
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर के जरीपटका स्थित सिन्धु एजुकेशन सोसायटी के अमृत महोत्सव वर्ष (75 वर्ष) के भव्य उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा उपस्थित नागरिकों को जीवन में संघर्ष, धैर्य और वास्तविक शिक्षा के महत्व पर बेहद प्रेरणादायी मार्गदर्शन दिया।
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में विभाजन की विभीषिका के दौरान सिंधी समाज के संघर्षों को याद किया और स्पष्ट किया कि विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को कभी अपनी दिशा नहीं बदलनी चाहिए।
गूगल डिस्कवर और पाठकों की त्वरित समझ के लिए इस कार्यक्रम और सरसंघचालक जी के संबोधन के मुख्य पहलुओं का विवरण नीचे दी गई तालिका में संकलित है-
| कार्यक्रम एवं विमर्श का आयाम | आधिकारिक एवं वैचारिक विवरण |
|---|---|
| आयोजक संस्था | सिन्धु एजुकेशन सोसायटी (जरीपटका, नागपुर) |
| ऐतिहासिक अवसर | अमृत महोत्सव वर्ष (स्थापना के 75 गौरवशाली वर्ष) |
| मुख्य मार्गदर्शक | डॉ. मोहन भागवत (सरसंघचालक, RSS) |
| संबोधन का मुख्य सूत्र | “परिस्थिति बदले, पर जीवन की दिशा नहीं बदलनी चाहिए।” |
| प्रस्तुत ऐतिहासिक संदर्भ | डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, भगवान श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद और सिंधी समाज का विस्थापन। |
डॉ. मोहन भागवत ने संस्था की 75 वर्षों की यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि 75 वर्ष पूर्ण होने का यह उत्सव केवल उत्सव मनाने या आनंद के लिए नहीं है, बल्कि इस मुकाम के पीछे जो संघर्षों की लंबी गाथा रही है, उसे याद करने का समय है।
“परिस्थिति के सामने कभी रोना नहीं चाहिए, बल्कि निरंतर प्रयास, प्रतीक्षा और संघर्ष करना चाहिए। जीवन में कभी भी कठिन परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए। पलायन करने, हट जाने या निराश होकर बैठ जाने से केवल अपकीर्ति (बदनामी) मिलती है। इसलिए हर हाल में मैदान में डटे रहना और अड़े रहना ही मनुष्यता है। ठीक वैसे ही, जैसे कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पलायन करने से रोका था और कर्म का संदेश दिया था।” – डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक
विद्यार्थियों में उत्साह का संचार करने के लिए संघ प्रमुख ने देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग साझा किया।
विभाजन के दर्द और सिंधी समाज के अभूतपूर्व योगदान को रेखांकित करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के समय अपना सब कुछ त्यागकर भारत आए सिंधी समाज के पूर्वज शरणार्थी नहीं थे, बल्कि वे ‘विस्थापित’ थे। उन्होंने विषम हालातों में भी अपनी अकूत संपत्ति और करियर के स्थान पर अपने सनातन धर्म और राष्ट्र को सर्वोपरि चुना। धैर्य और सतत पुरुषार्थ के बल पर ही इस समाज ने शून्य से दोबारा साम्राज्य खड़ा किया।
शिक्षा की मूल अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जीविकोपार्जन (रोजी-रोटी कमाने) के लिए डिग्री और शिक्षा आवश्यक तो है, परंतु वह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर उचित और अनुचित का भेद करने वाले ‘विवेक’ को जागृत करे। ऐसी नैतिक शिक्षा सबसे पहले घर से और माता के संस्कारों से आरंभ होती है, जो बाद में जीवन भर के थपेड़ों और अनुभवों से पुष्ट होती है।
सरसंघचालक जी ने भगवान बुद्ध की अमर शिक्षाओं का स्मरण कराते हुए विद्यार्थियों से कहा कि जिस भी कर्म से दूसरों को तनिक भी कष्ट पहुंचे, वह पाप की श्रेणी में आता है, इसलिए ऐसे कृत्यों से सदैव बचना चाहिए। जीवन का वास्तविक लक्ष्य केवल स्वयं के स्वार्थ के लिए जीना नहीं, बल्कि समाज और दूसरों के कल्याण के लिए जीना है। शब्दों से नहीं, बल्कि अपने आचरण के माध्यम से एक अच्छा मनुष्य बनकर दूसरों को प्रेरित करना ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है।