
भारत और म्यांमार के बीच मणिपुर की सीमा पर लंबे समय से अधूरा पड़ा सीमांकन का मुद्दा सुलझाने के लिए जमीन के आदान-प्रदान की संभावना पर चर्चा हो रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने मंगलवार को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सीमा के कुछ इलाके अभी तय नहीं हुए हैं और उन पर बातचीत चल रही है।
अमेरिकी पत्रिका द डिप्लोमैट ने 17 जुलाई को एक रिपोर्ट में लिखा था कि भारत सरकार एक आधिकारिक दस्तावेज के आधार पर मणिपुर-म्यांमार सीमा पर पिलर 65 से 68 के बीच करीब 1.4 वर्ग मील जमीन का आदान-प्रदान करने पर विचार कर रही है। यह इलाका करीब 2.8 किलोमीटर लंबा है और मणिपुर के चंदेल जिले में आता है। इसके पास म्यांमार का काबाव वैली (सागाइंग क्षेत्र) है। दस्तावेज 26 मई 2026 का है और इसमें तीन महीने में सीमांकन पूरा करने की बात कही गई थी।
भारत और म्यांमार के बीच कुल 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है। यह अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर जाती है। गृह मंत्रालय के अनुसार करीब 1,472 किलोमीटर सीमा पिलर लगाकर तय हो चुकी है। लगभग 171 किलोमीटर अभी अधूरी है। इनमें अरुणाचल के लोहित सेक्टर और मणिपुर के काबाव वैली वाले हिस्से शामिल हैं।
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1967 के द्विपक्षीय समझौते से यह सीमा तय हुई थी, लेकिन कुछ हिस्से अभी भी खुले हैं। 2018 में संसद में बताया गया था कि बाकी हिस्से द्विपक्षीय व्यवस्था से तय होंगे। मणिपुर में संवेदनशील हिस्से मोलचम (पिलर 64-68), मोरेह (75-79) और चोरो खुनौ (88-95) हैं।
द डिप्लोमैट के अनुसार जल्दी सीमांकन पूरा करने से सीमा पर बाड़ लगाने में आसानी होगी। इससे अवैध घुसपैठ, विद्रोही गतिविधियों और दूसरे अपराधों पर नियंत्रण में मदद मिलेगी। 2024 में भारत ने पूरी 1,643 किलोमीटर सीमा पर बाड़ लगाने का ऐलान किया था। साथ ही 2018 से चल रहा फ्री मूवमेंट रेजीम भी खत्म कर दिया था। उसमें सीमा के दोनों तरफ के लोग बिना वीजा 16 किलोमीटर तक जा सकते थे।
रिपोर्ट में कहा गया कि यह मुद्दा म्यांमार के नेता मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा के दौरान भी छुआ गया था। दोनों पक्ष मोलचम सेक्टर में नए पिलर लगाने और 2017 के एक प्रस्ताव पर भी बात कर रहे थे।
इस खबर के बाद मणिपुर में विरोध शुरू हो गया। कोऑर्डिनेटिंग कमिटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (कोकोमी) ने कहा कि राज्य की जमीन का छोटा सा हिस्सा भी म्यांमार को देना सही नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा हुआ तो वे चुप नहीं बैठेंगे। कोकोमी ने कहा कि मणिपुर की सीमाएं पिछली पीढ़ियों से चली आ रही हैं और इन्हें बचाया गया है। 1949 में भारत में विलय के बाद पहले भी कुछ इलाके गए हैं, इसलिए और कोई कमी स्वीकार नहीं है। उन्होंने केंद्र से लोगों की सहमति के बिना कोई फैसला न लेने की अपील की।