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भोंडत्व से बचाएं हास्य को

हास्य जीवन का रस है। सभी रसों में इसकी श्रेष्ठता इसी बात से है कि यह रस अपनी लास्यता की वजह से प्राणी में स्फूर्ति का संचारी भाव पैदा करता है

Written byतेजनारायण शर्मातेजनारायण शर्मा
Jul 6, 2026, 02:43 pm IST
inमत अभिमत, सोशल मीडिया

हास्य जीवन का रस है। सभी रसों में इसकी श्रेष्ठता इसी बात से है कि यह रस अपनी लास्यता की वजह से प्राणी में स्फूर्ति का संचारी भाव पैदा करता है। हास्य और व्यंग्य दो सौतेले सगे भाई हैं, जिनकी जननी (परिस्थितियां) अलग-अलग हैं, किंतु जनक (उद्देश्य) प्रकारांतर से एक ही होता है। दोनों ही हर स्थिति में परिहास ही करते हैं। उपहास करना, भोंडापन फैलाना या अश्लीलता को ढोना कभी भी हास्य की कार्यपद्धति में शामिल नहीं रहा।

मैं गत चालीस सालों से हास्य-व्यंग्य का विद्यार्थी रहा हूं। लगभग 35 साल से ऊपर मुझे कविता के मंचों पर हो चुके हैं। इस दरम्यान हमने, हमारी पीढ़ी ने, हमारे अग्रजों ने हास्यरस के जो मानदंड स्थापित किए हैं, वे भारतीय मंजूषा के समक्ष हमारे ट्रेडमार्क बन चुके हैं। साहित्यिक बिरादरी में हमारी साधना को मिली अपार लोकप्रियता ने हमारी पहचान को विश्वपटल पर गढ़ा है।

इधर कुछ एक सालों से देखने में आ रहा है कि हमारी ही लोकप्रियता से प्रभावित होकर बहुत से गैर-प्रतिभाशाली लोग सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर हास्य के नाम पर भोंडी मिमिक्री, अश्लील संवाद, द्विअर्थी कंटेंट, वल्गर कथोपकथन, यहां तक कि सीधे-सीधे गाली-गलौज को हास्य कहकर कथित अधुनातन सोसायटी के समक्ष धड़ल्ले से ला रहे हैं और उन पर आए व्यूज को अपने इस आपराधिक कृत्य की उपलब्धि समझ रहे हैं। यह धारणा भारतीय सरोकारों के लिए चिंता का विषय है।

इस विषय पर मेरा मानना यह है कि ऐसे फूहड़, संस्कारहीन भाषाई अधर्म का न केवल विरोध होना चाहिए, बल्कि इनके विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही भी की जानी चाहिए। आने वाली नस्लों को मनोरंजन के नाम पर गंदे और भद्दे कंटेंट, गंदे और अव्यावहारिक हाव-भाव के साथ परोसने का यह सिलसिला नहीं रोका गया, तो फिर हमारे साहित्य और संस्कृति को पलीता लगने से कोई नहीं रोक पाएगा।

साथ ही साथ यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा, बल्कि पिछले एक दशक से कहता आ रहा हूं कि ऐसे मिमिक्रीबाजों, अश्लील टीकाकारों, भद्दे और अश्लील संवाद के आधार पर खुद को लाफ्टर मैन समझने वालों एवं गाली-गलौज को हास्य का उत्कर्ष समझने वालों का हिन्दी कवि-सम्मेलनों के मंचों पर भी प्रवेश (हालांकि यह न के बराबर सा ही है) सख्ती के साथ बंद होना चाहिए।

हास्य-व्यंग्य गोपाल प्रसाद व्यास, काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेन्द्र शर्मा, अशोक चक्रधर, शैल चतुर्वेदी, माणिक वर्मा, अल्हड़ बीकानेरी, प्रदीप चौबे, सत्यदेव शास्त्री भोंपू जैसे सकल साधकों की साधनास्थली रही है। इसे इस भोंडत्व, नंगई और अश्लीलता से बचाना ही होगा। और भारतीय प्रज्ञा को समझाना होगा कि मनोरंजन का यह पाश्चात्य राग हमारी सांस्कृतिक सुगढ़ता को तहस-नहस करने के इरादे से रचा जा रहा है। अश्लील और पोर्न स्वरूप के इस कथित हास्य का मेरा चालीस साल का अविचल स्वाध्याय पुरजोर विरोध करता है।

मर्यादा लांघती मजाक

Topics: पाञ्चजन्य विशेषमनोरंजनकवि सम्मेलनहास्य-व्यंग्यभोंडत्वअश्शीलतातेजनारायण शर्माहिन्दी साहित्यसोशल मीडिया कंटेंटसांस्कृतिक सुगढ़ताफूहड़पन
तेजनारायण शर्मा
तेजनारायण शर्मा
हास्य-व्यंग्यकार [Read more]
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