कलकत्ता हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि दहेज की मांग और लगातार मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना के कारण आत्महत्या जैसी घटनाएं आज के समय में बहुत दुर्लभ नहीं हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में दोषी पति की सजा को उम्रकैद से घटाकर 10 साल की कैद कर दिया। वहीं, सबूतों की कमी के कारण पति के माता-पिता को बरी कर दिया गया।
दहेज के दबाव से तंग आकर महिला ने बेटी संग जान दी
यह मामला साल 2014 का है। महिला की शादी वर्ष 2010 में हुई थी और उसकी एक छोटी बेटी भी थी। आरोप था कि शादी के बाद से ही महिला पर दहेज लाने का दबाव बनाया जाता था। उससे बार-बार अपने मायके की पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने के लिए कहा जाता था। जब उसने ऐसा नहीं किया, तो उसे प्रताड़ित किया गया। आखिरकार उसने अपनी मासूम बेटी के साथ आत्महत्या कर ली। महिला के सुसाइड नोट में भी पति और ससुराल वालों के व्यवहार का जिक्र था। उसमें लिखा था कि अगर वह दहेज की मांग पूरी नहीं करेगी तो उसका पति दूसरी शादी कर लेगा। कोर्ट ने माना कि यह लगातार बनाए गए दबाव का नतीजा था, जिसने महिला को इतना बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया।
सुनवाई के दौरान पति के वकीलों ने एफआईआर दर्ज होने में दो दिन की देरी का मुद्दा उठाया। लेकिन कोर्ट ने कहा कि परिवार इस दुखद घटना से पूरी तरह टूट चुका था और ऐसे समय में कानूनी सलाह लेकर शिकायत दर्ज करना स्वाभाविक है। इसलिए इस देरी को मामले की कमजोरी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी महिला का अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना उसका कानूनी अधिकार है। लेकिन यदि पति उस पर अपने फायदे के लिए ऐसा करने का दबाव बनाए, तो उसे दहेज की मांग माना जा सकता है।

















