एक समय था जब पूरी दुनिया की राजनीति तेल, गैस एवं प्राकृतिक संसाधनों के इर्द-गिर्द घूमती थी, आज पूरी दुनिया माइक्रोचिप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डाटा सेंटर, क्वाण्टम कंप्यूटिंग, 5G/6G नेटवर्क और उन्नत सेमीकंडक्टर के चारों ओर घूम रही है। सोचिये अगर पूरी दुनिया में सेमीकंडक्टर चिप का उत्पादन बंद हो जाए तो क्या होगा ? आपका मोबाइल फोन, लैपटॉप, इंटरनेट काम नहीं करेगा ? सच यह है की स्थिति और भयावह होगी, कुछ दिनों में कारखाने का उत्पादन ठप हो जाएगा, बैंकिंग प्रणालियां बंद हो जाएंगी, अस्पतालों की एमआरआई सीटी स्कैन मशीन आदि तंत्र काम नहीं करेंगे, उपग्रह का संचालन नहीं होगा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सुपर कंप्यूटर निष्क्रिय होने लगेंगे , रक्षा प्रणालियों कमजोर हो जाएगी और लगभग पूरी दुनिया थम जाएगी।
21वीं सदी में जिस राष्ट्र के पास सेमीकंडक्टर की शक्ति होगी, वह तकनीकी, आर्थिक और सामरिक नेतृत्व करेगा। इसलिए सेमीकंडक्टर आज की राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बना हुआ है। लेकिन सेमीकंडक्टर आखिर है क्या ? एक साधारण सिलिकॉन जो पृथ्वी पर रेत के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, वह कैसे अरबो ट्रांज़िस्टर वाली सूचना चिप में परिवर्तित हो जाता है, जो मानव जैसी जटिल गणना करने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शक्ति प्रदान करता है। ट्रांजिस्टर, इंटीग्रेटेड सर्किट, नैनोमीटर तकनीक, पैकेजिंग, कंपाउंड सेमीकंडक्टर जैसी अवधारणाएं क्या हैं ? और सबसे महत्वपूर्ण क्या भारत इस वैश्विक तकनीकी क्रांति में केवल उपभोक्ता बना रहेगा या भविष्य का निर्माता रहेगा ?
सेमीकंडक्टर क्या है
सेमीकंडक्टर न तो पूरी तरह चालक होता है और न तो पूरी तरह कुचालक। यह स्थिति के अनुसार अपना व्यवहार बदल सकता है, आवश्यकता पड़ने पर बिजली के प्रवाह को जारी रख सकता है, और आवश्यकता पड़ने पर रोक सकता है। यही गुण आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का आधार है। मान लीजिए आपके घर का मुख्य दरवाजा है, यदि वह हमेशा खुला रहता है, तो कोई भी अंदर-बाहर आ सकता है, यह चालक है। यदि हमेशा बंद रहे, कोई प्रवेश नहीं कर सके, तो कुचालक है। लेकिन दरवाजा केवल आपकी अनुमति मिलने पर ही खुले तो वह समझ लीजिए सेमीकंडक्टर है। यही नियंत्रित रूप से बिजली का प्रवाह करना ही सेमीकंडक्टर की सबसे बड़ी विशेषता है।
सेमीकंडक्टर किन पदार्थों से बनता है
सबसे उपयोगी सिलिकॉन होता है। सिलिकॉन पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, अधिकांश रूप से यह रेत के रूप में पाया जाता है, अत्यधिक शुद्धिकरण के बाद सिलिकॉन आधुनिक माइक्रोचिप का आधार बनता है। इसके अतिरिक्त जर्मेनियम। गैलियम आर्सेनाइड, गैलियम नाइट्राइड, सिलिकॉन कार्बाइड जैसे पदार्थ भी इस चिप निर्माण में प्रयुक्त होते हैं।
सेमीकंडक्टर कैसे कार्य करता है
प्रत्येक पदार्थ में इलेक्ट्रॉन होते हैं, यही इलेक्ट्रॉन बिजली के प्रवाह का कार्य करते है , चालकों में इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रूप से घूमते हैं, इसलिए बिजली आसानी से बहती है। कुचालकों में इलेक्ट्रॉन मजबूती से बंधे रहते हैं, इसलिए बिजली नहीं बहती है। सेमीकंडक्टर में इलेक्ट्रॉन सीमित रूप से बंधे होते हैं, यदि उन्हें थोड़ी सी अतिरिक्त ऊर्जा मिल जाए तो चलने लगते हैं।
बैंड गैप क्या होता है
यह समझने के लिए छोटी सी कल्पना कीजिए। मान लीजिए दो मंजिला वाली इमारत है, नीचे वाले मंजिल पर सभी कर्मचारी बैठे हैं और ऊपर वाली मंजिल में पहुंचने के बाद ही सब काम कर सकते हैं। दोनों मंजिलों के बीच सीढ़ियां नहीं है, बल्कि छोटी सी दूरी पार करने के लिए ऊर्जा चाहिए। यही दूरी बैंड गैप कहलाती है, यदि दूरी बहुत कम है तो इलेक्ट्रॉन आसानी से ऊपर पहुंच जाते हैं और पदार्थ चालक बन जाता है, दूरी बहुत अधिक है तो इलेक्ट्रॉन ऊपर नहीं जा सकते पदार्थ कुचालक बन जाता है। यदि दूरी मध्यम है, आवश्यकता पड़ने पर ही इलेक्ट्रॉन ऊपर जाते हैं और यही सेमीकंडक्टर है।
डोपिंग सेमीकंडक्टर को बुद्धिमान बनाने की प्रक्रिया
शुद्ध सिलिकॉन उपयोगी नहीं होता, इसलिए उसमें बहुत अधिक बात थोड़ी मात्रा में अन्य तत्व मिलाए जाते हैं, इस प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं। सिलिकॉन के बाहरी कक्ष में चार संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए इसमें इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रूप से गति नहीं कर पाते है, हालांकि तापमान बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन ऊर्जा प्राप्त कर मुक्त हो जाते हैं, जिसे चालकता बढ़ जाती है। लेकिन यदि इसमें कुछ अन्य पदार्थ मिला दें जिसे डोपिंग कहते हैं, तो यह बहुत उपयोगी बन जाता है। पंच संयोजी तत्व जैसे फास्फोरस आर्सेनिक एंटीमनी मिलाने पर अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन मिलते हैं, जिससे N-टाइप सेमीकंडक्टर बनता है। त्रिसंयोजी तत्व जैसे बोरान, गैलियम , इडियम मिलाने पर इलेक्ट्रॉनिक कमी या होल बनते हैं, जिससे पी टाइप सेमीकंडक्टर बनता है।
जब एन और पी टाइप सेमीकंडक्टर को जोड़ देते तो, पीएन जंक्शन बनता है, यही पीएन जंक्शन आगे चलकर डायोड, ट्रांजिस्टर, एलइडी सोलर सेल, माइक्रोप्रोसेसर जैसे करोड़ों इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आधार बनता है।
सेमीकंडक्टर निर्माण के चरण
माइक्रोचिप का निर्माण किसी एक मशीन से नहीं होता, बल्कि सैकड़ो अत्यंत सूक्ष्म प्रक्रियाओं से गुजरता है। सरल भाषा में इसके सात चरण हैं। पहला चरण डिजाइन, विशेष इलेक्ट्रॉन डिजाइन ऑटोमेशन सॉफ्टवेयर की सहायता से चिप का पूरा नक्शा तैयार किया जाता है।
दूसरा चरण वेफर सिलिकॉन को शुद्ध कर बेलनाकार क्रिस्टल बनाए जाते इंगोट (ingot) कहते हैं, इस इंगोट को अत्यंत पतली गोल परतो में काटा जाता है , जिसे वेफर कहते हैं, आज उद्योग में 300 मिलीमीटर व्यास वाले वेफर का व्यापक उपयोग होता है।
तीसरा चरण होता है फोटोलिथोग्राफी, अब वेफर पर चिप का नक्शा उकेरा जाता है, सबसे पहले उस पर प्रकाश संवेदनशील रसायन लगाया जाता है, इसके बाद विशेष मास्क के माध्यम से पराबैंगनी या आधुनिक अत्यधिक एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट (EUV) प्रकाश डालकर चिप का नक्शा बनाया जाता है। इसे चिप निर्माण का हृदय कहते हैं।
चौथा चरण एचिंग (Etching) वेफर के अनावश्यक भागों को हटाना ही एचिंग कहलाता है। पांचवा चरण डोपिंग अन्य तत्व प्रविष्ट किए जाते हैं, जो सिलिकॉन को बुद्धिमान बनाता है। छठा चरण पढ़ने चढ़ाना (Deposition) चिप को कार्य करनेयोग्य बनाने के लिए सिलिकॉन डाइऑक्साइड, धातु व अन्य पदार्थों की पतली परत चढ़ाई जाती है, इनसे ट्रांजिस्टर आपसे में जुड़ते है, इसके लिए आजकल केमिकल वेपर डिपोजिशन (CVD)और प्लाज्मा एनहांस CVD जैसी तकनीक का प्रयोग किया जाता है। सातवा चरण परीक्षण पैकेजिंग है निर्माण पूरा होने पर प्रत्येक चिप का परीक्षण किया जाता है और यह बाहरी सर्किट से जोड़ने योग्य बन जाता है।
वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग
आधुनिक चिप निर्माण संयंत्र स्थापित करने 15 से 20 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश होता है, इसके साथ ही अति शुद्ध जल, निर्बाध विद्युत आपूर्ति, अत्यधिक उन्नत मशीन और उच्च प्रशिक्षित वैज्ञानिक और इंजीनियर की जरूरत पड़ती है। इसलिए केवल कुछ देशों का इस क्षेत्र में दबदबा है। जैसे ताइवान को विश्व की चिप राजधानी कहते हैं। यहां की ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी विश्व की सबसे बड़ी कॉन्ट्रैक्ट की निर्माता है। दक्षिण कोरिया मेमोरी चिप की महाशक्ति कहा जाता है, अमेरिका डिजाइन और नवाचार का केंद्र है। नीदरलैंड को मशीनों का बादशाह कहते हैं, सबसे उन्नत लिथोग्राफी (EUV Lithography) मशीनें केवल ASML बनाती है। बिना इन मशीनों के 5 नैनोमीटर और 3 नैनोमीटर जैसी अत्याधुनिक चिपों का निर्माण लगभग असंभव है। चीन ने घरेलू सेमीकंडक्टर उद्योग में भारी निवेश किया है और यहां की कंपनियां स्वदेशी चिप निर्माण क्षमता में आगे बढ़ रही हैं।
भारत की वर्तमान स्थिति
भारत को लंबे समय से सभी कंडक्टर उद्योग मुख्यत : डिजाइन केंद्र माना गया है। विश्व की अनेक अग्रणी कंपनी के डिजाइन केंद्र भारत में हैं, विश्व की बड़ी कंपनियों में बड़ी संख्या में डिज़ाइनर इंजीनियर भारत के हैं। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है, हालांकि निर्माण के क्षेत्र में शुरुआती चरण में देश की अधिकांश आवश्यकता आयात से पूरी होती है।
भारत का सेमीकंडक्टर मिशन
भारत सरकार ने 76000 करोड रुपए के प्रावधान से इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन प्रारंभ किया है। इसका उद्देश्य संपूर्ण सेमीकंडक्टर तंत्र विकसित करना। इसके अंतर्गत सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन की स्थापना हेतु वित्तीय सहायता देना, असेंबली, टेस्टिंगऔर पैकेजिंग इकाइयों को प्रोत्साहन देना। चिप डिजाइन कंपनियों के लिए सहायता पहुंचाना , छात्रों और विश्वविद्यालय के लिए चिप टू स्टार्टअप कार्यक्रम लाना। सातवां चरण परीक्षण पैकेजिंग है। निर्माण पूरा होने पर प्रत्येक चिप का परीक्षण किया जाता है और यह बाहरी सर्किट से जोड़ने योग्य बन जाता है।
अनुमान है कि भारतीय सेमीकंडक्टर बाज़ार, जो कुछ वर्ष पहले लगभग 24 अरब अमेरिकी डॉलर का था, अगले कुछ वर्षों में 100 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है। वहीं भारत में सेमीकंडक्टर की खपत 2026 तक लगभग 80 अरब डॉलर और 2030 तक 110 अरब डॉलर से अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
भारत का विजन 2035
नीति आयोग के अनुसार भारत अब सेमीकंडक्टर वैल्यू श्रृंखला का एक अनिवार्य भागीदार बनना चाहता है। इसलिए 2035 तक 120 से 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर की मजबूत सेमीकंडक्टर अर्थव्यवस्था विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य के लिए -पहला अनुसंधान एवं डिजाइन के तहत स्वदेशी बौद्धिक संपदा विकसित करनी होगी, दूसरा नीति एवं निवेश सरकार ने अगले दशक में 135 से 180 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य रखा है। तीसरा उत्पादन एवं उन्नत पैकेजिंग भारत ने इस क्षेत्र में एडवांस पैकेजिंग ओसेट (Outsourced Semiconductor Assembly and Test) , 28 से 65 नैनोमीटर की परिपक्व चिप तकनीक बनाने का लक्ष्य रखा है। चौथा स्तंभ में मानव संसाधन इस हेतु भारत सरकार ने आइआईटी , आईआईएससी आदि संस्थाओं के माध्यम से सेमीकंडक्टर शिक्षा और कौशल विकास को बढ़ावा दिया। पांचवें स्तंभ में वैश्विक साझेदारी में भारत अमेरिका जापान ताइवान दक्षिण कोरिया यूरोपीय संघ जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ आगे बढ़ रहा है।
सेमीकंडक्टर आधुनिक सभ्यता का डिजिटल मस्तिष्क है, आज मोबाइल फोन से लेकर मंगलयान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर डिजिटल भुगतान, इलेक्ट्रॉनिक वाहन से लेकर मिसाइल प्रणाली तक, हर तकनीक की नींव सेमीकंडक्टर पर टिकी है। भारत के लिए निर्णायक समय है , हमारे पास विशाल बाजार, विश्व स्तरीय डिजाइन प्रतिभा, तेजी से बढ़ता इलेक्ट्रॉनिक उद्योग एवं स्पष्ट नीतिगत समर्थन उपलब्ध है। यदि इन शक्तियों को अनुसंधान, नवाचार, विनिर्माण और कौशल विकास को जोड़ा जाए तो भारत आने वाले समय में चिप बाजार का निर्माता और दिशा निर्धारक बन सकेगा। विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा,जब भारत डिजाइन इन इंडिया, मेड इन इंडिया और इन्नोवेटेड इन इंडिया की भावना से सेमीकंडक्टर क्रांति का नेतृत्व करेगा।















