मुंबई के परेल की व्यस्त गलियों में एक दस मंजिला भवन खड़ा है, जो हजारों रोगियों एवं उनके देखभाल करने वालों के लिए एक आश्रय स्थल (संस्थान) है। ‘नाना पालकर स्मृति समिति (रुग्ण सेवा सदन)’ के नाम से प्रसिद्ध यह संस्था डॉ. माधवराव परलकर की दूरदर्शिता, अनवरत संघर्ष और गहन संवेदना का भव्य प्रतीक है।
प्रशिक्षण से आयुर्वेदिक चिकित्सक, जीवनपर्यंत समाजसेवक और दूरदर्शी प्रशासक के रूप में डॉ. परलकर ने पूर्ण निस्वार्थता का मार्ग चुना और भारत में चिकित्सा क्षेत्र में परोपकार (मेडिकल चैरिटी) के परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया।
प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी निर्णय
डॉ. माधवराव परलकर मेधावी छात्र थे। वर्ष 1947 में जिस वर्ष भारत को स्वतंत्रता मिली, उन्होंने आयुर्वेदिक चिकित्सा की डिग्री प्राप्त की। उनके सामने चिकित्सा क्षेत्र में एक उज्ज्वल भविष्य था। जहां उनकी योग्यता उन्हें मुंबई में आसानी से एक आरामदायक और आकर्षक निजी प्रैक्टिस दे सकती थी, वहीं उनकी अंतरात्मा का मार्ग कुछ और ही था। राष्ट्रवाद और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से प्रेरित होकर, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का पूर्णकालिक प्रचारक बनने का मार्ग चुना। अपने शुरुआती वर्षों में वह अपनी असीम ऊर्जा के लिए जाने जाते थे, युवाओं को संगठित करने और स्थानीय समुदायों की सेवा करने के लिए वे अक्सर साधारण साइकिल पर बांद्रा से विरार और चेंबूर तक लंबी दूरी तय करते थे। उनकी वाक्पटुता, सहृदय व्यक्तित्व और स्वाभाविक नेतृत्व क्षमता के कारण अंततः उन्हें कई वर्षों तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के राष्ट्रीय संगठन मंत्री के रूप में सेवा करने का अवसर मिला।
नाना पालकर स्मृति समिति का जन्म
डॉ. परलकर के मिशन में निर्णायक मोड़ 1967 में उनके घनिष्ठ सहयोगी और साथी समाजसेवक, नारायण हरि “नाना” पालकर के असामयिक निधन के साथ आया। नाना पालकर भारत के ग्रामीण हिस्सों से विशेष चिकित्सा उपचार के लिए मुंबई आने वाले गरीब मरीजों की दुर्दशा से बेहद द्रवित थे। इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए, डॉ. परलकर ने प्रसिद्ध मूत्ररोग विशेषज्ञ (यूरोलॉजिस्ट) डॉ. अजीत फड़के और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर 1968 में ‘नाना पालकर स्मृति समिति’ की स्थापना की। उनका मार्गदर्शक सिद्धांत सरल लेकिन अत्यंत गहन था: “रुग्ण सेवा – ईश्वर सेवा” (रोगी की सेवा ही ईश्वर की सेवा है)।
देखभाल करने वालों के लिए संकट
टाटा मेमोरियल अस्पताल जैसे प्रमुख सार्वजनिक संस्थान कैंसर जैसी घातक बीमारियों के लिए सुलभ उपचार प्रदान करते थे, बाहर से आने वाले परिवारों को एक और गंभीर संकट का सामना करना पड़ता था, वह था मुंबई में रहने और भोजन का अत्यधिक खर्च। अपने प्रियजनों की देखभाल करते समय कई लोग फुटपाथ पर सोते थे, जिससे उनका अपना स्वास्थ्य भी खतरे में पड़ जाता था। डॉ. परलकर ने इस समस्या का समाधान करने का बीड़ा उठाया। मात्र दो कमरों की व्यवस्था से शुरुआत करके उन्होंने इस संस्थान के परिसर के विस्तार के लिए अनवरत प्रयास किया।
समाज के सभी वर्गों को जोड़ा
डॉ. परलकर में समाज के हर वर्ग के लोगों को एक साथ लाने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने समुदाय में अपनत्व की भावना जगाने के लिए 500 रुपये दान की अपील करते हुए हजारों मध्यमवर्गीय परिवारों और जमीनी कार्यकर्ताओं को एकजुट किया।
विशिष्ट वर्ग : डॉ. परलकर के समर्पण ने औद्योगिक दिग्गजों और चिकित्सा जगत की हस्तियों के हृदय में स्थान बनाया। उन्होंने बिड़ला फाउंडेशन को गुर्दे की पथरी के इलाज के लिए ₹75 लाख मूल्य की एक उच्च-स्तरीय लिथोट्रिप्सी मशीन दान करने के लिए सहमत किया। डॉ. अजीत फडके और डॉ. गोयल (बॉम्बे अस्पताल के डीन) जैसे शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों को गरीबों के लिए मुफ्त सर्जरी और चिकित्सा परामर्श प्रदान करने के लिए भी प्रेरित किया। उनके इन निष्ठावान प्रयासों के माध्यम से ‘गोखले डायलिसिस सेंटर’ अस्तित्व में आया, जिससे गुर्दे की विफलता (किडनी फेलियर) से जूझ रहे उन मरीजों को अत्यधिक न्यूनतम दर पर जीवनरक्षक डायलिसिस मिलने लगा, जो इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ थे।
“जादुई” सुश्रुषा और उपचार स्पर्श
अपने प्रशासनिक कौशल से परे डॉ. माधवराव परलकर हृदय से एक चिकित्सक थे। उन्हें पारंपरिक भारतीय चिकित्सीय मालिश और योग पर निपुणता प्राप्त थी। उन्होंने इस कला का उपयोग असाध्य रोगों, पक्षाघात (पैरालिसिस) और तंत्रिका-मांसपेशीय (न्यूरोमस्कुलर) विकारों से पीड़ित मरीजों का पूर्णतः निःशुल्क चिकित्सा (उपचार) करने हेतु किया।
विरोधी, डॉक्टर और अहंकार का शमन: नासिक रोड जेल की गाथा
अंधकारमय राजनीतिक कालखंड के दौरान भी माधवराव का हौसला अटूट रहा। आपातकाल (1975-1977) के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इस पर डॉ. परलकर ने नासिक रोड सेंट्रल जेल को ही कल्याण केंद्र (वेलनेस सेंटर) में बदल दिया। उन्होंने अपनी जेल यात्रा का समय सह-बंदियों को योग और मालिश की तकनीक सिखाने में बिताया और बिना किसी शुल्क लिए जेल की सलाखों के पीछे रोगों की चिकित्सा की।
जब डॉ. परलकर नासिक जेल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के लिए योग और ध्यान की कक्षाएं चला रहे थे, तो सोशलिस्ट पार्टियों जैसे अन्य संगठनों से जुड़े अन्य कैदियों ने उनसे अपने कार्यकर्ताओं के लिए भी वैसी ही कक्षाएं चलाने का अनुरोध किया। ऐसी ही एक ध्यान कक्षा में उन्होंने स्वयंसेवकों से आंखें बंद करने और ईश्वर का ध्यान करने को कहा। किसान मजदूर पार्टी (PWP) के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ खड़े हुए और बोले कि वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते। डॉ. माधवराव ने उनसे बैठने, आंखें बंद करने और किसी महापुरुष का ध्यान करने को कहा; इस पर वह नेता फिर खड़े हुए और कहा कि वे किसी नेता में भी विश्वास नहीं करते। डॉ. परलकर ने उनसे पुनः बैठने, आंखें बंद करने और अपनी मां का ध्यान करने का अनुरोध किया। इस बार वह राजनीतिज्ञ उठे, सीधे डॉ. परलकर के पास आए और उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। इसके बाद कहा कि किसी भी शांतिपूर्ण बैठक में व्यवधान डालना उनका पसंदीदा शौक था और वह इसमें निपुण थे। लेकिन जब डॉ. परलकर ने उन्हें अपनी मां पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा, तो वह स्तब्ध रह गए। उन्हें समझ नहीं आया कि डॉ. परलकर का विरोध कैसे करें, क्योंकि एक साधारण मनुष्य होने के नाते वह अपनी मां का अत्यधिक आदर करते थे। सजल आंखों से राजनीतिज्ञ ने कहा, “आपने मेरी आंतरिक आंखें खोल दी हैं। आप ही मेरे गुरु हैं।”
जीवन के अंतिम पड़ाव तक सेवा की
डॉ. माधवराव परलकर का 22 फरवरी 2008 को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक वह परेल में प्रतिष्ठित बहुमंजिला ‘रुग्ण सेवा सदन’ की भवन का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा करा चुके थे, जिससे उनका सुव्यवस्थित और संस्थागत चिकित्सा परोपकार का जीवनभर का सपना साकार हुआ।
आज, ‘नाना पालकर स्मृति समिति’ का विस्तार हो रहा है, जो आधुनिक पैथोलॉजी लैब, अत्याधुनिक रियायती डायलिसिस यूनिट, कीमोथेरेपी सेंटर और कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए जांच शिविरों का संचालन कर रही है। डॉ. परलकर ने यह सिद्ध कर दिया कि वास्तविक चिकित्सा केवल नुस्खों और सर्जरी में नहीं बसती- यह समाज के सबसे कमजोर वर्ग को गरिमा, संबल और आशा प्रदान करने में निहित है।
दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥ये तीन बातें अत्यंत दुर्लभ हैं और केवल ईश्वर की अनुकंपा (दैवीय कृपा) से ही प्राप्त होती हैं: मनुष्य जन्म, मोक्ष (मुक्ति) पाने की तीव्र इच्छा (मुमुक्षुत्व), तथा किसी महापुरुष (सद्गुरु) का आश्रय।”
- आद्य शंकराचार्य कृत विवेकचूड़ामणि (श्लोक 3)

















