इन दिनों पाकिस्तान के हिस्से वाले पश्चिमी पंजाब के मंडी चूड़खाना में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा सिंह सभा के गुंबद समेत एक हिस्से को गिराए जाने की घटना सुर्खियों में है। इससे सिख समाज में असंतोष की लहर फैली हुई है।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों व उनकी संपत्ति को लेकर उसका रिकॉर्ड शर्मनाक रहा है। अतीत में भी कई गुरुधामों को ध्वस्त किया जा चुका है और उनकी जमीनों पर अवैध कब्जा किया गया है।
पाकिस्तानी पंजाब के मंडी चूड़खाना में गुरुद्वारा सच्चा सौदा के पास स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा सिंह सभा के एक हिस्से, जिसमें गुंबद भी शामिल है, को स्थानीय प्रशासन और कथित भू-माफिया की मिलीभगत से ध्वस्त किए जाने की सिख समाज ने निंदा की है।
पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति और संगत मौके पर पहुंची और इस कार्रवाई को रोकने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। गुरुद्वारा इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के संरक्षण में होने के बावजूद, बोर्ड इसे बचाने में पूरी तरह विफल रहा।
यह कोई इस तरह का पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी अनेक गुरुद्वारों को या तो तोड़ दिया गया या उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया गया है।
गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा (एबटाबाद)
पाकिस्तान में गुरुद्वारा तोड़ने का यह पहला मामला नहीं है। पूर्व की प्रमुख घटनाओं में गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा (एबटाबाद), जो अटक जिले में स्थित है, के इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को एक अधिकारी द्वारा 1 करोड़ रुपये की रिश्वत लेकर बेचने का मामला सामने आया था। इसके बाद गुरुद्वारे के अंदर एक बुटीक खोलकर व्यावसायिक गतिविधियां शुरू कर दी गईं।
गुरुद्वारा श्री ननकाना साहिब
यहां हजारों एकड़ जमीन पर अवैध अतिक्रमण के आरोप लगे थे। अप्रैल 2024 में पाकिस्तानी सांसद सेजरा अली खान ने संसद में ननकाना साहिब की लगभग 20 एकड़ जमीन का मुद्दा उठाया और बोर्ड के खिलाफ जांच की मांग की, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने बोर्ड के रिकॉर्ड अपने कब्जे में ले लिए।
गुरुद्वारा बेबे नानकी
लाहौर में गुरुद्वारा देहरा साहिब परिसर में स्थित इस गुरुद्वारे की लगभग 800 करोड़ रुपये की जमीन एक आवासीय कॉलोनी के लिए बेच दी गई।
नानक महल (नारोवाल)
मई 2019 में इस सदियों पुराने महल के कुछ हिस्सों को ध्वस्त कर दिया गया और इसके कीमती दरवाजे और खिड़कियां बेच दी गईं।
गुरुद्वारा दीवान खाना सुंदर (लाहौर)
यहां की चूना मंडी में स्थित यह गुरुद्वारा, जो गुरु रामदास जी के प्रकाश स्थान से जुड़ा था, ध्वस्त कर दिया गया और इसकी भूमि पर एक चौक बना दिया गया।
अन्य प्रमुख मामले
रावलपिंडी में गुरुद्वारा श्री दरबार दमदमा साहिब के आसपास चल रहे बूचड़खाने और मांस की दुकानें, जिला साहीवाल में गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा को पुलिस स्टेशन में परिवर्तित करना, गुरुद्वारा किला साहिब पर अवैध अतिक्रमण, सियालकोट में गुरुद्वारा बाबा बेर के अंदर एक मकबरे का निर्माण और कसूर में गुरुद्वारा भाई फेरू में मवेशियों को बांधना सिख विरासत के प्रति अनादर के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।
पाकिस्तान में धार्मिक स्थलों की स्थिति
पाकिस्तान में सैकड़ों गुरुद्वारे और मंदिर या तो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं या उनकी जमीनें प्रभावशाली लोगों और भू-माफियाओं के कब्जे में हैं। ऐतिहासिक धार्मिक स्थल मात्र इमारतें नहीं हैं, बल्कि सिख समुदाय की आस्था, विरासत और इतिहास के प्रतीक हैं। इनका अपमान पूरे वैश्विक सिख समुदाय की भावनाओं को आहत करता है।
ईटीपीबी और संपत्तियों के प्रबंधन पर उठे सवाल
ईटीपीबी के अंतर्गत 1.09 लाख एकड़ से अधिक कृषि योग्य भूमि और 46 हजार एकड़ से अधिक शहरी इकाइयां हैं, जो 517 गुरुद्वारों और 1130 मंदिरों से संबंधित हैं। बोर्ड की वार्षिक आय आधिकारिक तौर पर 565 करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है, लेकिन इसके बावजूद सीमित व्यय केवल चयनित 21 गुरुद्वारों और 14 मंदिरों पर ही किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति ने भी 26 वर्षों से अपना वार्षिक बजट और व्यय विवरण सार्वजनिक नहीं किया है, जिससे पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
अल्पसंख्यकों के धर्मस्थलों की रक्षा करे पाकिस्तान
करतारपुर कॉरिडोर का खुलना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन अगर पाकिस्तान धार्मिक सहिष्णुता का दावा करता है, तो उसकी परीक्षा ऐतिहासिक गुरुद्वारों और मंदिरों की सुरक्षा, संरक्षण और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा से होगी, न कि केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने से।
न्याय की मांग है कि पाकिस्तान में स्थित सभी गुरुद्वारों और मंदिरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, धार्मिक संपत्तियों पर अवैध अतिक्रमण तुरंत हटाए जाएं, ऐसे कृत्यों में शामिल अधिकारियों और भूमि माफिया के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और ईटीपीबी के कामकाज का एक स्वतंत्र और पारदर्शी ऑडिट कराया जाए।
जब तक पाकिस्तान में सिखों और हिंदुओं के धार्मिक स्थलों की वास्तविक सुरक्षा, विरासत संरक्षण और धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक धार्मिक पर्यटन और सद्भावना के दावे अधूरे और अविश्वसनीय माने जाएंगे।
पाकिस्तान का हिन्दू-सिख समुदाय अपने परिश्रम, व्यापार और सामाजिक विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है। लेकिन पाकिस्तान में सिखों को अपने धार्मिक स्थलों का प्रबंधन करने और धार्मिक मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार भी नहीं है, जिससे उनकी धार्मिक भावनाओं और आत्मसम्मान को गंभीर ठेस पहुंच रही है।
अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों से संबंधित विभिन्न रिपोर्टें भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की असुरक्षित स्थिति की ओर इशारा करती हैं।
जबरन कन्वर्जन, अल्पसंख्यकों पर हमले और धार्मिक संपत्तियों पर अतिक्रमण लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं।
पाकिस्तान का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देने के दावे तो करता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिख रही है।












