विश्लेषण

बांग्लादेश सेना में बड़ा बदलाव: इस्लामी खलीफाओं पर रखा बटालियनों का नाम, युद्ध घोष भी बदलकर किया- ‘अल्लाहू अकबर’

बांग्लादेश की सेना में कट्टरपंथ और इस्लामी प्रभाव बढ़ने के बीच बटालियनों के नामकरण का नया चलन शुरू हुआ है। युद्ध घोष को जॉय बांग्ला से बदलकर अल्लाहू अकबर किया गया।

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लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)

बांग्लादेश के पीएम तारिक रहमान के चीन दौरे के बीच बांग्लादेश सेना के बढ़ते कट्टरपंथ को लेकर एक परेशान करने वाली खबर आई है। बांग्लादेश सेना ने दूसरी बांग्लादेश ब्रिगेड की चार बटालियनों का नाम इस्लाम के चार खलीफाओं के नाम पर रखा है।

उमर, अबू बकर, अली और उस्मान के नाम पर लगभग 700 सैनिकों की संख्या वाली चार बटालियनों का नाम रखा गया है। यह बांग्लादेश सेना में बटालियनों के नामकरण का एक नया चलन है।

इससे पहले, बटालियनों का नाम बीर श्रेष्ठो (बांग्लादेश में सर्वोच्च वीरता पुरस्कार) के प्राप्तकर्ताओं के नाम पर रखा जाता था। इसके अलावा, इन नई बटालियनों के युद्ध घोष को ‘जॉय बांग्ला’ (बांग्लादेश की जीत) से बदलकर ‘अल्लाहु अकबर’ कर दिया गया है।

बांग्लादेश सेना में बटालियनों के नामकरण का नया चलन

अतीत में भी बांग्लादेश की सेना में कट्टरपंथ और इस्लामी प्रभाव में वृद्धि की खबरें आई थीं। प्रधानमंत्री शेख हसीना के शासन में कट्टरपंथ के प्रयास कम असरदार रहे थे। लेकिन अगस्त 2024 में सत्ता से उनके बेदखल होने के बाद, बांग्लादेश सेना ने इस्लामवादी परंपराओं को अपनाने के लिए अधिक उत्सुकता दिखाई। कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी राजनीतिक पार्टी के माध्यम से पाकिस्तान की आईएसआई का बांग्लादेश के अंदर हमेशा गहरा प्रभाव रहा है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के तहत, बांग्लादेश सेना के साथ कट्टरपंथी तत्वों के संबंध अधिक खुले तौर पर उभरे। हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ की जा रही हिंसा के प्रति मूकदर्शक बने रहने वाला बांग्लादेश सेना का आचरण इस तरह के बढ़ते कट्टरपंथ का सिर्फ एक संकेतक है। यह इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि बांग्लादेश सेना के जूनियर नेतृत्व में भी कट्टरपंथ दिखाई दे रहा है।

पाकिस्तान-बांग्लादेश सैन्य संबंधों में बढ़ती निकटता

पाकिस्तानी सेना और बांग्लादेश सेना के बीच संबंधों की बहाली बांग्लादेश में शासन परिवर्तन के सबसे अप्रत्याशित नतीजों में से एक रही है। बीएनपी के तारिक रहमान के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद भी पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच संबंधों में अन्य मोर्चों पर भी सुधार जारी है। दोनों सेनाओं के बीच नियमित उच्च स्तरीय दौरे, संयुक्त प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया है। बांग्लादेश पहले से ही पाकिस्तान से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद खरीद रहा है। पाकिस्तान ने बांग्लादेश को जे-थंडर सीरीज (चीनी मूल) के 15 लड़ाकू विमान देने की पेशकश की है। भारत को पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बदलते संबंधों पर करीब से नजर रखनी होगी। बांग्लादेश सेना का बढ़ता कट्टरपंथ भारत के भीतर आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए अतिरिक्त चुनौती पेश करता है।

बांग्लादेश की शक्ति संरचना और सेना की भूमिका

बांग्लादेश की शक्ति संरचना में, बांग्लादेश के सेना प्रमुख राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बाद तीसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माने जाते हैं। हालांकि बांग्लादेश की सेना ने पाकिस्तानी सेना की तरह सत्ता का दुरुपयोग नहीं किया है, लेकिन दोनों सेनाओं के बीच संबंधों की बहाली चिंता का विषय है। पाकिस्तानी सेना अब तक अत्यधिक कट्टरपंथी हो चुकी है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख देश में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बने हुए हैं और इस बात की संभावना है कि बांग्लादेश सेना प्रमुख सरकार के प्रमुख निर्णयों में दखल दे सकते हैं। इस तरह के हस्तक्षेप से बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता भी आ सकती है। बांग्लादेश में रणनीतिक रूप से स्थित मोंगला बंदरगाह को अब चीन द्वारा विकसित किए जाने की खबर के साथ, हमारे पड़ोस में एक और समुद्री खतरा पैदा हो सकता है।

भारत सीमा पर नई बटालियनों की तैनाती बनी चिंता

यह भी चिंता का विषय है कि सभी चार नई बटालियनों को चटगांव गैरीसन के हिस्से के रूप में भारत की सीमा पर तैनात किया गया है। अपने सैन्य जीवन के दौरान, मुझे वर्ष 2015 में चटगांव गैरीसन का दौरा करने का अवसर मिला था। हमें विस्तृत जानकारी दी गई थी कि कैसे इस गैरीसन का उपयोग भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के कई शिविरों को पोषित करने के लिए किया गया था। वर्ष 2006 तक प्रधानमंत्री खालिदा जिया के नेतृत्व में बीएनपी के पिछले शासन के दौरान यही स्थिति थी। अवामी लीग के शेख हसीना शासन के तहत ही भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों में सुधार हुआ। वर्ष 2014 में पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद, बांग्लादेश के अंदर स्थित आतंकी शिविरों और ठिकानों को नष्ट किया गया। इसी का नतीजा है कि भारत के नॉर्थ ईस्ट में आतंकवाद का ग्राफ लगातार नीचे आया है। उल्फा जैसे बड़े आतंकी संगठन का अब असम जैसे राज्यों से सफाया हो चुका है।

जमात-ए-इस्लामी का उभार और सीमा सुरक्षा की चुनौती

इस साल फरवरी में बांग्लादेश में हुए संसदीय चुनावों में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी। उसके अधिकांश सदस्य भारत की सीमा से लगे निर्वाचन क्षेत्रों से चुने गए हैं। यह इंगित करता है कि अब पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्र अवैध घुसपैठ और अन्य आतंकवादी खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के लिए नई भाजपा सरकार द्वारा त्वरित प्रयास किए गए हैं। साथ ही संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर को केंद्रीय एजेंसियों को सौंपने जैसे अन्य कदम समय पर उठाए गए हैं। बांग्लादेश सेना में बढ़ते कट्टरपंथ का खतरा एक वास्तविकता है। यदि किसी अन्य सबूत की आवश्यकता थी, तो वह बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-जमान का अब दाढ़ी वाला लुक है। इससे पहले उनका क्लीन-शेव लुक था। भारतीय सुरक्षा बलों को बांग्लादेशी सेना के बढ़ते कट्टरपंथ और पाकिस्तानी सेना के साथ उनकी बढ़ती सांठगांठ के खिलाफ सतर्क रहना होगा।

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