यह श्लोक मूलतः राष्ट्रधर्म और देशभक्ति की सर्वोपरिता को रेखांकित करता है। इसका मूल भाव यह है कि व्यक्ति द्वारा अपने जीवन में धार्मिक या सामाजिक पुण्य कार्य एक तरफ और देश की रक्षा का कार्य दूसरी तरफ रखा जाए, तो भी देशरक्षा का पलड़ा भारी रहता है।
श्लोक-
एकतः सर्वपुण्यानि देशरक्षणमेकतः।
तुलायां दर्शनीयानि देशरक्षा विशिष्यते॥
भावार्थ-
तुला के एक पात्र में सारे पुण्य और एकपात्र में देशरक्षा रख के देखिए। वे सभी संचित पुण्य भी देश रक्षा के पलड़े को नहीं उठा सकेंगे।
आज के लिए प्रासंगिक-
यह श्लोक आज के समय में संदेश देता है कि ‘राष्ट्र रक्षा और राष्ट्रहित’ सर्वोपरि है। एक सशक्त, सुरक्षित और एकजुट भारत ही सभी व्यक्तिगत पुण्यों और अधिकारों की नींव है।

















