
बंगाल में हो रहे अन्याय और सांप्रदायिक घटनाओं को उजागर करने के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रभावी ढंग से आवाज़ उठाई। उन्होंने महात्मा गांधी का समर्थन भी प्राप्त किया, जिसके बाद कांग्रेस ने भी इन मुद्दों को सदन में उठाने में सहयोग दिया और बंगाल की स्थिति पूरे देश के सामने आई। 1941 में डॉ. मुखर्जी ने फजलुल हक़ को मुस्लिम लीग से अलग होकर कांग्रेस और हिंदू महासभा के साथ गठबंधन सरकार बनाने के लिए राजी किया। इस नई सरकार में फजलुल हक़ मुख्यमंत्री बने और डॉ. मुखर्जी वित्त मंत्री के रूप में शामिल हुए। ब्रिटिश सरकार द्वारा कुछ प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी उन्होंने मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी प्रशासनिक क्षमता और फज़लुल हक़ के साथ अच्छे संबंधों के कारण यह सरकार लोकप्रिय हुई और इसे “श्यामा–हक़ मंत्रिमंडल” के नाम से जाना जाने लगा। इस गठबंधन सरकार ने अपेक्षाकृत निष्पक्ष प्रशासन देने का प्रयास किया। इसके परिणामस्वरूप हिंदुओं के साथ अधिक सम्मानजनक व्यवहार होने लगा। वित्त मंत्रालय और अन्य सरकारी विभागों में डॉ. मुखर्जी ने कुशल प्रशासन और संतुलित नीतियों के माध्यम से शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जुलाई 1942 में बंगाल के गवर्नर को लिखे पत्र में कहा कि यद्यपि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कुछ कमियाँ थीं, फिर भी हिंदू और मुस्लिम प्रतिनिधियों के संयुक्त कार्य ने यह सिद्ध कर दिया कि दोनों समुदाय मिलकर प्रभावी शासन चला सकते हैं। उनका विश्वास था कि यह प्रयोग भारत के राजनीतिक विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा और सांप्रदायिक विभाजन की धारणा को कमजोर करेगा।
डॉ. मुखर्जी का मानना था कि अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति तभी असफल होगी। जब हिंदू और मुसलमान आपसी विश्वास और सहयोग से कार्य करेंगे। उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि यदि दोनों समुदाय एक-दूसरे के हितों को समझेंगे और साथ मिलकर काम करेंगे, तो विभाजनकारी शक्तियाँ स्वतः कमजोर पड़ जाएँगी।
उनकी निष्पक्षता और कार्यकुशलता से उनके राजनीतिक विरोधी भी प्रभावित हुए। फज़लुल हक़ ने सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि डॉ. मुखर्जी को केवल हिंदू महासभा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन्हें एक ऐसे ईमानदार और योग्य नेता के रूप में पहचाना जाना चाहिए जो सभी समुदायों के हित में कार्य करते हैं। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता और सर्वस्वीकार्य छवि का परिचय मिलता है।
1937 से 1941 तक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रयासों से बंगाल में गठबंधन सरकार ने अपेक्षाकृत निष्पक्ष प्रशासन दिया, जिससे विशेषकर हिंदुओं को कुछ राहत मिली। लेकिन यह व्यवस्था अधिक समय तक नहीं चल सकी। बंगाल के गवर्नर जॉन हरबर्ट ने 1942 में इस मंत्रिमंडल को भंग कर दिया। इसी दौरान कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ और उसके अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए। अक्टूबर 1942 में बंगाल के मिदनापुर जिले के काँथी क्षेत्र में भीषण चक्रवात आया, जिसमें लगभग 30,000 लोगों की मृत्यु हुई और लाखों लोग बेघर हो गए। उसी समय जापानी सेना के खतरे के कारण ब्रिटिश सरकार ने ‘डिनायल पॉलिसी’ अपनाई, जिसके तहत नावें और खाद्यान्न नष्ट कर दिए गए ताकि वे दुश्मन के हाथ न लगें। इससे खाद्य संकट गहरा गया और आगे चलकर भीषण बंगाल अकाल की स्थिति बनी, जिसमें लाखों लोगों की जान चली गई। इस कठिन समय में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राहत कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच समन्वय स्थापित कर पीड़ितों तक सहायता पहुंचाने का कार्य किया। उनके प्रयासों से राहत कार्य अधिक प्रभावी बने और बड़ी संख्या में लोगों की सहायता संभव हो सकी।
महात्मा गांधी के खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें जेल से रिहा किया गया। बाद में सी. राजगोपालाचारी ने गांधीजी और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच भारत के विभाजन के मुद्दे पर बातचीत कराने का प्रयास किया। वार्ता अंततः असफल रही, लेकिन इस दौरान पाकिस्तान के प्रश्न पर कुछ स्तर पर सहमति बनने की बात कही गई। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गांधीजी को विभाजन के किसी भी प्रस्ताव से सहमत न होने की सलाह दी, परंतु उनकी सलाह स्वीकार नहीं की गई।
1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद कांग्रेस के नेता जेल से रिहा हुए और केंद्रीय विधान परिषद के चुनाव हुए। चुनाव से पहले डॉ. मुखर्जी ने कांग्रेस और हिंदू महासभा के बीच सहयोग स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन यह सफल नहीं हो सका। इस समय देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण काफी बढ़ चुका था। मुस्लिम लीग का प्रभाव मजबूत हो गया था और कई अन्य दल या तो उसके साथ जुड़ गए या उसके दबाव में आ गए। ऐसे माहौल में डॉ. मुखर्जी कांग्रेस के रवैये से निराश और असहाय महसूस कर रहे थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि राष्ट्रीय एकता और हिंदू हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं हो रही थी।