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होम सम्पादकीय

आस्थावान समाज की सहभागिता से हो मंदिरों का प्रबंधन

सरकार मंदिर की स्थायी मालिक नहीं बन सकती। सेकुलर शासन अन्य समुदायों के उपासना स्थलों के प्रति जिस दूरी और संवेदनशीलता का व्यवहार करता है, वही दृष्टि हिंदू मंदिरों के मामले में भी अपेक्षित है

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jul 26, 2026, 06:01 pm IST
inसम्पादकीय, धर्म-संस्कृति

राम मंदिर के चढ़ावे की गणना में बैंक कर्मियों द्वारा कथित गड़बड़ी का मामला सामने आने के बाद समाज में बेचैनी रही। मंदिर में दिया गया धन केवल मुद्रा नहीं होता। वह किसी परिवार की श्रद्धा, किसी बुजुर्ग की अंतिम इच्छा और किसी व्यक्ति के विश्वास का अंश होता है। ऐसे धन में गड़बड़ी की आशंका मात्र भी लोगों को भीतर तक चोट पहुंचाती है। साथ ही यह उन राजनीतिक शक्तियों को अवसर देती है जो आस्था से जुड़ी घटना को मंदिर और हिंदू समाज के विरुद्ध आरोप में बदलने की प्रतीक्षा करती हैं। इसलिए न तो प्रश्नों को दबाया जाना चाहिए और न ही जांच पूरी होने से पहले पूरे मंदिर प्रबंधन को अपराधी घोषित करने वाली आस्था को घृणा में बदलने की उत्सुक राजनीति को कोई अवसर देना चाहिए।

बदरीनाथ और वैष्णो देवी से जुड़े विवादों ने भी यही प्रश्न उठाया है कि मंदिरों की संपत्ति, दान, भूमि, आभूषण और आय का प्रबंधन कितना पारदर्शी है। इसी बीच तमिलनाडु के पलानी मंदिर की संपत्तियों की विशेष जांच के लिए समिति बनाने का समाचार महत्वपूर्ण है। राज्य के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग ने अरुलमिगु दंडायुधपाणि स्वामी मंदिर की भूमि और अन्य परिसंपत्तियों की जांच की बात कही है। ऐसी समितियां भगवान मुरुगन के अन्य मंदिरों के लिए भी बनाई जा सकती हैं। सरकार ने इसे संपत्ति की सुरक्षा और पारदर्शिता से जोड़ा है। अभी किसी अधिकारी के विरुद्ध आपराधिक अनियमितता सिद्ध होने की सूचना नहीं है, इसलिए इसे घोटाले की पुष्टि नहीं, बल्कि सतर्कता और जांच के रूप में देखा जाना चाहिए।

पलानी की पहल उपयोगी मॉडल बन सकती है, पर तभी जब जांच कागजी सूची तक सीमित न रहे। समिति को मंदिर की मूल और वर्तमान भूमि का मिलान करना चाहिए। अतिक्रमण, लंबी लीज, बाजार मूल्य से कम किराया, संदिग्ध हस्तांतरण और दान से खरीदी गई संपत्तियों की अलग जांच होनी चाहिए। आभूषणों और कीमती धातुओं का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाए। मंदिर की आय से किए गए गैर धार्मिक खर्च का विवरण सामने आए। मंदिर की भूमि, भवन, दुकान, खेत, जलस्रोत और आभूषण का सार्वजनिक डिजिटल रजिस्टर बने। समिति की रिपोर्ट और कार्रवाई भी समाज के सामने रखी जाए। यह मान लेना भूल होगी कि सरकारी नियंत्रण अपने आप निष्ठा या पारदर्शिता की ‘गारंटी’ है। सबरीमाला और तिरुपति जैसे मंदिरों से भी कई बार खरीद, निविदा, प्रसाद सामग्री और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े प्रश्न सामने आए हैं। इससे साफ है कि व्यक्ति, ट्रस्ट या सरकार में से कोई भी व्यवस्था अपने नाम के कारण श्रेष्ठ नहीं हो जाती। निजी प्रबंध में स्वार्थ, परिवारवाद और अपारदर्शिता का खतरा हो सकता है। सरकारी प्रबंध में राजनीतिक हस्तक्षेप, नौकरशाही, ठेकेदारी और जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति आ सकती है। ट्रस्ट तभी अच्छा है जब उसकी संरचना स्पष्ट हो, लेखा स्वतंत्र रूप से जांचा जाए और निर्णय भक्त समाज के सामने रखे जाएं।

मूल प्रश्न यह है कि मंदिर किसके हैं। मंदिर न किसी मंत्री के हैं, न अधिकारी के, न ट्रस्टी के और न किसी परिवार के। मंदिर देवता के हैं और उनका सांसारिक प्रबंध आस्थावान समाज की सहभागिता से होना चाहिए। सरकार की भूमिका कानून व्यवस्था बनाए रखने, अपराध रोकने, संपत्ति बचाने और निष्पक्ष नियमन की हो सकती है, पर सरकार मंदिर की स्थायी मालिक नहीं बन सकती। सेकुलर शासन अन्य समुदायों के उपासना स्थलों के प्रति जिस दूरी और संवेदनशीलता का व्यवहार करता है, वही दृष्टि हिंदू मंदिरों के मामले में भी अपेक्षित है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मंदिर कानून से ऊपर हो जाएं। यदि कोई व्यक्ति दान की गणना में गड़बड़ी करता है तो उसे कठोर दंड मिलना चाहिए। यदि मंदिर की भूमि पर कब्जा होता है तो वह वापस ली जानी चाहिए। यदि आभूषणों में कमी है तो स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। पर यही कसौटी सरकार पर भी लागू हो। राज्य सरकारें बताएं कि मंदिरों की कितनी भूमि अधिग्रहित की गई, कितनी भूमि विकास योजनाओं में ली गई, कितना मुआवजा मिला और वह धन किस खाते में गया। मंदिरों की गोचर भूमि, तालाब, खेत और भवन किस उपयोग में हैं, इसका सार्वजनिक हिसाब होना चाहिए। क्या यह उपयोग मंदिर और भक्त समाज की सहमति से हो रहा है, यह प्रश्न भी उठना चाहिए।

मंदिर केवल पूजा और भजन के स्थान नहीं हैं। वे भारत के सांस्कृतिक गौरव, कला, संगीत, नृत्य, शिल्प, शिक्षा, अन्नदान और सामाजिक सहयोग के केंद्र रहे हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर और उससे जुड़े मठों का इतिहास बताता है कि अकाल के समय मंदिर व्यवस्था ने समाज को भोजन, आश्रय और सहारा दिया। अनेक मंदिरों ने ज्ञान परंपराओं, पांडुलिपियों, संगीत घरानों, नृत्य शैलियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को जीवित रखा। इसलिए मंदिर संपत्ति को सरकारी संपत्ति या खाली जमीन मानना गंभीर भूल है।

आज जरूरत किसी एक प्रबंधन मॉडल की अंधी वकालत की नहीं, बल्कि भक्त समाज आधारित, पेशेवर और पारदर्शी व्यवस्था की है। इसमें धर्माचार्य, सेवायत, स्थानीय श्रद्धालु, महिला प्रतिनिधि, वित्त विशेषज्ञ, विधि विशेषज्ञ और संपत्ति प्रबंधन के जानकार शामिल हों। सदस्यों का कार्यकाल तय हो, हितों का टकराव न हो, आवश्यक बातें सार्वजनिक हों और बड़े निर्णय का लिखित आधार उपलब्ध हो। मंदिर की स्वायत्तता और पारदर्शिता विरोधी बातें नहीं हैं। सच्ची स्वायत्तता वही है जो निष्ठा और पारदर्शिता के साथ जवाबदेही स्वीकार करे। देवता का धन सुरक्षित रहे, भक्त का विश्वास अक्षुण्ण रहे और सरकार रक्षक बने, स्वामी नहीं। यही न्याय है और यही समाज की अपेक्षा है।

X@hiteshshankar

Topics: सेकुलर शासनश्रद्धालुधार्मिक और धर्मार्थपारदर्शितानिष्पक्ष नियमनधर्माचार्यकठोर दंडचढ़ावापाञ्चजन्य विशेषजवाबदेहीसरकारी नियंत्रणमंदिर प्रबंधनआस्थावान समाजउपासना स्थल
हितेश शंकर
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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