जंतर मंतर का 'कॉकरोच आंदोलन': शिक्षा सुधार का मुखौटा या अराजकता का कारखाना? जानिए अंदर का सच
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जंतर मंतर का ‘कॉकरोच आंदोलन’: शिक्षा सुधार का मुखौटा या अराजकता का कारखाना? जानिए अंदर का सच

Jantar Mantar Protest: नीट (NEET-UG) परीक्षा लीक के नाम पर जंतर-मंतर पर चल रहे 'कॉकरोच आंदोलन' के पीछे का सच। जानिए कैसे शिक्षा सुधार की आड़ में अर्बन नक्सल एजेंडा चलाया जा रहा है।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Shivam Dixit
Jul 17, 2026, 06:29 pm IST
in भारत, विश्लेषण, मत अभिमत, दिल्ली
Jantar Mantar Protest NEET UG Cockroach Andolan Urban Naxal Agenda Abhijit Dipke Sonam Wangchuk

भारत की राजधानी में जंतर मंतर पर चल रहा प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करने का दावा करता है, लेकिन वास्तविकता अलग है। परीक्षाओं के लीक (जैसे NEET-UG) एक गंभीर मुद्दा है, जो छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करता है और सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाता है। फिर भी, क्या इसी बहाने जंतर मंतर पर बिना अनुमति के जारी अवैध प्रदर्शन का समर्थन किया जाना चाहिए? तथ्य और तर्क कहते हैं-नहीं। यह आंदोलन छात्र हितों से ज्यादा राजनीतिक एजेंडा बन चुका है। ऐसा लगता है कि आंदोलन के नाम पर वामपंथी राजनीतिक दलों और अर्बन नक्सलियों के लिए अनुकूल जमीन तैयार की जा
रही है।

अवैध प्रदर्शन और पुलिस चेतावनी-संविधान का चयनात्मक पालन

जंतर मंतर पर दिल्ली पुलिस की ओर से लगे बैनर स्पष्ट चेतावनी देते हैं: “प्रदर्शन के लिए दिया समय समाप्त हो चुका है। अन्यथा कानूनी कार्यवाही होगी।” सहायक आयुक्त, दिल्ली पुलिस के निर्देशानुसार। सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) के प्रदर्शन को शुरू में सीमित समय (जैसे प्रात: 10 से सायं 5 तक) की अनुमति मिली, लेकिन अभिजीत दीपके और समर्थकों ने इसे अनिश्चितकालीन धरना बना लिया। पुलिस ने बार-बार जंतर मंतर खाली करने की अपील की, फिर भी प्रदर्शन जारी रहा।

संविधान अनुच्छेद 19(1)(बी) शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, लेकिन यह असीमित नहीं। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और दिल्ली पुलिस गाइडलाइंस के अनुसार जंतर मंतर जैसे संवेदनशील स्थल पर पूर्व अनुमति अनिवार्य है। बिना अनुमति या समयसीमा लांघकर प्रदर्शन जारी रखना अराजकता है।

प्रदर्शनकारियों का तर्क ‘छात्रों का भविष्य’ है, लेकिन वही लोग संविधान की बात करते हुए कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। यह मिसफिट है। अगर हर मुद्दे पर बिना अनुमति धरना चलेगा, तो सार्वजनिक व्यवस्था कैसे बनी रहेगी? एनईईटी (नीट) लीक की जांच सीबीआई/ईडी कर रही है-सरकार ने कार्रवाई की है-फिर भी आंदोलन को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।

छात्रों की गैर-मौजूदगी और राजनीतिक/वामपंथी कब्जा

वास्तविक छात्र आंदोलन में हजारों प्रभावित नीट अभ्य​र्थी दिखते, लेकिन जंतर मंतर पर सौ-पचास छात्र भी मुश्किल से नजर आए। इसके बजाय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, राजनीतिक कार्यकर्ता और एनजीओ वाले मंच संभाले हुए हैं। वामपंथी-रूझान वाले छात्र संगठन जैसे आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ सक्रिय हैं। जंतर मंतर पर नाम रहेगा अल्लाह का के नारे गूंज रहे हैं। वहां बिरयानी वितरण कार्यक्रम जोर शोर से चल रहा है और हिंदू देवी-देवताओं पर अपमानजनक टिप्पणियों पर कोई रोक नहीं है।

यह शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि लेफ्ट इकोसिस्टम का नियंत्रण दिखाता है। अभिजीत दीपके जैसे नेता विदेश से लौटकर नेतृत्व संभाल रहे हैं, जबकि उनके करीबियों ही बता रहे हैं कि इन दिनों वे नौकरी की तलाश में लगे थे। जब तक नई नौकरी नहीं मिल जाती, उन्होंने जंतर मंतर की राजनीति को अपना पार्ट टाइम रोजगार बना लिया है।

वैसे भी जंतर मंतर ने अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया से लेकर कुमार विश्वास तक को समृद्ध बनाया है। दीपके इस बात को समझ गए हैं कि जंतर मंतर से जो चमक गया, उसे फिर नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ती। नीट के नाम पर चल रहे आंदोलन में दीपके चाहे जंतर मंतर पर पचास अभ्यर्थी इकट्ठे ना कर पाएं हों लेकिन अब उन्हें पता है कि कॅरियर सेट है। अब उन्हें नौकरी ना भी मिले तो बिग बॉस से लेकर लॉकअप जैसे शो के दरवाजे उसके लिए खूल जाएंगे।

अब आंदोलन का फोकस नीट से भटक चुका है। उनकी सारी ताकत भीड़ इकट्ठी करने पर लग गई है। इसे बढ़ाने के लिए भीम आर्मी जैसे ग्रुप्स को मंच पर आमंत्रित किया गया। राकेश टिकैत, अरुंधति सुजेना राय से लेकर स्वरा फहाद अहमद भास्कर जैसे नीट मामलों के कथित एक्सपर्ट आंदोलन से सीधे जुड़ गए हैं।

कौतूहलवश आने वाली आम जनता को आंदोलनजीवियों द्वारा ‘आंदोलनकारी’ बताना भ्रम फैलाना है। जंतर मंतर पर जिन नीट के अभ्यर्थियों ​के लिए यह आंदोलन हो रहा है, उसके प्रतिनिधि छात्रों की बजाय, वहां अर्बन नक्सली तत्वों के अनुकूल माहौल बनाया जा रहा है।जंगलों में उनकी समाप्ती की घोषणा हो चुकी है। नक्सली दस्तावेज ही उन्हें शहरों की ओर शिफ्ट होने की सलाह देते हैं। जैसा नक्सली दस्तावेजों में उल्लेखित है, फॉल्ट लाइन्स (एससी/एसटी, अल्पसंख्यक, युवा, महिला) का दोहन।

अर्बन नक्सल एजेंडा और हिंदू-विरोधी सुर

नक्सलवाद की समाप्ति की घोषणा के बावजूद अब इसका अर्बन शिफ्ट दिख रहा है। जंतर मंतर पर टेंट, लंगर, लाइब्रेरी और फंडिंग के स्रोत संदिग्ध हैं। हजारों-लाखों रुपये रोज खर्च कौन कर रहा? एनजीओ और वाम संगठनों का कब्जा साफ है। प्रदर्शन ‘अराजनैतिक’ तौर पर शुरू हुआ, वह नीट केन्द्रित था लेकिन अब चुनावी सिस्टम, ईवीएम और मोदी सरकार को​ गिरा देना चाहिए तक मुद्दे बढ़ाए जा रहे हैं।

सोनम वांगचुक जैसे संदिग्ध एक्टिविस्ट्स का अभियान से जुड़ना। जिसकी सबसे बड़ी ‘थ्री इडियट’ फिल्म वाली पहचान के झूठ से आमिर खान ने अब पर्दा हटा दिया है। आमिर ने बताया, उनकी फिल्म का सोनम के जीवन से कोई संबंध नहीं है। वास्तव में सोनम को आंदोलन में पूर्जे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। अब धीरे धीरे उनका सच भी समाज के सामने आ रहा है।

केजरीवाल की पुरानी टीम ही इस पूरे आंदोलन का संचालन कर रही है। अब केजरीवाल अपने ही लोगों द्वारा तैयार मंच पर मेहमान बनकर आने की नौटंकी करते हैं और सोनम को शिक्षा मंत्री बनाने का शिगूफा छोड़ जाते हैं।

आप शासित पंजाब में सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है-ड्रॉपआउट हाई है, टीचर कम हैं और बेरोजगारी चरम पर। केजरीवाल अपने ‘मॉडल शिक्षा’ का वादा भूल गए। अगर केजरीवाल की नजर में सोनम इतने ही सक्षम हैं, तो उन्हें पंजाब क्यों नहीं सौंप देते? पब्लिक समझ रही है कि केजरीवाल का यह केंद्र को बदनाम करने का प्रयास है।

कॉकरोच प्रवक्ता द्वारा प्रेमानंद महाराज जैसे संतों पर हमले किए जा रहे हैं और उसी मंच से अल्लाह का नाम रहेगा, बिरयानी का स्वाद रहेगा खूब चल रहा है। इस तरह वहां एक प्रकार की कम्युनल फॉल्ट लाइन पैदा करने की कोशिश हो रही है।

बाबा साहब अम्बेडकर अपने अनुयायियों को शेर बनाना चाहते थे, लेकिन जंतर मंतर पर उनकी विचारधारा का नेतृत्व करने वाले युवा कॉकरोच बनने की कतार में खड़े है। यह सब देखकर बाबा साहब की आत्मा को बड़ी ठेस पहुंची होगी।

अर्बन नक्सल्स को अराजकता और हिंसक माहौल चाहिए। 20 तारीख की जैसी तैयारी की घोषणा बार बार मंच से हो रही है। सोनम के खराब सेहत का हवाला देकर जिस तरह इमोशनल अपील भीड़ बढ़ाने को लेकर जंतर मंतर से की जा रही है, इससे भीड़ बढ़ाकर उनकी उकसावे की तैयारी की मंशा साफ है।

असली मुद्दा और सच्चा समाधान

परीक्षा लीक वाकई समस्या है। एनटीए की जवाबदेही, पारदर्शिता और डिजिटल सुरक्षा जरूरी है। इस बात पर सभी एक मत हैं कि सरकार को जांच में तेजी, दोषियों पर सख्ती और परीक्षा में सुधार करनी चाहिए। लेकिन जंतर मंतर का तमाशा छात्र हित में नहीं—यह वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए है। असली छात्र घर पर पढ़ रहे हैं या री-टेस्ट दे रहे। यहां रील बनाने, तमाशा देखने और राजनीतिक स्कोर करने वाले ज्यादा हैं।

केजरीवाल की मांग और सीजेपी का विस्तार (राष्ट्रीय स्तर पर) साबित करता है कि शिक्षा सुधार बहाना है। अर्बन नक्सल रणनीति-फॉल्ट लाइन्स पर काम, अराजकता फैलाना ही इनता उद्देश्य है। सैकड़ों करोड़ की अघोषित अर्बन नक्सली संपत्ति से इनकी फंडिंग भी संभव है।

भारतीय समाज को कॉकरोच की राजनीति के एजेंडे से सावधान रहना चाहिए। बाबा साहेब का सपना शेरों का समाज बनाने का था, न कि अवसरवादियों और अराजक तत्वों का। सरकार को सख्ती से कानून लागू कर शांति बनाए रखनी चाहिए। विपक्ष और सिविल सोसायटी को तमाशा बंद करके, वास्तविक अर्थो में शिक्षा सुधार पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। परीक्षा लीक जैसी समस्याओं का समाधान संवाद और कार्रवाई से निकले, न कि अराजकता से।

इन कथित आंदोलनजीवियों का असली एजेंडा शिक्षा नहीं, बल्कि अर्बन नक्सल फॉल्ट लाइन्स पर अराजकता फैलाना और हिंदू-विरोधी सुर गूंजाना है-यह कॉकरोच एजेंडा अब पूरी तरह एक्सपोज हो चुका है।

Topics: Panchjanya newsJantar Mantar protestNEET UG Exam LeakCockroach Andolan Jantar MantarAbhijit Dipke CJPUrban Naxal AgendaSonam Wangchuk Jantar Mantarमत अभिमत
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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