अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ (गीता)
भावार्थ-
तमोगुण से आवृत की बुद्धि, दर्पण में विपरीत दिखने वाली मुखछाया, की भांति अधर्म के कार्यो को धर्म तथा धार्मिक कृत्यों को अधर्म समझती है जो समस्त अर्थों को विपरीत मानती है, वह बुद्धि ‘तामसी’ है। यह बुद्धि पूर्णतया धोखा देने वाली होती है।

















