यथाग्निर्दारुमध्यस्थो, नोत्तिष्ठेन्मथनं विना। विना चाभ्यासयोगेन, ज्ञानदीपस्तथा न हि।।
भावार्थ –
जिस प्रकार लकड़ी में स्थित अग्नि मंथन (रगड़) के बिना दिखलाई नहीं पड़ती, उसी प्रकार ज्ञानरुपी ज्योति बिना स्वाध्याय के प्रकाशित नहीं होती। (अतः स्वाध्याय नित्य नियमित रुप से करना चाहिये।)