20 जुलाई का दिन दिल्ली के लिए एक बार फिर वही अराजकता और भयावहता लेकर आया, जिसे उसने दिल्ली दंगों के दिन कुछ दिन पहले अनुभव किया था। इसी दिन छात्रों के साथ सबसे बड़ा छल भी सामने आया।
सड़क पर केवल वे छात्र थे, जो इस आस में आए थे कि वे एक इतिहास का हिस्सा बनेंगे, मगर इन छात्रों के साथ वे अराजक तत्व भी थे, जिनका लक्ष्य छात्रों के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना था। जिन्हें छात्रों का मुखौटा पहनकर दिल्ली को जलाना था, तोड़फोड़ करनी थी और अराजकता फैलानी थी, जो कि उन्होंने की भी!
छात्रों का कोई भी कथित नेता उनके साथ नहीं था। कोई भी सड़क पर उनके साथ नहीं था। उन्हें एक अराजक भीड़ के बीच जैसे छोड़ दिया गया था, जो दिल्ली की सड़कों पर केवल उत्पात मचा रही थी।
छात्रों के आंदोलन को कथित लेखकों और लेखिकाओं का समर्थन क्यों?
मगर जो सबसे भयावह था, वह था छात्रों से परे इस अराजकता को कथित लेखकों और लेखिकाओं का समर्थन मिलना। कुछ दिनों पहले अचानक से ही सोनम वांगचुक के समर्थन में लेखकों और लेखिकाओं का विशेष समूह उतर आया। यह वही गैंग है, जो अभी तक चुप था। उसका अचानक से मुखर होना किसी न किसी टूलकिट की तरफ इशारा करता है।
यह वही गैंग है, जो किसी भी गैर-भाजपाई सरकार में किसी भी आंदोलन के पक्ष में नहीं बोलता है। यह वही गैंग है, जिसके लिए गैर-भाजपा सरकार का हर कुकृत्य अनदेखा करने वाला होता है। उसके लिए सोनम वांगचुक या अनशन पर बैठे लोग कोई मायने नहीं रखते हैं। उसके लिए मायने रखता है कि भाजपा की सरकार क्यों है? मंदिरों का निर्माण क्यों हो रहा है? उसके लिए मायने रखता है कि कैसे एक चुनी हुई सरकार को इसलिए गिरा दिया जाए, क्योंकि वह उसके विचारों के अनुकूल नहीं है।
‘रेडीमेड कविता’ और राजनीतिक एजेंडे पर उठे सवाल
यह वही गैंग था, जिसने तृणमूल कांग्रेस के हर कुकृत्य पर अपना मुंह सिल रखा था। उसकी दृष्टि सीमित और संकुचित है। लेखकों का वही गैंग अब खुलकर छात्रों के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने के लिए तैयार है।
ऐसा नहीं है कि रेडीमेड कविता केवल इसी मामले के लिए तैयार थी, बल्कि इनकी रेडीमेड कविता हर मामले के लिए, बिना किसी तथ्यात्मक तैयारी के तैयार रहती है।
लेखन का उद्देश्य क्या?
जब भी लेखक या लेखन की बात आती है, तो सबसे पहले यही आता है कि जो लिखा जा रहा है, उसका उद्देश्य क्या है? प्रख्यात आलोचक रामचन्द्र शुक्ल लेखन को ऐसी साधना बताते हैं, जिसके द्वारा मनुष्य का हृदय अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से मुक्त होकर लोक-मंगल और व्यापक भावभूमि तक पहुंचता है। उनके अनुसार साहित्य या लेखन वह अवस्था होती है, जिसमें मनुष्य का मन अपने छोटे सुख-दुख से ऊपर उठ जाता है। वहीं इमैनुएल कांट ने भी कहा कि लेखन के माध्यम से मानव बुद्धि और ज्ञान की सीमाओं को समझा जाता है।
क्या कथित प्रगतिशील लेखन लोक से कट गया है?
मगर जब हम तमाम कथित प्रगतिशील लेखकों या लेखिकाओं को देखते हैं, तो वे लोक से एकदम कटे हुए दिखाई देते हैं और जो भी लोक का दर्द या हर्ष है, उसे अपने एजेंडे के हिसाब से मैनिपुलेट करते हैं।
जो लेखक या लेखिकाएं इस कथित आंदोलन के पक्ष में नहीं लिख रहे हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर उकसाया जा रहा है। परंतु जो भी कथित लेखक हैं, वे इस आंदोलन में यह प्रश्न नहीं कर रहे हैं कि जब यह केवल नीट का मामला था, जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर आरंभ हुआ था, उसमें हिंदू-विरोधी नारे क्यों लगे?
जो आंदोलन कथित रूप से छात्रों के लिए था और केवल नीट को लेकर था, उसमें इन नारों या घोषणाओं का क्या मतलब था कि “मैं हिंदू नहीं हूं” या फिर प्रेमानंद जी महाराज को अपशब्द क्यों कहा जा रहा था? आरएसएस के खिलाफ नारे क्यों थे? और भी कई आपत्तिजनक बातें और नारे थे, जो कि कहीं से भी छात्रों से संबंधित नहीं थे।
क्या लेखन व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोक-मंगल तक पहुंचा?
यदि रामचंद्र शुक्ल की परिभाषा को ही देखें तो लेखन ऐसी साधना है, जिसके द्वारा मनुष्य का हृदय अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से मुक्त होकर लोक-मंगल और व्यापक भावभूमि तक पहुंचता है।
तो क्या ऐसे में कथित प्रगतिशील लेखक या लेखिकाएं, जिनकी रचनाओं में हिंदू लोक के प्रति द्वेष देखा जा सकता है, अपने एजेंडे अर्थात अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से परे होकर लोक-मंगल तक पहुंच सके हैं? क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग में छात्रों का लाभ नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति घृणा थी। और वह घृणा रह-रहकर हर आंदोलन में झलक ही जाती है।
नागरिकता संशोधन कानून और किसान आंदोलन का भी किया गया उल्लेख
नागरिकता संशोधन अधिनियम में इन लोगों ने पाकिस्तानी हिंदुओं के साथ हो रहे शोषण से आंखें मूंदे रखीं और मुसलमानों को भड़काने का काम लगातार किया। उसके बाद किसान आंदोलन में इनका असली रूप देखा गया, जब ‘मोदी मर जावे’ जैसे नारों को क्रांतिकारी नारा बताया गया।
हालांकि उसमें भी उन्हें किसानों से कुछ भी लेना-देना नहीं था। और अभी भी उन्हें छात्रों से कोई मतलब नहीं लगता है, क्योंकि यदि छात्रों का हित ही उनका उद्देश्य होता तो वे पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार में छात्रों और किसानों पर हुए लाठीचार्ज पर भी कुछ कहते।
इतना ही नहीं, वे कांग्रेस शासित केरल और तेलंगाना में किसानों और छात्रों के मामलों पर अपना मुंह खोलते, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
जंतर-मंतर के आंदोलन पर लेखन और राजनीतिक एजेंडे को लेकर सवाल
अब दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के कंधे पर रखकर वे एक बार फिर अपनी मोदी, हिंदू धर्म और आरएसएस के प्रति घृणा दिखा रहे हैं, और जो भी वे कर रहे हैं, वह कुछ भी हो सकता है, मगर लेखन नहीं!
क्योंकि उनमें न ही लोक-कल्याण है और न ही लोक-मंगल! वे हर आंदोलन को हाईजैक करेंगे, वे युवाओं को बहकाएंगे और अपना हथियार बनाएंगे, मगर सड़क पर उतरने की बारी आएगी तो अराजक तत्वों के बीच छात्रों को छोड़ दिया जाएगा, लाठी खाने के लिए और खुद इंतजार करेंगे एक और आंदोलन का और यह कहने का कि—“लाइट, कैमरा और आंदोलन!”











