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पाक प्रायोजित आतंकवाद से लड़ रही पुलिस को हतोत्साहित करती फिल्म ‘सतलुज’

पाक प्रायोजित आतंकवाद से लड़ रही पंजाब पुलिस को हतोत्साहित करने वाली फिल्म ‘सतलुज’ पर उठा विवाद। दिलजीत दोसांझ की इस फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने का कारण, जसवंत सिंह खालड़ा नैरेटिव और सुरक्षा बलों के मनोबल पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की सच्चाई जानें।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Jul 7, 2026, 01:56 pm IST
in विश्लेषण, पंजाब
Film Satluj

पंजाब में इस इन दिनों दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ पर घमासान मचा हुआ है। इसमें फिल्मी हस्तियों से लेकर राजनीतिक हस्तियां भी उतर आई हैं। ‘सतलुज’ काफी समय तक विवादों में रही और सेंसर बोर्ड के पास फंसी रही और अब जब तीन साल बाद ओटीटी पर आई, तो इसे अचानक ही हटा दिया गया।

ओटीटी से क्यों हटाई गई सतलुज

‘सतलुज’ को ओटीटी से क्यों हटाया गया, इसका कारण एक सरकारी अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि निर्माताओं ने 2022 में ‘पंजाब 95’ के तहत सेंसर सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया था, लेकिन सेंसर बोर्ड के सुझाए 127 कटों को स्वीकार नहीं किया और फिल्म की रिलीज रोक दी। निर्माताओं ने चुपचाप फिल्म को एक नए नाम ‘सतलुज’ के साथ ओटीटी पर रिलीज कर दिया। ओटीटी, सेंसर बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। जब मामला सरकार के संज्ञान में आया, तो जी-5 को फिल्म हटाने के लिए कहा गया। यह निर्देश सुरक्षा कारणों से दिया गया है।

लगभग दो दिनों तक ओटीटी पर चली इस फिल्म को काफी लोग देख चुके हैं और दावा किया जा रहा है कि कईयों ने डाऊनलोड भी की है। फिल्म देख कर लगता है कि इससे पंजाब में चल रहे अलगाववाद, आंशिक आतंकवाद व गैंगस्टरवाद को प्रोत्साहन मिल सकता है। इस तरह की फिल्म से देशविरोधी शक्तियों से लड़ रही पंजाब पुलिस के मनोबल पर बुरा असर पड़ सकता है। यह फिल्म सुरक्षा बलों को हतोत्साहित करने वाली बताई जा रही है।

पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों का दृश्य

दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ यह स्वयंभू मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आधारित है। फिल्म की सामग्री को लेकर सेंसर बोर्ड को आपत्ति रही है। देश में जिस तरह मानवाधिकारवादी व बुद्धिजीवी इन पवित्र शब्दों की आड़ में आतंकवाद को कवर फायर देते रहे हैं यह अब रहस्य नहीं रहा है। पंजाब में आतंकवाद के समय सक्रिय रहे जसवंत सिंह खालड़ा नामक मानवाधिकारवादी भी इसी कबीले के थे।

इनकी मानवाधिकारों के प्रति चिंता की एक बानगी देखिए कि 1993 में खालिस्तानी आतंकवाद से लड़ रही राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के पदाधिकारी उग्रवाद पीडि़त हिन्दू-सिख परिवारों के बच्चों को लेकर जसंवत सिंह खालड़ा के पास गए तो उन्होंने इन पीड़ितों की आवाज उठाना तो दूर, मिलने से भी इंकार कर दिया था। इसी घटना से समझा जा सकता है कि स्वयंभू मानवाधिकारवादी जसंवत सिंह खालड़ा का कलेजा केवल एकतरफा बातों पर ही पसीजता रहा है। सतलुज फिल्म में पाकिस्तान प्रायोजित खालिस्तानी आतंकवाद से लड़ऩे वाली पंजाब पुलिस को हत्यारिन के रूप में दिखाया गया है।

जैसा कि सभी जानते हैं कि पंजाब में 1993 तक आतंकवाद पर काफी सीमा तक काबू पा लिया गया था और देश का यह सीमावर्ती राज्य सामान्य स्थिति में लौट रहा था। अपनी सूझबूझ के साथ काम करने वाले पुलिस महानिदेशक  के.पी.एस. गिल ने खालिस्तानी आतंकवाद का पूरा विमर्श ही बदल दिया।

पुलिस महानिदेशक के.पी.एस. गिल का निबंध

गिल अपने निबंध, ‘एंडगेम’ में लिखते हैं कि खालिस्तानियों ने हथियार डाल दिए थे, लेकिन अराजकतावादियों ने हार नहीं मानी। जब उन्हें हालात सुरक्षित लगे, तो वे अपने बिलों से बाहर निकल आए।’ अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर लिखे निबंध में गिल ने राजनीतिक नेतृत्व की विफलता और राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति उसके क्षुद्र और अल्पकालिक दृष्टिकोण की आलोचना बड़ी बेबाकी से की है। गिल लिखते हैं, ‘उदारवादी मानसिकता इस वास्तविकता को लेकर सदैव असमंजस में रही कि राज्य, अन्य बातों के अलावा, एक दंडात्मक तंत्र भी है और समय-समय पर उसे बल प्रयोग का विकल्प अपनाना ही पड़ता है। यह बल प्रयोग न्यायोचित, सीमित और विशेष रूप से लक्षित होना चाहिए। यदि राज्य ऐसा नहीं करता, तो स्वतंत्रता, लोकतंत्र और वैध शासन के शत्रुओं की अधिक भयावह हिंसा से वह पराजित हो सकता है। इस वैध दंडात्मक अधिकार का प्रयोग न करना कोई अहिंसा का कार्य या त्याग नहीं, बल्कि यह एक बौद्धिक कंगाली और जिम्मेदारी से भागना है, जो हिंसा को अनियंत्रित बना देता है, उसे राज्य के संस्थागत नियंत्रण से अलग कर देता है और ऐसे लोगों के हाथों में सौंप देता है जो बिना किसी विवेक और कानूनी सीमाओं के उसका उपयोग करते हैं।’

वामपंथियों ने पुलिस को किया बदनाम

पर कुछ स्वार्थी तत्त्वों ने पंजाब पुलिस के विरुद्ध नई परेशानियाँ खड़ी कर दीं। वामपंथी और तथाकथित उदारवादी लोगों ने बदले की भावना से पुलिसकर्मियों पर मानवाधिकार उल्लंघन के अनेक मामले दर्ज करवा दिए जिन पुलिसकर्मियों ने अपनी और अपने परिवारों की सुरक्षा को दांव पर लगाकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, उन्हें ही निशाना बनाया गया। इसका उन पर बहुत मनोबल गिराने वाला प्रभाव पड़ा।

खालिस्तानियों के समर्थन में गढ़े गए मानवाधिकार नरैटिव

मानवाधिकार लॉबी द्वारा लगातार किये गए उत्पीड़न और पुलिस बल के अपमान का दुष्परिणाम यह हुआ कि अपनी अनुकरणीय सेवा के लिए दो राष्ट्रपति पदक जीतने वाले पूर्व एसएसपी अजीत सिंह संधू ने आत्महत्या कर ली। सुरक्षा बलों पर मानवाधिकार लॉबी के हमले से पता चलता है कि यह लॉबी हिंसक खालिस्तानी आंदोलन के इर्द-गिर्द मानवाधिकार उल्लंघन का नैरेटिव खड़ा करने में सफल रही है, जिसने न केवल सुरक्षा बलों को कटघरे में खड़ा कर दिया, बल्कि आतंकवादियों द्वारा की गई हिंसा पर पर्दा डालने और पंजाब में हुई हिंसा का सारा दोष सुरक्षा तंत्र पर मढ़ने के एक बहाने के रूप में किया गया था।

‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट में इस गंभीर मुद्दे को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है कि ‘अपने जीवन के अंतिम कुछ महीनों में अजीत सिंह संधू बहुत परेशान थे। पंजाब के इस पुलिस अधिकारी ने सन 1991 में तरनतारन जैसे आतंकवादियों के गढ़ में उनसे लड़ने की चुनौती ली थी, यह वह समय था जब कोई और वहाँ जिला प्रभारी के रूप में तैनात होने को तैयार नहीं था। आतंकवाद पर नियंत्रण पाने के लिए उन्होंने जिन अतिरिक्त तरीकों का सहारा लिया था, वे अब कोर्ट की टिप्पणियों और सीबीआई मामलों के रूप में उनके पीछे पड़ गए थे। जाँच एजेंसी द्वारा उनके खिलाफ 16 मामलों में से दो में आरोप तय होने के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया। निलंबन के बाद संधू ने अमृतसर जेल में भी समय बिताया, जेल में बंद उग्रवादियों द्वारा हमले के बाद जनवरी में उन्हें जमानत मिल गई।

22 मई की शाम को उनके बर्दाश्त से बाहर हो गया, क्योंकि कथित जमीन हड़पने के एक मामले में उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था। अगली सुबह, वीरता के लिए दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित होने वाले संधू हिमालयन क्वीन ट्रेन के आगे कूद गए। आत्महत्या करने से पहले संधू ने एक नोट लिखा था: ‘अपमान में जीने से मर जाना बेहतर है।’ उनके शब्दों में जो निराशा झलकती है, वह पंजाब पुलिस के उन दो हजार से अधिक पुलिसकर्मियों की हताशा का प्रतिबिंब है, जो आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई के दौरान उठाए गए कठोर कदमों के लिए आज भी अदालतों में घसीटे जा रहे हैं। 1995 में, विभिन्न अदालतों में 585 याचिकाएँ दायर की गईं। अब यह संख्या दोगुनी हो गई है।

मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए राज्य पुलिस ने सन 1995 में एक महानिरीक्षक (आईजी) के अधीन एक अलग मुकदमा शाखा की स्थापना की थी। अब पुलिस बल में यह भावना प्रबल होती जा रही है कि शीर्ष नेतृत्व के व्यवहार अथवा दृष्टिकोण में परिवर्तन से पुलिसकर्मियों के लिए आवश्यक समर्थन अथवा सहायता प्रणाली कमजोर अथवा टूटती जा रही है। पुलिस अधिकारी कहते हैं, आतंकवाद से लड़ने वालों को अब उनके अपने वरिष्ठ अधिकारी ही अपराधी के रूप में देखते रहे हैं।’

पंजाब पुलिस के खिलाफ छद्म मानवाधिकारवादियों का षड्यंत्र

उस समय पंजाब पुलिस के खिलाफ खोले गए मानवाधिकारवाद के नए मोर्चे को लेकर देश भर में प्रतिक्रियाएं मिलीं और इसकी घोर निंदा हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल ने सन 1997 में पूर्व एसएसपी अजीत सिंह संधू की आत्महत्या पर शोक व्यक्त करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। इस में कहा गया, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की यह सभा पंजाब पुलिस के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री अजीत सिंह संधू की दर्दनाक मृत्यु पर गहरा क्षोभ और चिन्ता प्रकट करती है। श्री संधु ने आत्महत्या की अथवा उनकी हत्या की गई, इस मुद्दे पर विभिन्न मत हो सकते हैं। परन्तु इस बात में कोई शंका नहीं है कि श्री संधु तथाकथित मानवाधिकारवादियों द्वारा उनके खिलाफ फैलाये गये दुर्भावनापूर्ण प्रचार, परिणामत: उनकी गिरफ्तारी और जेल में उन कुख्यात अपराधियों तथा आतंकवादियों की कोठरी में उन्हें मिली यातनाओं के शिकार हुए, जिनके खिलाफ उन्होंने बहादुरी से आजीवन संघर्ष किया था।

श्री संधु का जीवन और जिन परिस्थितियों में उनके प्राण गये ध्यान देने योग्य है। आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित पंजाब के तरनतारन जिले के मोर्चे पर वे तैनात थे। पड़ोसी शत्रु देश की शह पर विघटनकारी आतंकवादियों के हौसले इस कदर बुलन्द थे कि तरनतारन जिले को ‘मिनी-खालिस्तान’ कहा जाने लगा था। ऐसी भीषण परिस्थितियों से जूझने में श्री संधु का साहस, शौर्य और चातुर्य सचमुच अनुपम उदाहरण है। पूरी तरह हावी हो चुके आतंकवादियों को शिकस्त देकर उन्होंने न केवल उनके मोर्चे धवस्त कर दिये वरन तरनतारन जिले की भारत के साथ अखंडता की रक्षा की और जिले की शान्ति प्रिय जनता के मनोबल को कायम रखने में भी वे सफल हुए।’

(संघर्ष का समाधान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शैली, लेखक डॉ. रतन शारदा व डॉ. यशवंत पाठक)

ज्ञात रहे कि तरनतारन जिले को खालिस्तान का राकेट कहा जाता था, जो पंजाब को खालिस्तान घोषित करने की ओर ले जाता। इस पूरी योजना के पीछे पाकिस्तान का हाथ था, जो सीमा के उस पार कभी भी सैन्य हस्तक्षेप कर सकता था। संधू जैसे जिस अधिकारी ने तरनतारन को नियंत्रण में लाकर पूरे पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद की कमर तोड़ी, उसको आत्महत्या करनी पड़ी। पंजाब में आज जब फिर से रह-रह कर आतंकवाद की पदचाप सुनाई दे जाती है, गैंगस्टरवाद, फिरौती का धंधा और नशे के दानव आए दिन अपना आकार बढ़ा रहे हैं तो ऐसे समय में ‘सतलुज’ जैसी गलत नैरेटिव स्थापित करने वाली फिल्में दोबारा से राज्य को अशांति के मार्ग पर धकेल सकती हैं।

Topics: सतलुज फिल्मसतलुज फिल्म विवादपाक प्रायोजित आतंकवादपंजाब पुलिस हतोत्साहन
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