
विष्णुदेव साय, मुख्यमंत्री , छत्तीसगढ़
मतांतरण को लेकर लंबे समय से देश के कई राज्यों में अलग-अलग कानून लागू हैं। अब इस सूची में छत्तीसगढ़ का नया धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम-2026 भी पूरी तरह लागू हो गया है। राज्य सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद किसी भी व्यक्ति को जबरदस्ती, लालच, धोखाधड़ी या प्रलोभन देकर मतांतरण कराने की घटनाओं पर रोक लगाना है। सरकार का मानना है कि इससे राज्य में सामाजिक सद्भाव बना रहेगा और हर व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने धर्म का पालन कर सकेगा। यह कानून 10 जुलाई 2026 से पूरे राज्य में प्रभावी हो चुका है।
नए कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति बल, धोखाधड़ी, लालच या किसी अन्य अनुचित तरीके से किसी का मतांतरण कराता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में दोषी को सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। इसके साथ ही लाखों रुपये का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी विवाह का उद्देश्य केवल मतांतरण कराना है, तो ऐसे विवाह को अदालत शून्य घोषित कर सकती है। यानी ऐसे विवाह को कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी।
अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से मतांतरण करना चाहता है, तो उसे पहले अधिकृत अधिकारी के पास आवेदन देना होगा। इसके बाद आवेदन की जानकारी संबंधित वेबसाइट, ग्राम पंचायत और स्थानीय थाने में सार्वजनिक की जाएगी। 30 दिनों तक दावा और आपत्ति दर्ज कराने का समय दिया जाएगा। जांच पूरी होने के बाद ही आगे की प्रक्रिया होगी। यदि 90 दिनों के भीतर मतांतरण नहीं होता है, तो आवेदन स्वतः समाप्त माना जाएगा। सजा के प्रावधान भी अलग-अलग श्रेणियों के अनुसार तय किए गए हैं। सामान्य मामलों में सात से दस साल तक की जेल और कम से कम पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। वहीं यदि पीड़ित नाबालिग, महिला, एससी, एसटी या ओबीसी वर्ग से है, तो सजा दस से बीस साल तक हो सकती है और न्यूनतम दस लाख रुपये का जुर्माना देना होगा। सामूहिक मतांतरण के मामलों में दस साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और कम से कम 25 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। छत्तीसगढ़ के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में अपने-अपने मतांतरण विरोधी कानून लागू हैं।