हाल ही में जंतर-मंतर पर नीट-परीक्षा को लेकर हुए प्रदर्शन ने लोकतांत्रिक विरोध, उसकी भाषा और उसके प्रभाव को लेकर कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इसमें सोशल मीडिया की भूमिका और छात्रों के आक्रोश की आड़ में की जा रही राजनीति भी सामने आई है। क्या लोकतांत्रिक विरोध की भाषा अब तर्क से अधिक वायरल होने की होड़ में बदल रही है? इस अंक की आवरण कथा इन्हीं प्रश्नों की पड़ताल करती है। जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बहाने यह विश्लेषण किया गया है कि कैसे एल्गोरिद्म, डिजिटल संस्कृति और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने विरोध की भाषा, उसकी मर्यादा और उसके सामाजिक प्रभाव को प्रभावित किया है। विषय के विभिन्न पक्षों को समझने के लिए शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों के विचार भी शामिल किए गए हैं।
इसी क्रम में समाज में बढ़ते आक्रोश और घटती आस्था के संबंध पर विचार करते हुए श्री मुकुल कानिटकर का लेख बताता है कि स्थायी परिवर्तन केवल विरोध से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और रचनात्मक राष्ट्रीय दृष्टि से संभव है। वहीं श्री जे. नन्दकुमार का लेख भारत के बौद्धिक वि-औपनिवेशीकरण की आवश्यकता पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है और स्मृति, शिक्षा तथा सभ्यतागत आत्मबोध के प्रश्नों को नए संदर्भ में रखता है।इस अंक में स्वातंत्र्यवीर सावरकर के भाषा-शुद्धि आंदोलन पर भी विस्तृत लेख है, जो यह स्पष्ट करता है कि भाषा का प्रश्न केवल शब्दों का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय अस्मिता का भी विषय है। साथ ही स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के जीवन और कार्य पर प्रकाशित नई पुस्तक के विमोचन के बहाने उनके व्यक्तित्व, सेवा और राष्ट्रचेतना के विविध आयामों को भी प्रस्तुत किया गया है। समसामयिक घटनाओं के विश्लेषण, वैचारिक विमर्श और राष्ट्रीय दृष्टि से जुड़े विविध लेखों के माध्यम से यह अंक पाठकों को केवल घटनाओं की जानकारी ही नहीं, बल्कि उनके व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक संदर्भों पर विचार करने का अवसर भी प्रदान करता है।
हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से जुड़े युवा आंदोलन ने यह दिखाया कि डिजिटल युग में सड़क का प्रदर्शन और सोशल मीडिया का प्रदर्शन अब दो अलग घटनाएं नहीं रही हैं। प्रश्नपत्र लीक, रोजगार और उत्तरदायित्व जैसे वास्तविक प्रश्नों से उठे इस आंदोलन को मीम, रील, व्यंग्यात्मक पोस्टर और छोटे वीडियो ने व्यापक दृश्यता दी। आंदोलन में बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया और सोशल मीडिया पर प्रसारित तस्वीरों तथा वीडियो ने विपक्षी दलों को भी इसके समर्थन में आने का राजनीतिक अवसर दिया। इसके साथ यह आशंका भी सामने आई कि छात्रों के मूल प्रश्न व्यापक दलगत राजनीति के नीचे दब सकते हैं।
इस आंदोलन के अनेक पक्ष थे। युवाओं ने अपनी बेचैनी को सार्वजनिक प्रश्न बनाया और सत्ता से उत्तरदायित्व मांगा। लेकिन इसी के समानांतर कुछ वीडियो और नारों में व्यक्तिगत, अश्लील तथा अपमानजनक भाषा का प्रयोग भी दिखाई दिया। कुछ स्थानों पर राजनीतिक नेताओं के विरुद्ध अपशब्दों, मीडिया कर्मियों को डराने और आक्रामक व्यवहार की खबरें सामने आईं। यह सब बातें एक तरफ किंतु कुछ सबसे बड़ी चीजों पर किसी का ध्यान ही नहीं गया।
छात्र हितों की दुहाई देने वाले, लेकिन विशुद्ध राजनीति में लिपटे इस कथित आंदोलन के तीन सबसे बड़े विरोधाभासों पर लगभग कोई चर्चा नहीं हुई।
पहला विरोधाभास : न्यायपालिका की टिप्पणी का एक शब्द, ‘कॉकरोच’, उन्हें अपने लिए कठोर गाली जैसा लगा। लेकिन वही समूह सार्वजनिक संवाद में गाली-गलौज, अपमान और आक्रामक भाषा का स्वयं ठेकेदार और पक्षकार कैसे बना रह सकता है? अभिव्यक्ति की मर्यादा क्या केवल अपने लिए सुरक्षित रखी जाएगी?
दूसरा विरोधाभास : शुचिता और पारदर्शिता की बात करने वालों ने एक शब्द लपककर पूरा आंदोलन खड़ा कर दिया, लेकिन फर्जी डिग्री जैसे वास्तविक और गंभीर मुद्दे से सुविधापूर्वक कन्नी काट गए। आखिर क्यों? क्या नैतिकता भी अब राजनीतिक सुविधा के अनुसार चुनी जाएगी?
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष : जेन-ज़ी कोई मंगल ग्रह से आए जीव नहीं हैं। वे हमारे ही बच्चे हैं, हमारी ही अगली पीढ़ी हैं। लेकिन बीते कुछ समय से उन्हें अलग बोली, अलग व्यवहार, अलग पहचान और स्वतंत्र अस्मिता वाले सामाजिक वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। धीरे-धीरे इस पहचान को पीढ़ियों के बीच टकराव पैदा करने वाले औजार के रूप में तराशा गया, और हम मीम तथा रील देखकर हंसते रहे ; या यूं कहें कि सोते रहे।
समाज को लगातार नई-नई अस्मिताओं में बांटना, फिर उन्हीं अस्मिताओं के बीच अविश्वास और टकराव पैदा करना, वामपंथी-मार्क्सवादी राजनीति की पुरानी रणनीति रही है। प्रश्न यह है कि हम इसे पहचान कब पाएंगे?
सोशल मीडिया पर वायरल हुए कुछ वीडियो में युवतियों द्वारा गालियों का खुला प्रयोग विशेष रूप से चर्चा का कारण बना। लेकिन इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण सावधानी से किया जाना चाहिए। केवल इसलिए कि अपशब्द किसी युवती ने बोला, वह किसी युवक द्वारा बोले गए उसी अपशब्द से अधिक अनैतिक नहीं हो जाता। समस्या वक्ता के स्त्री या पुरुष होने की नहीं, बल्कि भाषा के लक्षित, अमानवीय और हिंसा समर्थक होने की है।
यह भाषा पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व नहीं करती
फिर भी युवतियों के ऐसे वीडियो अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं, क्योंकि भारतीय समाज उनसे परंपरागत रूप से संयमित, शिष्ट और नियंत्रित सार्वजनिक व्यवहार की अपेक्षा करता रहा है। जब कोई दृश्य इस स्थापित लैंगिक धारणा को तोड़ता है, तो दर्शक को वह असामान्य और चौंकाने वाला लगता है। यही विसंगति उस सामग्री की क्लिक, टिप्पणी और साझा किए जाने की क्षमता बढ़ा देती है। इसलिए किसी युवती का अपशब्द बोलता हुआ दस सेकेंड का वीडियो हजारों शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, गंभीर वक्तव्यों और तथ्यपूर्ण पोस्टरों से अधिक दिखाई दे सकता है।
इस दृश्यता को पूरे आंदोलन या पूरी युवा पीढ़ी का प्रतिनिधि प्रमाण नहीं मानना चाहिए। अभी ऐसा कोई व्यवस्थित अध्ययन उपलब्ध नहीं है जो बताए कि सीजेपी आंदोलन में पुरुषों और महिलाओं ने किस अनुपात में गालियों का प्रयोग किया। हमारे सामने मुख्य रूप से एल्गोरिद्म द्वारा चुने और लोगों द्वारा बार-बार साझा किए गए दृश्य हैं।
एल्गोरिद्म को तर्क नहीं, प्रतिक्रिया चाहिए
सोशल मीडिया के अधिकांश प्रसार तंत्र सामग्री की सत्यता, नैतिकता या सामाजिक उपयोगिता को सीधे नहीं मापते। वे यह देखते हैं कि किस पोस्ट पर लोग रुकते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं, बहस करते हैं और उसे दूसरों के साथ साझा करते हैं। इस व्यवस्था में चौंकाने वाला, क्रोधपूर्ण, असामान्य और विरोधी समूह पर हमला करने वाला वक्तव्य स्वाभाविक रूप से लाभ की स्थिति में आ सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि एल्गोरिद्म को तर्क नहीं, प्रतिक्रिया चाहिए।
ऐसे में अनैतिक व आक्रोश से भरी सामग्री के प्रसार की संभावना बढ़ जाती है और राजनीतिक विरोधी के प्रति शत्रुतापूर्ण पोस्ट अपेक्षाकृत अधिक साझा किए जाते हैं। इस पर आने वाली सामाजिक प्रतिक्रिया, लाइक, रीपोस्ट और प्रशंसा व्यक्ति को भविष्य में और अधिक आक्रोशपूर्ण भाषा प्रयोग करने की राह पर धकेल सकती है। यह मर्यादित संवाद से गिरने का ऐसा चक्र है जो सोशल मीडिया एल्गोरिद्म के कारण लगातार बढ़ सकता है।
एल्गोरिद्म आधारित अध्ययन यह भी दिखाते हैं कि सहभागिता पर केंद्रित फीड अधिक भावनात्मक, अधिक पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक विरोधी के प्रति अधिक शत्रुतापूर्ण सामग्री को बढ़ा सकती है। राजनीतिक सामग्री में क्रोध उन भावनाओं में है जिन्हें एल्गोरिद्म विशेष रूप से ऊपर ला सकता है। कई बार उपयोगकर्ता स्वयं ऐसी सामग्री अधिक नहीं देखना चाहता, फिर भी उसकी तत्काल प्रतिक्रिया एल्गोरिद्म को उसे और अधिक दिखाने का संकेत दे देती है।
इससे एक दुष्चक्र बनता है। गाली ध्यान खींचती है। ध्यान उसे वायरल करता है। वायरलिटी वक्ता को प्रशंसा, पुरस्कार देती है। वह पुरस्कार अगली गाली को अधिक तीखा बनाता है। इस प्रकार एल्गोरिद्म केवल पहले से मौजूद आक्रोश को दिखाता नहीं है। वह सार्वजनिक अभिव्यक्ति की शैली को भी प्रभावित करता है। प्रदर्शनकारी को यह अनुभव होने लगता है कि तर्कपूर्ण वक्तव्य से कम और अटपटे, अश्लील या अपमानजनक वाक्य से अधिक दृश्यता मिलेगी।
गाली भीतर के खालीपन की भाषा भी हो सकती है
राजनीतिक गाली कई बार बहुत अधिक क्रोध की नहीं, बल्कि भेड़चाल और राजनीतिक भाषा की कमी की कहानी होती है। व्यक्ति के पास पीड़ा तो हो सकती है, लेकिन उस पीड़ा की संस्थागत व्याख्या, वैकल्पिक कार्यक्रम, संवैधानिक मांग और दीर्घकालिक समाधान की भाषा नहीं होती। तब गाली आती है। वह जटिल प्रश्न को एक व्यक्ति के अपमान में बदल देती है।
जहां तथ्य नहीं होता, वहां विशेषण आ जाता है।
जहां कार्यक्रम नहीं होता, वहां उत्तेजक नारा आ जाता है। जहां नेतृत्व नहीं होता, वहां वायरल चेहरा आ जाता है।
जहां राजनीतिक भाषा नहीं होती, वहां गाली स्वयं राजनीति बनने लगती है। वर्तमान भारतीय विपक्ष का गाली-गलौज से टूटता परहेज स्वयं उनकी बौद्धिक दरिद्रता और केवल सत्ता तक सीमित राजनीतिक नासमझी से उपजा है।
दलगत राजनीति और छात्रों के मूल प्रश्न
इसी संदर्भ में यह प्रश्न उठता है कि क्या परंपरागत विपक्ष ने युवाओं को पर्याप्त नेतृत्व, विश्वसनीय वैकल्पिक कार्यक्रम और प्रभावशाली लोकतांत्रिक भाषा उपलब्ध कराई है। सीजेपी आंदोलन सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष से भी निराश युवाओं की अभिव्यक्ति था। बाद में विपक्षी दलों ने इसमें युवा मतदाताओं तक पहुंचने की संभावना देखी और आंदोलन को समर्थन दिया। इसके साथ यह आशंका भी पैदा हुई कि दलगत राजनीति छात्रों के मूल प्रश्नों को पीछे धकेल सकती है।
कुछ राजनीतिक दल युवा आक्रोश को समझने और उसका वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करने के बजाय उसे अपने लिए तैयार ईंधन की तरह प्रयोग कर सकते हैं। जब विपक्ष के पास प्रभावी नेतृत्व, अपना नारा, संगठनात्मक धैर्य और नीति विकल्प कमजोर हों, तब वह स्वतःस्फूर्त युवा असंतोष की ऊर्जा पर सवार होने का प्रयास करता है। लेकिन केवल आक्रोश उधार लेकर कोई स्थायी लोकतांत्रिक विकल्प तैयार नहीं होता।
लक्षित गाली से क्या हो सकता है खतरा?
लक्षित गाली का सबसे गंभीर खतरा केवल अशिष्टता नहीं है। वह धीरे-धीरे किसी व्यक्ति या विचारधारा को सामान्य मानवीय गरिमा के दायरे से बाहर करने लगती है। पहले कहा जाता है कि विरोधी गलत है। फिर उसे कुटिल बताया जाता है। उसके बाद उसे गाली का पात्र बनाया जाता है। अंततः उसके विरुद्ध हिंसा को भी स्वाभाविक या न्यायोचित समझा जाने लगता है।
गाली इस परिवर्तन को बहुत सरलता से बढ़ाती है, क्योंकि वह तर्क का उत्तर देने के बजाय विरोधी की मनुष्यता को छोटा करती है। जब किसी राजनेता, पत्रकार, विद्यार्थी, मतदाता या पूरे दल या विचार को पशु, कीड़ा या यौन अपमानसूचक पहचान में सीमित कर दिया जाता है, तब उसके प्रति हिंसा पर लोगों की नैतिक रोक कमजोर पड़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक गाली सीधे भौतिक हिंसा पैदा करती है। लेकिन बार-बार की अमानवीय भाषा हिंसा के लिए अनुकूल भावनात्मक वातावरण बना सकती है। वह दर्शकों को यह सिखाती है कि राजनीतिक विरोधी संवाद का पक्ष नहीं, बल्कि समाप्त किए जाने योग्य शत्रु है।
बच्चे क्या सीख रहे हैं
वायरल राजनीतिक भाषा केवल वयस्क मतदाताओं तक सीमित नहीं रहती। बच्चे और किशोर भी रील, मीम और छोटे वीडियो के माध्यम से उसे देखते हैं। वे केवल नए शब्द नहीं सीखते। वे राजनीति का एक व्याकरण सीखते हैं। उन्हें यह संदेश मिल सकता है कि सत्ता का विरोध करना गाली देना है। लोकप्रिय होना अधिक चौंकाने वाला होना है। दृढ़ होना अधिक अपमानजनक होना है। असहमति का उत्तर सामने वाले को नीचा दिखाना है।
इससे ऐसी पीढ़ी बनने का खतरा है जो राजनीतिक रूप से उत्तेजित तो हो, लेकिन तथ्य, संविधान, नीति और संवाद की भाषा में कमजोर हो। लोकतंत्र को केवल उत्साहपूर्ण नागरिक नहीं चाहिए। उसे ऐसे नागरिक चाहिए जो सत्ता से कठोर प्रश्न पूछ सकें और फिर भी प्रतिपक्ष की मनुष्यता व गरिमा को स्वीकार करें।
विरोध का अधिकार और भाषा की जिम्मेदारी
निर्वाचित लोकतंत्र में सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन, इस्तीफा मांगना, तीखा व्यंग्य और संस्थाओं की आलोचना करना नागरिक का अधिकार है। सत्ता द्वारा असहमति को दबाना लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। लेकिन विरोधी को अपमानित करना, मीडियाकर्मी को धमकाना, किसी समुदाय को निशाना बनाना या हिंसा को उकसाना भी लोकतांत्रिक अधिकार नहीं कहा जा सकता। गाली किसी भी विचारधारा का अराजक राजनीतिक औजार बन सकती है। कसौटी यह है कि कोई राजनीतिक समूह अपने विरोधी के लोकतांत्रिक अधिकार और मानवीय गरिमा को स्वीकार करता है या नहीं।
निर्वाचित व्यवस्था की आलोचना आवश्यक है, पर निर्वाचित लोकतंत्र को गाली, भीड़ और हिंसा से प्रतिस्थापित करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार चुनाव जीत लेना भी सरकार को आलोचना से परे नहीं रखता, उसी प्रकार लोकतांत्रिक संवाद का स्तर बनाए रखने की जिम्मेदारी सत्ता, विपक्ष और सत्ता से उत्तर चाहने वाले सभी वर्गों तक पर लागू होती है।

राजनीतिक गिरावट की असली पहचान
किसी आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि उसमें कुछ लोगों ने गाली दी। ऐसा करना उसके वास्तविक प्रश्नों और शांतिपूर्ण प्रतिभागियों के साथ अन्याय होगा। लेकिन गाली के प्रसार को युवाओं की नई भाषा कहकर उसका उत्सव मनाना भी अनुचित है। राजनीतिक गिरावट तब शुरू होती है जब अपमान तर्क से अधिक प्रभावशाली हो जाता है। वायरल क्लिप नीति प्रस्ताव का स्थान ले लेती है। व्यक्ति विरोध व्यवस्था सुधार पर भारी पड़ता है। विपक्ष युवा क्रोध को दिशा देने के बजाय उसका चुनावी उपभोग करता है। आंदोलन अपने उद्देश्य से अधिक अपनी अभद्रता के कारण पहचाना जाने लगता है।
सीजेपी प्रसंग की सबसे महत्वपूर्ण सीख यही है कि भले आक्रोश वास्तविक हो सकता है। चाहे मांगें न्यायसंगत हो सकती हैं। लोकतांत्रिक हस्तक्षेप भी आवश्यक हो सकता है। फिर भी संवाद की भाषा आलोचना से परे नहीं हो जाती। किसी न्यायपूर्ण उद्देश्य से जुड़ा प्रत्येक साधन अपने आप न्यायपूर्ण नहीं बन जाता।
लोकतंत्र को ऐसी विरोध भाषा चाहिए जो सत्ता को भले असुविधा में डाले, लेकिन समाज को अमर्यादित, अमानवीय न बनाए। जो शासन से उत्तर मांगे, लेकिन बच्चों को अपमान राजनीतिक अभिव्यक्ति का सामान्य रूप न सिखाए। जो विपक्ष को अवसर दे, लेकिन उसे तर्क, नेतृत्व और नीति की जिम्मेदारी से मुक्त न करे।
राजनीति में गाली केवल शब्द की गिरावट नहीं है। वह उस क्षण की सूचना है जब समाज विचार की कठिन राह छोड़कर अपमान का आसान रास्ता चुनने लगता है।



















