सुनाबेष 2026: महाप्रभु जगन्नाथ और भाई-बहन देवताओं का दिव्य स्वर्ण श्रृंगार, पुरी में उमड़ा जनसैलाब
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सुनाबेष 2026: महाप्रभु जगन्नाथ और भाई-बहन देवताओं का दिव्य स्वर्ण श्रृंगार, पुरी में उमड़ा जनसैलाब

ओडिशा के पवित्र तटीय नगर पुरी में इस वर्ष सुनाबेष के अवसर पर अद्भुत धार्मिक उत्साह और आस्था का दृश्य देखने को मिला, जब लाखों श्रद्धालु महाप्रभु जगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र और देवी सुभद्रा के दिव्य स्वर्ण श्रृंगार के दर्शन के लिए एकत्रित हुए।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद
Jul 27, 2026, 11:32 am IST
inओडिशा

भुवनेश्वर: ओडिशा के पवित्र तटीय नगर पुरी में इस वर्ष सुनाबेष के अवसर पर अद्भुत धार्मिक उत्साह और आस्था का दृश्य देखने को मिला, जब लाखों श्रद्धालु महाप्रभु जगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र और देवी सुभद्रा के दिव्य स्वर्ण श्रृंगार के दर्शन के लिए एकत्रित हुए। रथ यात्रा के दौरान आयोजित इस भव्य अनुष्ठान ने पूरे शहर को आस्था के महासागर में बदल दिया। अनुमान के अनुसार 12 लाख से अधिक श्रद्धालु देश-विदेश से यहां पहुंचे।

स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत दिव्य त्रिमूर्ति ने सिंहद्वार के समीप अपने-अपने रथों पर राजसी स्वरूप में दर्शन दिए। 12वीं शताब्दी के ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर के समक्ष यह दृश्य इतना अलौकिक था कि श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। कई भक्तों ने इसे आत्मिक शांति और आध्यात्मिक संतोष प्रदान करने वाला अनुभव बताया।

आषाढ़ शुक्ल एकादशी का विशेष महत्व

सुनाबेष का आयोजन आषाढ़ शुक्ल एकादशी के पावन दिन किया जाता है, जो रथ यात्रा के महत्वपूर्ण चरण बहुड़ा यात्रा के एक दिन बाद आता है। बहुड़ा यात्रा के दौरान देवताओं की वापसी गुंडिचा मंदिर से मुख्य मंदिर तक होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुंडिचा मंदिर को महाप्रभु जगन्नाथ का जन्मस्थान माना जाता है, जिससे इस यात्रा और इसके बाद होने वाले अनुष्ठानों का महत्व और भी बढ़ जाता है।

रथ यात्रा के दौरान होने वाला यह सुनाबेष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मंदिर के बाहर आयोजित किया जाता है। इससे उन श्रद्धालुओं को भी दर्शन का अवसर मिलता है, जिन्हें मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती।

बड़ा दांड बना भक्ति का सागर

पुरी का प्रसिद्ध बड़ा दांड (ग्रैंड रोड) इस अवसर पर श्रद्धालुओं से खचाखच भर गया। सुबह से लेकर देर रात तक जगन्नाथ मंदिर से लेकर गुंडिचा मंदिर तक का पूरा मार्ग “जय जगन्नाथ” के जयघोष से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश और निकास मार्ग निर्धारित किए गए थे। एक ओर से सिंहद्वार की ओर दर्शन के लिए प्रवेश कराया गया, जबकि दूसरी ओर से निकासी की व्यवस्था की गई।

208 किलोग्राम स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत देवता

सुनाबेष की सबसे आकर्षक विशेषता देवताओं का भव्य स्वर्ण श्रृंगार है। इस वर्ष लगभग 208 किलोग्राम स्वर्ण आभूषणों से महाप्रभु और उनके भाई-बहनों को सजाया गया। महाप्रभु जगन्नाथ को उनके रथ पर दाहिने हाथ में स्वर्ण चक्र और बाएं हाथ में रजत शंख के साथ अलंकृत किया गया। महाप्रभु बलभद्र ने स्वर्ण हल और मूसल धारण किया, जो शक्ति और संरक्षण के प्रतीक हैं, जबकि देवी सुभद्रा को पारंपरिक स्वर्ण आभूषणों से सजाया गया।

इन आभूषणों में श्री मुकुट (स्वर्ण मुकुट), श्री हस्त (स्वर्ण हाथ), श्री पायार (स्वर्ण चरण), श्री चूलापति (मस्तक आभूषण), कुंडल (कर्णाभूषण) और हरिड़ा माला, कदंब माला, बाघनखी माला तथा सेवती माला जैसी विभिन्न मालाएं शामिल थीं। पारंपरिक उत्कल शैली में बने ये आभूषण देवताओं के दिव्य स्वरूप को और भी भव्य बनाते हैं।

इतिहास में निहित परंपरा

सुनाबेष की परंपरा का इतिहास 1460 ईस्वी से जुड़ा है, जब गजपति वंश के राजा कपिलेंद्र देव ने दक्षिण भारत में विजय प्राप्त करने के बाद अपार स्वर्ण और आभूषण पुरी लाकर जगन्नाथ मंदिर को दान किए थे। समय के साथ इन स्वर्ण आभूषणों को पारंपरिक शैली में ढालकर सुनाबेष के लिए उपयोग किया जाने लगा। यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और भव्यता के साथ निभाई जा रही है, जो भक्तों की आस्था और समर्पण का प्रतीक है।

वर्ष में पांच बार होता है सुनाबेष

यद्यपि सुनाबेष रथ यात्रा के दौरान सबसे अधिक प्रसिद्ध है, लेकिन यह अनुष्ठान वर्ष में पांच बार आयोजित किया जाता है। इनमें दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा और दोल पूर्णिमा जैसे प्रमुख अवसर शामिल हैं। हालांकि, रथ यात्रा के दौरान होने वाला सुनाबेष विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह एकमात्र अवसर है जब देवताओं को मंदिर के बाहर स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है। इस कारण लाखों श्रद्धालु इस दुर्लभ दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं।

आस्था और मुक्ति का विश्वास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सुनाबेष के दर्शन से व्यक्ति के कई जन्मों के पापों का नाश होता है और उसे आध्यात्मिक मुक्ति की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस अवसर का इंतजार करते हैं और दूर-दूर से पुरी पहुंचते हैं।

नियमित परंपराओं के अनुसार संपन्न हुए अनुष्ठान
पूरे दिन के अनुष्ठान मंदिर की पारंपरिक समय-सारिणी के अनुसार संपन्न किए गए। सुबह मंगल आरती के साथ दिन की शुरुआत हुई, जिसके बाद मैलम, तड़प लागी, अवकाश और वेश जैसी परंपराएं निभाई गईं।

इसके पश्चात सकाल धूप, महा स्नान, सर्वांग पूजा और मध्याह्न धूप जैसे प्रमुख अनुष्ठान संपन्न हुए। संध्या के समय देवताओं को स्वर्ण आभूषणों से सजाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, जिसने इस पूरे आयोजन को चरम भव्यता प्रदान की।

आस्था, परंपरा और संस्कृति का अनूठा संगम

सुनाबेष केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति, सुव्यवस्थित प्रबंधन और दिव्य वातावरण ने इस आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया।

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सफल आयोजन
भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के उपाय किए। बड़ा दांड और सिंहद्वार क्षेत्र सहित प्रमुख स्थानों पर 200 से अधिक प्लाटून पुलिस बल तैनात किया गया था।
मार्केट चौक से बैरिकेडिंग की गई, ताकि श्रद्धालुओं की आवाजाही को नियंत्रित किया जा सके। मंदिर के आसपास की गलियों को भी बंद कर दिया गया, जिससे अनियंत्रित भीड़ को रोका जा सके। पार्किंग स्थलों के शीघ्र भर जाने के कारण वाहनों को तालबनिया की ओर मोड़ा गया, जिससे यातायात व्यवस्था सुचारु बनी रही।
सुरक्षा कर्मी लगातार श्रद्धालुओं को दिशा-निर्देश देते रहे और निर्धारित मार्गों का पालन करने के लिए प्रेरित करते रहे। प्रशासन और मंदिर प्रबंधन के समन्वित प्रयासों के चलते यह विशाल आयोजन बिना किसी बड़ी बाधा के सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव

भीषण गर्मी और भारी भीड़ के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था अटूट बनी रही। कई भक्त घंटों तक प्रतीक्षा करते हुए भजन-कीर्तन और “जय जगन्नाथ” के उद्घोष के साथ अपने भाव प्रकट करते रहे, ताकि वे महाप्रभु के दिव्य स्वर्ण रूप का दर्शन कर सकें।

अनेक श्रद्धालुओं ने इस अनुभव को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अनुभूति बताया। दर्शन के पश्चात उन्होंने आत्मिक शांति और संतोष की अनुभूति व्यक्त की। उनका विश्वास है कि महाप्रभु का आशीर्वाद जीवन की कठिनाइयों को दूर करता है और सही मार्गदर्शन प्रदान करता है। रात देर तक बड़ा दांड भक्ति और श्रद्धा के रंग में रंगा रहा, जहां भजन, मंत्रोच्चार और पूजा-अर्चना का सिलसिला निरंतर चलता रहा।

अधरपणा अनुष्ठान अगला चरण

सुनाबेष के समापन के पश्चात देर रात हरिशयन नीति संपन्न की गई, जो दिनभर के अनुष्ठानों का समापन दर्शाती है। इसके अगले दिन रथ यात्रा क्रम का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान अधरपणा नीति आयोजित किया जाएगा। इस अनुष्ठान में देवताओं को एक विशेष पवित्र पेय अर्पित किया जाता है, जिसे अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह रथ यात्रा की समृद्ध परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है।

Topics: rath yatralord jagannathpuri templeSunabesha 2026Jagannath TempleOdisha
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