पाञ्चजन्य द्वारा आयोजित ‘सुशासन संवाद राजस्थान’ में आचार्य श्री मिथिलेश नंदिनी शरण जी महाराज ने पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी के साथ विशेष बातचीत में यात्रा की भारतीय दृष्टि पर गहन विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि पर्यटन जहां सुख की खोज है, देशाटन बोध की यात्रा है और तीर्थाटन स्वयं को भीतर से बदलने की साधना। लेकिन जब बाजार, सुविधा और उपभोग की दृष्टि तीर्थों पर भी हावी होने लगती है, तो तीर्थाटन की मूल चेतना के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है- क्या हम तीर्थ जा रहे हैं, या केवल एक पर्यटन-स्थल की यात्रा कर रहे हैं?
आज हम यात्रा की बात करते हैं तो अक्सर पर्यटन और तीर्थाटन को एक ही समझने की भूल कर बैठते हैं। लेकिन भारतीय परंपरा में यात्रा के उद्देश्य अलग-अलग रहे हैं और उसी आधार पर उनके स्वरूप भी अलग हैं। पर्यटन का उद्देश्य मुख्यतः आनंद और अनुभव प्राप्त करना है। आज ट्रैवल ब्लॉगर घूम-घूमकर बताते हैं- समुद्र देखना पसंद है तो इस जगह जाइए, जंगल पसंद है तो वहां जाइए, पहाड़ों के दृश्य पसंद हैं तो फलां स्थान पर जाइए। अच्छी जगह, अच्छा मौसम, अच्छा भोजन और आरामदायक व्यवस्था- ये पर्यटन की सामान्य आकांक्षाएं हैं। पर्यटन मूलतः सुख प्राप्त करने की यात्रा है।
देशाटन: देश को समझने की यात्रा
इसके बाद आता है देशाटन। देशाटन केवल घूमना नहीं, बल्कि अपने देश को समझने की प्रक्रिया है। भारत को यदि समझना है तो केवल किसी एक शहर में बैठकर उसका इतिहास और भूगोल पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। भारत किन तत्वों से बना है, उसकी विविधता क्या है, उसके अलग-अलग क्षेत्रों की जीवन-पद्धति कैसी है- यह समझने के लिए यात्रा करनी पड़ती है। आप राजस्थान के इतिहास और भूगोल को किताबों में पढ़ सकते हैं, लेकिन राजस्थान वास्तव में क्या है, यह तब समझ में आता है जब आप वहां जाते हैं। वहां के लोगों की भाषा, उनका एक-दूसरे को संबोधित करने का ढंग, अभिवादन की शैली, गांवों की संरचना, पुरानी गढ़ियां, ड्योढ़ियां, दरबार, चित्रकला और पुराने बर्तन-ये सब मिलकर बताते हैं कि राजस्थान केवल नक्शे पर बना एक प्रदेश नहीं, बल्कि एक विशिष्ट जीवन-पद्धति है। इसी तरह जब आप दक्षिण भारत जाते हैं, तो वहां की संस्कृति आपको केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि उसके जीवन में दिखाई देती है। मंदिरों में नादस्वरम और अन्य वाद्यों की परंपरा, लोगों का फूल धारण करना, घरों और दुकानों के सामने बनाई जाने वाली रंगोलियां- इन सबके माध्यम से आपको उस समाज की संवेदना और संस्कृति का अनुभव होता है। इसीलिए देशाटन का उद्देश्य बोध प्राप्त करना है। अपने देश को देखना, समझना और उसके विविध रूपों को आत्मसात करना ही देशाटन है। लेकिन भारतीय परंपरा में यात्रा का एक और बहुत गहरा रूप है- तीर्थाटन।
तीर्थाटन: आत्मशुद्धि की यात्रा
‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ ही है- तारने वाला हो, जो पार ले जाने का माध्यम बने। मनुष्य जहां खड़ा है, उसकी मलिनता और अपवित्रता को कम करके उसे एक अधिक शुद्ध और दिव्य अवस्था की ओर ले जाने वाला स्थान तीर्थ कहलाता है। इसलिए तीर्थाटन का उद्देश्य पर्यटन से बिल्कुल अलग है। तीर्थ पर जाने वाला व्यक्ति सुख-सुविधाओं की तलाश में नहीं जाता। वह अपने भीतर परिवर्तन और शुद्धि की आकांक्षा लेकर जाता है। भारत में तीर्थों में निवास करने की परंपरा रही है, जिसे कल्पवास कहा गया। प्रयाग, अयोध्या, नैमिषारण्य और पुष्कर जैसे तीर्थों में साधना और संयम की परंपराएं रही हैं। तीर्थ में जाने वाले व्यक्ति को नदी में स्नान करना पड़ता है, कभी कठिन मौसम में भी। उसे अपने भोजन से पहले किसी दूसरे को भोजन कराने की भावना रखनी होती है। अपने परिश्रम से अर्जित धन में से दान करना होता है। और जहां सामान्य जीवन में हम सेवा लेने की अपेक्षा रखते हैं, तीर्थ में हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम स्वयं किसी दूसरे की सेवा करें। अर्थात- पर्यटन सुख प्राप्त करने की यात्रा है। देशाटन बोध प्राप्त करने की यात्रा है और तीर्थाटन स्वयं को शुद्ध और परिवर्तित करने की यात्रा है। तीनों यात्राओं के उद्देश्य अलग हैं। समस्या तब शुरू होती है जब इन तीनों के बीच की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं। जब बाजार और विचार मिलकर तीर्थ को भी पर्यटन की दृष्टि से देखने लगते हैं, तब तीर्थ की मूल भावना प्रभावित होती है।
बाजार स्वाभाविक रूप से सुविधा और उपभोग बढ़ाना चाहता है। वह चाहता है कि हर स्थान पर बेहतर कमरे हों, आरामदायक परिवहन हो, हर सुविधा उपलब्ध हो और यात्रा अधिक से अधिक सुखद बने। पर्यटन के लिए यह आवश्यक भी हो सकता है। लेकिन जब यही दृष्टि तीर्थ पर लागू होती है, तो समस्या पैदा होती है। तीर्थ का उद्देश्य ही सुविधा से आगे बढ़कर संयम, सेवा, त्याग और आत्मशुद्धि की ओर ले जाना है। यदि तीर्थ को भी केवल एक पर्यटन-स्थल बना दिया गया, यदि वहां जाने की पूरी व्यवस्था केवल उपभोग और आराम के इर्द-गिर्द निर्मित होने लगी, तो धीरे-धीरे तीर्थाटन की मूल चेतना कमजोर हो सकती है।
पर्यटन, देशाटन या तीर्थाटन
पर्यटन की सुविधाएं देने वाला बाजार जब तीर्थ की व्यवस्था में प्रवेश करता है और सरकारें भी उसी दृष्टि से व्यवस्थाएं बनाने लगती हैं, तो संभव है कि व्यक्ति को यह पता ही न चले कि वह तीर्थ पर जाकर तीर्थाटन नहीं, बल्कि पर्यटन कर रहा है। तब स्थिति विचित्र हो जाती है- न पर्यटन अपने वास्तविक अर्थ में बचता है, न तीर्थाटन अपने मूल अर्थ में। तीर्थ और पर्यटन के बीच बाजार ने एक ऐसा सेतु बना दिया है, जिसमें दोनों के उद्देश्य आपस में घुलने लगे हैं। परिणाम यह है कि जिस यात्रा का उद्देश्य भीतर के परिवर्तन और शुद्धि से था, वह धीरे-धीरे बाहरी सुविधा और उपभोग की यात्रा बनती जा रही है। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम फिर से समझें कि हम यात्रा क्यों कर रहे हैं। यदि हमारा उद्देश्य सुख और मनोरंजन है- तो वह पर्यटन है। यदि हमारा उद्देश्य अपने देश, उसकी संस्कृति, इतिहास और समाज को समझना है- तो वह देशाटन है। और यदि हमारा उद्देश्य स्वयं को भीतर से बदलना, अपनी मलिनता कम करना और किसी उच्चतर अवस्था की ओर बढ़ना है- तो वह तीर्थाटन है। यात्रा एक ही हो सकती है, लेकिन उसका उद्देश्य तय करता है कि वह पर्यटन है, देशाटन है या तीर्थाटन।











