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आस्था को लांछित करने का कुचक्र

श्रीराम मंदिर में चोरी की घटना एक निर्मित होती व्यवस्था के नितांत प्रारंभिक चरण में सामने आई त्रुटि मात्र है, जिसे वही सुधार सकते हैं, जिनका पक्ष श्रीराम जन्मभूमि है, अयोध्या है। आस्था पर चोट कर हंगामा मचाने वालों को पहचानने की आवश्यकता है

Written byआचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरणआचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण
Jul 13, 2026, 12:39 pm IST
inधर्म-संस्कृति

असुर सदा रहते हैं, उनका उपद्रव रहता है। ऐसा ही एक अवसर अभी देश के सम्मुख उपस्थित हुआ है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की राशि के प्रबंधन में सामने आए एक अवांछित प्रसंग को आसुरी शक्ति ने व्यवस्था से उठाकर आस्था पर डाल दिया है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में भगवान श्रीरामलला की प्रतिष्ठा से हतप्रभ होकर मुरझाए खल-दल ने खरगोश की भांति दौड़ लगाते हुए इस प्रसंग से आसमान गिरने जैसा दृश्य बना दिया है। राजनीतिक खरगोशों की इस पुकार से सेकुलर मीडिया के जीव-जंतु भी घोर आर्त्तनाद करते हुए भागने लगे हैं।

जिनका शरीर, सामर्थ्य और अनुभव सब खरगोश से कहीं अधिक था, वे भी चीखने लगे हैं। एक त्रासदी जैसी स्थिति उपस्थित कर दी गई है। देश भर में दुःख, ग्लानि, पछतावा, अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप का क्रम चल पड़ा है। लगता है कि जैसे हम अपना स्वरूप, अपना अमृतत्व ही भूल से गए हैं। अपने स्वरूप का स्मरण ही न रहा हो। जबकि, उचित यह है कि हम किसी डर फैलाते खरगोश के पीछे भागना बंद करें। जरा ठहरकर सोचें कि क्या सच में आसमान गिर रहा है, और यदि गिर ही रहा हो तो यह खरगोश हमें भगाकर आसमान के नीचे से निकालकर ले कहां जाएगा भला। यह एक रूपक है। हम खरगोश नहीं हैं। प्रत्येक भयावने स्वर से भयभीत होकर भागना हमारा कार्य नहीं होना चाहिए। हममें स्वरों की सचाई पहचानने की, अपने डर को समझने की योग्यता होनी चाहिए। यही योग्यता भय का समाधान देती है।

संघर्ष का सुफल

शताब्दियों के संघर्ष का सुफल है कि श्रीराम जन्मभूमि का पुनर्निर्माण हुआ। प्रायः संपूर्ण देश ने इसका महोत्सव मनाया। परंतु कुछ लोग इस उत्सव का आनंद नहीं ले सके। स्वाभाविक भी था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहाहै, ‘चोरहिं चाँदिनि राति न भावा।’ अर्थात् चोरों को चांदनी रात अच्छी नहीं लगती। अस्तु, वे व्याकुल हुए लोग संशय के, षड्यंत्र के चमगादड़ उड़ाते रहे। मुहूर्त सही नहीं है, वास्तु सही नहीं है, अमुक को क्यों बुलाया, अमुक को क्यों नहीं बुलाया। पूरे देश ने यह तमाशा भी देखा। परंतु श्रीराम से इस देश का संबंध सभी भौतिक विचारों की अपेक्षा अधिक प्रगाढ़ है।

असंख्य-असंख्य श्रद्धालुजन देश-दुनिया से उमड़ पड़े। श्रीराम मंदिर ने आस्था के, आह्लाद के और भारत-भाव के नए प्रतिमान गढ़ दिए। श्रीराम जन्मभूमि का निर्माण केवल उत्सव ही नहीं था, यह एक अवस्थापना थी। एक ऐसी अवस्थापना जिसका कोई प्रारूप पहले से हमारे पास नहीं था। संस्थागत रूप से अथवा व्यवस्थागत रूप से श्रीराम जन्मभूमि मंदिर जिन दायित्वों का निर्वाह करने जा रहा था, वे अभूतपूर्व थे। उनका कोई अनुभवपरक उदाहरण नहीं था। इतने दर्शनार्थी, इतनी दानराशि, इतना आवागमन और यह सब कुछ मंदिर-निर्माण के ही मध्य चल रहा था। अभी मंदिर-निर्माण पूर्ण होकर, व्यवस्था अपने अंतिम रूप को स्थिर नहीं कर सकी थी, तब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना संज्ञान में आ गई।

राहु-केतु ने दिया विस्तार

मंदिर में दर्शनार्थियों द्वारा दानपेटियों में डाली जाने वाली भेंट राशि का संग्रह-संगणन करने वाले समूह में कुछ कर्मचारियों द्वारा धनराशि की चोरी के संकेत मिले। व्यवस्था ने इसे लक्ष्य किया, प्रशासन का सहयोग लिया और लोग पकड़े गए। चोरी की गई धनराशि भी वापस लौटाई गई। इस पूरे प्रसंग का प्रचार करने के स्थान पर व्यवस्था ने इसका समाधान करने पर ध्यान एकाग्र किया। तीर्थक्षेत्र न्यास के पदाधिकारियों समेत प्रशासन के यथापेक्षित सहयोग से पूरे प्रकरण का निस्तारण होने के पूर्व यह विषय किन्हीं राहु-केतु द्वारा, जो असुर होकर देवताओं की पंक्ति में आ मिले थे, राजनीतिक विस्तार पा गया। मंदिर-प्रबंध स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रपंचों के प्रति उत्तरदायी नहीं है, इसलिए उसने प्रतिक्रिया नहीं दी। उस शालीनता को भय और आशंका के रूप में परिभाषित किया गया। श्रीराम-मंदिर प्रतिष्ठा से जिनकी अपनी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई थी, वे मैदान में कूद पड़े और ‘चंदा चोरी’, ‘चढ़ावा-चोरी’ जैसे जुमले ‘मीडिया-ट्रायल’ में आ गए। यह देखना आश्चर्यजनक ही नहीं, अत्यंत त्रासद भी था कि मुख्यधारा के समाचार संस्थान वर्षों तक श्रीराम मंदिर का माहात्म्य-गान करके अपना बाजार चमकाने के बाद उसी श्रीराम मंदिर के विषय में उपजे प्रवाद का यथार्थ जानने का धैर्य नहीं रख सके।अपनी भाषा की मर्यादा तक बचाने का ध्यान उन्हें नहीं रहा। अनुप्रास गढ़ी हुई पंक्तियों वाली पत्रकारिता ने एक विरूपित सच को पूरे आस्थावान समाज के माथे पर मढ़ दिया। कल्पित, मनगढ़ंत आंकिक विवरण, लाखों-करोड़ों की चोरी, लूट, डकैती, गबन और घोटाले जैसे शब्द बाढ़ के पानी में गंदगी के समान तैरने लगे। देश भर से दान-दाताओं की कतार खड़ी हो गई, अपनी-अपनी दान की गई वस्तुओं का विवरण मांगती हुई। यह अत्यन्त लज्जास्पद था। कुछ कर्मचारियों की चोरी, उनका अपराध, उनकी हीनता समझ में आती है। पर श्रीरामलला को लाखों-करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाने वाला समाज जिस आतुरता से आक्षेप के साथ सामने आया, उसे देखकर लगा कि ‘नैरेटिव’ कैसे किसी भी पुण्य को पाप में बदल देता है। यद्यपि सद्भावशील लोग भी थे, पर वे या तो मौन रहे या मीडिया उन्हें सामने लाने से बचा। इस प्रकार एक प्रवाद देशभर में चल पड़ा।

आशंकाओं का समाधान

श्रीराम मंदिर में भेंट की गई धनराशि की चोरी का प्रकरण एक अनूठा प्रसंग है। यह वस्तु-मात्र की चोरी नहीं है, यह एक भाव का तिरस्कार है, यह विश्वास-परंपरा का अपमान है। इसके दोषियों को कठोरतम दंड दिया जाना उचित है। परंतु यह चोरी है, या मानवीय दुर्बलता और व्यवस्था की त्रुटि का एक उदाहरण है। इसको एक सामुदायिक अपराध के रूप में चिह्नित करना, इससे श्रीराम मंदिर की व्यवस्था और उसके प्रबंधन से देश के विश्वास को भंग करना, चोरों से भी बढ़कर दुष्कृत्य है। यह अपराध प्रायः मास भर से हो रहा है। देश भर में तथाकथित नेता, पत्रकार और स्वयंभू प्रवक्ताओं ने इस प्रसंग को अपनी प्रचार सामग्री की भांति उपयोग किया है, यह लज्जास्पद है। प्रत्येक व्यवसाय का अपना लाभ-लोभ होता है, इसके पश्चात् भी सबकी एक व्यावसायिक-नैतिक प्रतिबद्धता होती है। उसका अभाव देखकर खेद होता है। चोरी की इस घटना की विस्तृत जांच के लिए तीर्थक्षेत्र न्यास की मांग पर उत्तर प्रदेश शासन ने एक विशेष जांच दल का गठन किया। अभी उसकी विस्तृत रिपोर्ट आना शेष है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास ने बैठक करके सभी आवश्यक निर्णय लिए हैं। दानदाताओं की आशंकाओं का समाधान किया है। तीर्थक्षेत्र न्यास के दो सदस्यों के नैतिक आधार पर दिए गए त्यागपत्रों के उपरांत नए सदस्य भी लिए गए हैं। यह पूरा प्रकरण एक व्यवस्था में हुई त्रुटि का है, जिसमें दोषियों को दंड एवं इस अव्यवस्था के कारकों को चिह्नित करने तथा ठीक करने का दायित्व है। परंतु, इसे राजनीतिक लक्ष्य-सिद्धि हेतु जिस दुष्प्रचार में धकेला गया और चरित्रहनन की जो कूटयोजना चलाई गई, वह व्यवस्था के बहाने आस्था को ही दमित करने का कुचक्र है। जो लोग लुटेरे तैमूर और बाबर को ‘नायक’ मानते आए हैं, वे श्रीराम-मंदिर के सेवादारों को चरित्र प्रमाणपत्र देने लग गए हैं। जिनके लिए श्रीराम और उनकी जन्मभूमि का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अस्तित्व ही नहीं था, वे मंदिर की शुचिता तथा श्रीराम की सेवा की आचार-संहिता पर बात करने लगे हैं। कहना कठिन है कि यह पाखंड किस नए आघात की पूर्वयोजना है।

आसुरी प्रवंचना

एक आंधी सी चल पड़ी है, धूल ने आकाश ढक लिया है। पर ऐसा सदा नहीं रह सकता। वर्षा होगी, धूल कीचड़ होकर वहीं जाएगी, जहां से उड़ी थी। आकाश की स्वच्छता को सदा ढककर नहीं रखा जा सकेगा। किंतु इस बीच जो आतुरता, जो अविश्वास आस्थावान समाज में दिखाई पड़ा है, वह चिंताजनक और लज्जास्पद है। कदाचित् यही बिंदु है, जहां से हिंदू-समाज को अपनी परीक्षा करनी चाहिए। अपने शत्रुबोध को परिभाषित करना चाहिए। अपने प्रति अपनी संशयशीलता के अभिशाप से उबरना चाहिए। जिन्होंने शताब्दियों तक श्रीराम जन्मभूमि से अयोध्या को वंचित रखा, उनके राजनीतिक वंशधर, उनके विचारों के पोषक अयोध्या के पथ-प्रदर्शक नहीं हो सकते, यह बोध स्पष्ट होना चाहिए। साधु-संत, सद्गृहस्थ और समस्त श्रद्धालु समाज को अयोध्या के गौरव के प्रति अपनी प्रतिज्ञा को पहचानना चाहिए। श्रीराम मंदिर में चोरी की घटना आकाश के गिरने की घटना नहीं है। यह एक निर्मित होती व्यवस्था के नितांत प्रारंभिक चरण में सामने आई त्रुटि मात्र है, जिसे वही सुधार सकते हैं, जिनका पक्ष श्रीराम जन्मभूमि है, अयोध्या है।वास्तव में देवताओं को अमृत पीने से पहले ही राहु को पहचानना होगा। अन्यथा हमारा भूगोल-खगोल कटे हुए मुंडों वाले अशुभ ग्रहों से भर जाएगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी सहकारिता किसी के कुचक्र से भंग न हो जाए। तीर्थक्षेत्र न्यास के लिए भी यह घटना एक पाठ हो सकती है कि जो आपको अयोध्या के भूगोल में मंदिर बनाने से नहीं रोक सके, वे भाव के भूगोल में इस मंदिर के ध्वंस का यत्न करते रहेंगे। आपको पत्थर ही नहीं, पवित्रता बचाए रखने का भी भार उठाना होगा। अंतत:, यह एक आसुरी प्रवंचना है, जो शुचिता की कुछ कमी से इतनी सांघातिक हो गई। अब यह न दुहराया जाए, ऐसी व्यवस्था से संस्था एवं आस्था, दोनों के मान की रक्षा हो सकेगी।

Topics: विश्वास-परंपराभारत-भावआस्था पर प्रहारदुष्प्रचार और कुचक्रअयोध्याचरित्रहननश्रीराम जन्मभूमि मंदिरचंदा चोरीपाञ्चजन्य विशेषतीर्थक्षेत्र न्यासभगवान श्रीरामललाआस्था और शुचिताआसुरी शक्ति
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पीठाधीश्वर, सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या [Read more]
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