित दंगों में बड़ी संख्या में हिंदू और बाद में मुसलमान मारे गए। इसकी श्रृंखला प्रतिक्रिया में दंगे पूरे देश में फैल गए।
बेदर्द हाकिम
जिन्ना को कई ब्रिटिश अधिकारियों ने कहा था, ‘दंगे नहीं कराओगे तो पाकिस्तान कैसे पाओगे।’ उसके बाद मार्च, 1947 में पश्चिमी पंजाब, जहां मुसलमानों की आबादी ज्यादा थी, में सरकार कहीं भी जल्दी हरकत में नहीं आई। सबसे भीषण दंगे रावलपिंडी के ग्रामीण क्षेत्रों में हुए। इन्हें दंगे नहीं कहकर नरसंहार कहना चाहिए।
एक ईमानदार ब्रिटिश आई. सी. एस. अफसर मेंडेरल मून ने अपनी पुस्तक ‘फूट डालो और रुखसत हो जाओ’ में खुले शब्दों से ब्रिटिश सरकार की करतूतों की पोल खोली है। मून ने लिखा है, कई ब्रिटिश अधिकारियों के विषय में यह किस्ता बताया जाता है कि जब दहशतजदा हिंदुओं द्वारा मदद की गुहार की जाती थी, तब फरियाद करने वालों को गांधी, नेहरू, पटेल से मदद मांगने को कहा जाता था। यह कोई संयोग नहीं था कि भीषण दंगों से सर्वाधिक प्रभावित पांच जिलों के डिप्टी कमिश्नर अंग्रेज थे। सर्वाधिक संवेदनशील रावलपिंडी जिले के डिवीजनल कमिश्नर, डीआईजी पुलिस, डिप्टी कमिश्नर और पुलिस सुपरिटेंडेंट सब के सब अंग्रेज थे।
कांग्रेस हुई विफल
लार्ड वेवेल के दबाव पर अंतरिम सरकार में शामिल मुस्लिम लीग के मंत्रियों ने सरकार के अंदर से तोड़फोड़ आरंभ कर दी। वित्त मंत्री लियाकत अली खान ने तो वित्तीय मामलों में सरकार की नाक में दम कर दिया। कांग्रेस ने तंग आकर, देश विभाजन की लार्ड माउंटबेटन की योजना 3 जून, 1947 को स्वीकार कर ली। विभाजन की मांग स्वीकार कर लिए जाने की जानकारी गांधीजी को बिहार के दंगाग्रस्त क्षेत्रों की अपनी यात्रा के दौरान रेडियो पर मिली। गांधीजी ने बड़े दु:ख के साथ कहा, ”यह तो मेरा खात्मा हो गया।” उन्होंने राष्ट्र को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘देश का बंटवारा कभी नहीं होगा। पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा।’ लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। लार्ड माउंटबेटन से भेंट के बाद गांधीजी का विचार बदल गया। 14 जून, 1947 को कांग्रेस महासमिति की बैठक में गांधीजी ने विभाजन की योजना को तात्कालिक अनिवार्यता के रूप में स्वीकार कर लेने का अनुरोध किया। प्रस्ताव पारित हो गया।
कांग्रेस मुस्लिम लीग की चालों को समझने में विफल रही। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी ने बाद में कहा, ‘हमारे नेता वाइसराय के हाथों में खेलते रहे, जिन्ना और लीग की बातें मानते गए।’प्रश्न है कि विभाजन का उद्देश्य क्या था? इससे कोई समस्या हल हुई? जिस खून-खराबे, अफरातफरी और अराजकता से बचने के लिए विभाजन स्वीकार किया गया था, वह सब विभाजन के बावजूद नहीं, बल्कि विभाजन के कारण हुआ।
(लेखक की पुस्तक ‘भारत विभाजन और पाकिस्तान के षड्यंत्र’ बेहद चर्चित है)

















