डॉ. श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती : स्वतंत्र भारत के औद्योगिक पुनर्जागरण के शिल्पी
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डॉ. श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती : स्वतंत्र भारत के औद्योगिक पुनर्जागरण के शिल्पी

स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश के औद्योगिक विकास की आधारशिला रखी थी। उनकी औद्योगिक दृष्टि केवल तत्कालीन आवश्यकताओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि राष्ट्र के दीर्घकालिक विकास का आधार बनी। केंद्रीय मंत्रिमंडल से उनके इस्‍तीफे के बाद पश्चिम बंगाल की औद्योगिक दिशा पर दूरगामी प्रभाव पड़ा

Written byविवेक श्रॉफविवेक श्रॉफ
Jul 14, 2026, 08:15 pm IST
inभारत, विश्लेषण
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

स्वतंत्र भारत के निर्माण में अनेक महापुरुषों का योगदान रहा है, किंतु औद्योगिक विकास की आधारशिला रखने वाले लोगों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उन्होंने देश के औद्योगीकरण की ऐसी दूरदर्शी नींव रखी, जिसने आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा निर्धारित की। उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब भारत आर्थिक और औद्योगिक दृष्टि से भी आत्मनिर्भर बने। इस विषय के अंतर्गत तीन प्रमुख पहलुओं पर विचार करना होगा। पहला, स्वतंत्र भारत की पहली औद्योगिक नीति के निर्माण में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का योगदान। दूसरा, उनकी औद्योगिक दृष्टि की दूरदर्शिता और उसके दीर्घकालिक प्रभाव तथा तीसरा, उनके केंद्रीय मंत्रिमंडल से अलग होने के बाद बंगाल के औद्योगिक विकास और आर्थिक हितों पर पड़े प्रभाव का विश्लेषण।

औद्योगिक पुननिर्माण में भूमिका

1941 में बंगाल के वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया। 1947 में वे स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने। वे पं. जवाहरलाल नेहरू कैबिनेट के पहले मंत्रिमंडल के कुछ गैर-कांग्रेसी सदस्यों में से एक थे। यहीं से प्रारंभ हुई भारत की औद्योगिक पुनर्निर्माण की यात्रा।

डॉ. मुखर्जी ने स्वतंत्र भारत का पहली औद्योगिक नीति संकल्‍प-1948 प्रस्तुत किया। इसमें उद्योगों को चार श्रेणियों में बांटा गया। कुछ उद्योग पूरी तरह सरकार के लिए सुरक्षित रखे गए, कुछ में सरकार अग्रणी भूमिका में रही, कुछ निजी क्षेत्र के लिए खुले रहे और शेष उद्योगों को निजी एवं सहकारी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया। वास्‍तव में इस नीति ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की भूमिकाएं निर्धारित करते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत की। डॉ. मुखर्जी का विश्वास था कि यदि भारत को विश्व में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करना है, तो उसे भारी उद्योग, मशीन निर्माण, इस्पात, ऊर्जा, परिवहन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में आत्मनिर्भर बनना होगा।

साथ ही, वे यह भी मानते थे कि भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है। इसलिए उन्होंने कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए नीतिगत पहल की, जिससे आगे चलकर भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। उनका मानना था कि लोगों को अपने गांव में ही रोजगार मिले, ताकि आजीविका के लिए उन्‍हें महानगरों की ओर पलायन न करना पड़े।

एक ओर जहां हमारे पास कोयला, लौह अयस्क, प्रचुर जल तथा प्रतिभा थी, लेकिन दूसरी ओर करोड़ों लोग गरीबी में जीवन जी रहे थे। डॉ. मुखर्जी ने इसी विरोधाभास को पहचाना। उनकी दूरदर्शी औद्योगिक नीति विभाजन के प्रभाव की विषम परिस्थितियों में आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए एक व्यावहारिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण थी। 1948 की उनकी नीति न तो पूर्ण समाजवादी थी और न ही पूरी तरह पूंजीवादी।

दूरदर्शी औद्योगिक दृष्टि

दरअसल, उन्होंने केवल नीतियां नहीं बनाई, बल्कि ऐसी संस्थाओं की नींव रखी, जिन्होंने आने वाले दशकों तक भारत के औद्योगिक विकास को दिशा दी। केंद्रीय रेशम बोर्ड, चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स और इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना उन्‍हीं के कार्यकाल में हुई। फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के अंतर्गत सिंदरी परियोजना, हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड (वर्तमान में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) का विस्तार हुआ और सरकार की भूमिका बढ़ी। डॉ. मुखर्जी का सपना था-भारत कच्चा माल बेचने वाला नहीं, बल्कि मशीन बनाने वाला राष्ट्र बने।

तंत्र भारत की पहली औद्योगिक नीति की घोषणा के बाद 21 अप्रैल 1948 को कोलकाता के ग्रैंड होटल में देश के उद्योगपतियों की एक महत्वपूर्ण सभा आयोजित हुई। इस सभा को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने भारत की औद्योगिक नीति के उद्देश्य और अपने आर्थिक दर्शन को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में रखा। उन्‍होंने उद्योगपतियों से कहा कि वे केवल अपने उद्योगों के विकास के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के औद्योगिक पुनर्निर्माण के लिए कार्य करें। सरकार, उद्योगपति और श्रमिक-तीनों राष्ट्र निर्माण के साझेदार हैं।

श्रमिक और उद्योगपति संबंधों पर उन्होंने कहा कि उद्योगों की प्रगति संघर्ष और टकराव से नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और साझेदारी से होती है। श्रमिक और प्रबंधन को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के साझेदार के रूप में कार्य करना चाहिए। उद्योग का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं, जनकल्याण है।

इसी तरह, राष्ट्रीयकरण के विषय पर भी उनका दृष्टिकोण अत्यंत संतुलित था। उनका मानना था कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र, दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है। केवल वैचारिक कारणों से राष्ट्रीयकरण करना उचित नहीं होगा। उन्होंने एक अत्यंत आधुनिक विचार भी रखा। उन्होंने कहा कि यदि कोई उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में हो, तो उसका अर्थ यह नहीं कि उसका दैनिक संचालन सरकारी अधिकारी करें। ऐसे उद्योगों का प्रबंधन संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा स्थापित स्वायत्त वैधानिक निगमों के माध्यम से होना चाहिए। आज भारत के अनेक सार्वजनिक उपक्रम इसी सिद्धांत पर कार्य कर रहे हैं।

अपने भाषण के अंत में डॉ. मुखर्जी ने पश्चिम बंगाल की विशेष परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि विभाजन के बाद लाखों शरणार्थियों के आने से कोलकाता और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों पर अत्यधिक दबाव पड़ गया है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि ‘यदि आवश्यकता पड़े तो कई करोड़ रुपये खर्च करके नए नगर बसाए जाएं, ताकि बढ़ती आबादी को व्यवस्थित रूप से बसाया जा सके।’

अगले दिन प्रतिष्ठित दैनिक ‘युगांतर’ ने ‘भारत सरकार की औद्योगिक नीति का आदर्श’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। इसमें लिखा कि ‘साधारण लोगों की स्थिति का सुधार ही देश का मुख्य उद्देश्य है।’ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसी औद्योगिक व्यवस्था चाहते थे, जिसमें उद्योग बढ़ें, उद्यमिता फले-फूले, श्रमिक सम्मानपूर्वक जीवन जिएं, संपत्ति का उपयोग समाज के कल्याण में हो और राष्ट्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने। डॉ. मुखर्जी के विचार केवल इतिहास नहीं हैं, बल्कि भविष्य के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं।

… और बदल गई बंगाल की कहानी

1950 में उन्‍होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और यहीं से पश्चिम बंगाल की कहानी बदल गई। पश्चिम बंगाल ने केवल एक केंद्रीय मंत्री नहीं खोया, हमने दिल्ली में अपनी सबसे प्रभावशाली औद्योगिक आवाज भी खो दी।
स्वतंत्रता के समय बंगाल भारत का सबसे विकसित औद्योगिक प्रदेश था। देश के अधिकांश इंजीनियरिंग उद्योग, जूट मिलें, चाय का व्यापार, प्रमुख बंदरगाह, रेलवे मुख्यालय, बैंकिंग संस्थान और व्यापारिक प्रतिष्ठान बंगाल में स्थित थे। 1947 में पूरे भारत के उत्पादन में 25 प्रतिशत योगदान बंगाल का था, जो अब लगभग 3.5 प्रतिशत है।

कोलकाता केवल एक महानगर नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक राजधानी थी। डॉ. मुखर्जी इस औद्योगिक क्षमता को भली-भांति समझते थे। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत के औद्योगिक पुनर्निर्माण में बंगाल अग्रणी भूमिका निभाए। उनके निरंतर नेतृत्व से बंगाल की औद्योगिक दिशा और अधिक सशक्त हो सकती थी। संभवतः पश्चिम बंगाल केवल इतिहास का औद्योगिक केंद्र नहीं, बल्कि आज भी भारत की औद्योगिक राजधानी होता।

राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि कारखानों से भी सुनिश्चित होती है। आज जब भारत पुनः विनिर्माण, आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि इन विचारों की अनेक आधारशिलाएं स्वतंत्रता के प्रारम्भिक वर्षों में ही रखी जा चुकी थीं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माताओं में थे, जिन्होंने उद्योग को केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रशक्ति का आधार माना।

Topics: IFCIकेंद्रीय रेशम बोर्डआर्थिक आत्मनिर्भरताराष्ट्रीयकरण दृष्टिकोणपश्चिम बंगालस्वायत्त वैधानिक निगमअर्थव्यवस्थाक्षेत्रीय प्रभाव‘आत्मनिर्भर भारत’कुटीर उद्योगस्वतंत्र भारतDr. Syama Prasad Mookerjeeपाञ्चजन्य विशेष
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