नई दिल्ली (पाञ्चजन्य डिजिटल): शास्त्र और ग्रंथ ज्ञान के भंडार हैं, लेकिन क्या केवल पढ़ने मात्र से हम ज्ञानी हो जाते हैं? आज के ‘सुभाषितम्’ में हम ऐसे श्लोक पर चर्चा कर रहे हैं जो हमें ‘स्वयं की प्रज्ञा’ और ‘तर्कशक्ति’ का महत्व समझाता है।
मूल श्लोक:
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्?
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति? ॥
भावार्थ
जिस प्रकार एक नेत्रहीन व्यक्ति के लिए दर्पण (आईना) का कोई मूल्य नहीं है (क्योंकि वह अपना प्रतिबिंब देख ही नहीं सकता) ठीक उसी प्रकार जिस व्यक्ति के पास स्वयं की विचारशक्ति या ‘विवेक’ (स्वयं प्रज्ञा) नहीं है, उसके लिए शास्त्रों का ज्ञान भी व्यर्थ है।
आज के दौर में प्रासंगिकता
आज के समय में हम इंटरनेट पर सूचनाओं के सागर में डूबे हुए हैं। एक क्लिक में हर विषय की जानकारी उपलब्ध है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या हम उसे अपने जीवन में ‘विवेक’ के साथ उतार रहे हैं?
यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि शास्त्र केवल एक मार्गदर्शक हो सकते हैं, लेकिन निर्णय लेने की शक्ति केवल हमारे अपने भीतर है। यदि हम विवेक का उपयोग नहीं करेंगे, तो दुनिया का कितना भी बड़ा ज्ञान हमें सही मार्ग पर नहीं ले जा पाएगा।

















