प्रशांत किशोर और प्रियंका गांधी वाड्रा की हालिया मुलाकात ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में सिद्धांतों की कोई जगह नहीं है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में करारी हार के महज एक महीने बाद प्रशांत किशोर का प्रियंका गांधी के निवास पर पहुंचना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अवसरवादी कदम है।
यह मुलाकात करीब दो घंटे चली, लेकिन दोनों पक्षों ने इसे शिष्टाचार की बैठक बताकर महत्व कम करने की कोशिश की। वास्तविकता यह है कि यह हार के बाद की क्षति नियंत्रण की रणनीति है, जहां प्रशांत किशोर अपनी डूबती राजनीतिक नाव को कांग्रेस के सहारे बचाने की फिराक में हैं।
हार का कड़वा घूंट: जन सुराज का सपना चूर-चूर
बिहार चुनाव में जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। पार्टी को मात्र 3.44% वोट शेयर मिला और 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। यह कोई अप्रत्याशित परिणाम नहीं था। प्रशांत किशोर ने वर्षों तक पदयात्रा की, संगठन निर्माण का ढिंढोरा पीटा, लेकिन जब चुनाव आया तो उनकी पार्टी जनता के बीच कोई छाप नहीं छोड़ पाई। जनता ने स्पष्ट संदेश दिया कि बड़े-बड़े दावों और मीडिया हाइप से राजनीति नहीं जीती जाती।
प्रशांत किशोर, जो खुद को बिहार का नया विकल्प बताते थे, अब खुद ही विकल्प की तलाश में भटक रहे हैं। यह हार उनकी राजनीतिक समझ की नाकामी है – वे रणनीतिकार तो बेहतरीन थे, लेकिन नेता बनने की योग्यता उनमें कभी थी ही नहीं।
अवसरवाद का पुराना इतिहास
प्रशांत किशोर का कांग्रेस से रिश्ता पुराना है, लेकिन हमेशा स्वार्थ से भरा रहा। 2021-2022 में उन्होंने कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का ब्लूप्रिंट पेश किया। सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका के सामने प्रस्तुति दी। वे पार्टी में शामिल होने को तैयार थे, लेकिन जब कांग्रेस ने उन्हें एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप में सीमित भूमिका ऑफर की तो उन्होंने ठुकरा दिया। वजह? उन्हें ज्यादा अधिकार और स्वतंत्रता चाहिए थी।
बात बिगड़ी, कड़वाहट बढ़ी और प्रशांत किशोर कांग्रेस के कटु आलोचक बन गए। बिहार चुनाव प्रचार में उन्होंने राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ और SIR अभियान को चुनावी मुद्दा नहीं माना। कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा।
अब, जब खुद की पार्टी डूब रही है, तो वही कांग्रेस अच्छी लगने लगी? यह दोहरी नीति नहीं तो क्या है? प्रशांत किशोर सिद्धांतों की बात करते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें ताक पर रख देते हैं।
असंगति का शिकार: वक्तव्य और निर्णयों में कोई तालमेल नहीं
प्रशांत किशोर हमेशा संगठन निर्माण पर जोर देते थे। चुनाव से पहले कहा कि मजबूत संगठन ही जीत की कुंजी है। लेकिन हार के बाद अचानक प्रियंका गांधी से मिलने की जल्दबाजी? अपनी पार्टी के संगठन की याद क्यों नहीं आई?
जन सुराज को कांग्रेस में मिलाने या सहयोग की अटकलें इसलिए तेज हैं क्योंकि प्रशांत किशोर के निर्णयों में स्थिरता का अभाव है। वे ईमानदारी और नई राजनीति की बात करते हैं, लेकिन हारते ही पुरानी पार्टियों के दरवाजे खटखटाते हैं। बिहार में वे कांग्रेस को कमजोर बताते थे, अब उसी की गोद में जाने की तैयारी? यह असंगति उन्हें बिहार में संदिग्ध नेता बना रही है। जनता देख रही है कि उनके वक्तव्य और कार्य कितने विरोधाभासी हैं।
कांग्रेस की कमजोरी: पुराने दोस्त को फिर अपनाने की मजबूरी
कांग्रेस का भी प्रदर्शन बिहार में दयनीय रहा। 61 सीटों पर लड़कर मात्र 6 जीतीं, 2020 की तुलना में 2025 का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। पिछली बार कांग्रेस के पास 19 सीटें थीं। पार्टी विपक्षी एकता की बात करती है, लेकिन खुद कमजोर है। प्रियंका गांधी से मुलाकात में सूत्रों के मुताबिक बिहार राजनीति, विपक्षी रणनीति और आने वाले चुनावों (जैसे 2027 के उत्तर प्रदेश, पंजाब) पर बात हुई। लेकिन कांग्रेस प्रशांत किशोर जैसे अवसरवादी को अपनाकर क्या हासिल करेगी? पहले भी बात बिगड़ी थी क्योंकि किशोर पर भरोसा नहीं था – वे बाहरी व्यक्ति थे, ज्यादा अधिकार मांगते थे। अब फिर वही गलती?
कांग्रेस की यह मजबूरी दिखाती है कि उसके पास नई रणनीति या नेता नहीं हैं, इसलिए पुराने असफल प्रयोगों पर निर्भर है।
जनता की नजर में खोट : यात्राओं का कोई असर नहीं
प्रशांत किशोर की बिहार पदयात्रा और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा दोनों विफल साबित हुईं। कारण? जनता को लगता है कि इनकी नियत में खोट है। बड़े दावे, लेकिन जमीन पर कोई ठोस बदलाव नहीं। प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को ‘बी टीम’ कहा, खुद को स्वतंत्र विकल्प बताया, लेकिन अब कांग्रेस से गुप्त बातचीत? यह जनता को धोखा है।यदि नियत साफ होती तो हार के बाद संगठन मजबूत करने की बात करते, न कि पुरानी पार्टी में विलय की। दोनों यात्राएं सिर्फ मीडिया इवेंट बनकर रह गईं – केंद्र सरकार बदलने की योजना तो दूर, खुद की स्थिति भी नहीं संभाल पाए।
राजनीतिक पलटू की मिसाल
प्रशांत किशोर और प्रियंका गांधी की यह मुलाकात राजनीतिक अवसरवाद का जीता-जागता उदाहरण है। प्रशांत किशोर ने साबित कर दिया कि वे रणनीतिकार के रूप में सफल हो सकते हैं, लेकिन नेता के रूप में पूर्ण रूप से असफल। उनकी असंगतियां, पलटने की आदत और सिद्धांतों की अनदेखी उन्हें बिहार में अविश्वसनीय बना रही है।
कांग्रेस भी इस मुलाकात से कुछ खास हासिल नहीं करेगी – यह सिर्फ दोनों की कमजोरी को उजागर करती है। अंत में, जनता ही फैसला करेगी कि ऐसे पलटू नेताओं को कितना मौका देना है। यह मुलाकात नया मोड़ नहीं, बल्कि पुरानी गलतियों की पुनरावृत्ति है।

















