यह श्लोक आज के भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है।
श्लोक-
वयमेव करिष्यामो मातृभूमेः सुमंगलम्।
प्रतिष्ठां धर्मभूमिञ्च नेष्यामः परमोन्नतिम्।।
भावार्थ-
हम ही अपनी परमपूज्या मातृभूमि का मंगल करेगें और अपनी धर्मभूमि भारत को प्रतिष्ठा के पद पर आसीन करेंगे। हम अपनी इस मातृभूमि को उन्नति के शिखर पर ले जायेंगे।
आज के लिए प्रासंगिक-
- श्लोक इस बात पर बल देता है कि राष्ट्र की प्रगति किसी बाहरी शक्ति या केवल सरकार के भरोसे नहीं हो सकती। आज के संदर्भ में, यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना को दर्शाता है—चाहे वह आर्थिक स्वावलंबन हो, तकनीक हो, या स्थानीय स्तर पर सामाजिक उत्तरदायित्व।
- ‘सुमंगलम्’ का अर्थ केवल भौतिक प्रगति नहीं, बल्कि समग्र कल्याण है। आज जब दुनिया पर्यावरण संकट और असमानता से जूझ रही है, तब यह विचार सतत विकास (Sustainable Development), पर्यावरण संरक्षण और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने (अंत्योदय) की प्रेरणा देता है।
- ‘प्रतिष्ठा’ का अर्थ है विश्व समुदाय में सम्मानजनक स्थान। आज का भारत ज्ञान, नवाचार, अंतरिक्ष अनुसंधान, खेल और वैश्विक कूटनीति के क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। यह श्लोक आज के युवाओं को अपने-अपने क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।
- ‘धर्मभूमि’ यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ संकीर्ण पूजा-पद्धति न होकर ‘कर्तव्य, जीवन-मूल्य और नागरिक नैतिकता’ है। सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के दौर में, जब नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता के सामने चुनौतियाँ हैं, तब यह श्लोक अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर नैतिक और बौद्धिक रूप से सशक्त बनने का मार्ग दिखाता है।
- ‘परमोन्नतिम्’ यह राष्ट्र को विकास के सर्वोच्च शिखर पर ले जाने का आह्वान करता है। आज के ‘अमृत काल’ में भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने का जो लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, उस यात्रा में यह श्लोक हर नागरिक के लिए एक मार्गदर्शक मंत्र और कार्य-दृष्टि प्रदान करता है।
निष्कर्ष-
यह श्लोक केवल अतीत का वंदन नहीं है, बल्कि आज के नागरिक को अपने कर्म, कर्तव्य और देशभक्ति के माध्यम से “राष्ट्र प्रथम” की भावना से काम करने की प्रेरणा देता है।

















