बाबर, गजनी पर नाज़ करने वाला पाकिस्तान खेल रहा हिंदू कार्ड? संस्कृत, पाणिनी, चाणक्य पर क्यों ठोका दावा?
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बाबर, गजनी पर नाज़ करने वाला पाकिस्तान खेल रहा हिंदू कार्ड? संस्कृत, पाणिनी, चाणक्य पर क्यों ठोका दावा?

मगर अब हिजाजी लय से इकबाल का पाकिस्तान उबरना चाहता है। अब वहां के हुक्मरान अचानक से ही अरबी पहचान से इतर उस पहचान की बातें करने लगे हैं, जिसे ठुकराकर या जिससे नफरत करके ही वे लोग पले-बढ़े हैं।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 30, 2026, 10:58 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
पाकिस्तान की नई साजिश

पाकिस्तान की नई साजिश

पाकिस्तान का निर्माण ही इस शर्त पर हुआ था कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग कौम हैं और वे एक साथ नहीं रह सकती हैं। मुसलमान एक अलग पहचान है, एक अलग देश है, जिनका हिंदुओं के साथ कोई मेल नहीं है। इसलिए मुसलमानों के लिए एक नया देश होना चाहिए और इसी के आधार पर भारत के दो टुकड़े कर दिए गए।

पाकिस्तान के निर्माण के बाद भी जिन्ना के देश के हुक्मरानों में यही बात हावी रही कि पाकिस्तान दरअसल बाबर की परंपरा को ही आगे बढ़ाने की कड़ी है। गजनी, गजनवी, एबक, बाबर को वहां महान बताया जाता है। उनकी मिसाइल भी इन्हीं नामों पर हैं। इतिहास भी यही बात कहता रहता है कि कैसे बाबर ने आकर उन्हें हिन्दू से मुसलमान बनाया। दशकों से पाकिस्तान के मुस्लिम कहते आए हैं कि ‘हम तुर्की हैं’, ‘हम अरब हैं।’ जैसा कि पाकिस्तान के अब्बा अल्लामा इकबाल ने शिकवा में लिखा था कि

“अजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरी
नग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी”

अजमी अर्थात अरब का न रहने वाला, खुम: शराब रखने का घड़ा, मय: शराब, अर्थात मय का अर्थ शराब तो है ही, परन्तु इसकी जो प्रकृति है वह अरबी है। फिर है हिजाजी: इसका अर्थ है, हिजाज का निवासी, हिजाज सऊदी अरब का प्रांत है, हिजाजी का अर्थ है ईरानी संगीत में एक राग! वह कह रहे हैं कि मैं अरब का रहने वाला नहीं हूं, मगर मेरी मय अर्थात अपने स्वभाव से तो हिजाजी ही हूं, मैं नगमा जरूर हिन्दी (हिन्दुस्तान) का हूं, मगर मेरी लय तो हिजाजी ही है!

मगर अब हिजाजी लय से इकबाल का पाकिस्तान उबरना चाहता है। अब वहां के हुक्मरान अचानक से ही अरबी पहचान से इतर उस पहचान की बातें करने लगे हैं, जिसे ठुकराकर या जिससे नफरत करके ही वे लोग पले-बढ़े हैं। जिससे नफरत में उन्होंने अपना सारा इतिहास का पाठ्यक्रम ही बदल दिया था। जिया उल हक ने इस्लामियत और पाकिस्तानी स्टडीज के लिए पाठ्यक्रम संशोधित करके वहां के लोगों को मानसिक रूप से अरब के नजदीक किया और हिन्दू जड़ों से दूरी तथा नफरत।

पाकिस्तानियों ने अरब में खोजी मूल जड़ें

जरा कल्पना करें कि महज कुछ ही दशकों पूर्व मुसलमान बने लोगों के दिमागों से उनकी जड़ों को मिटा दिया गया। इससे पाकिस्तान में एक भ्रमित पीढ़ी पैदा हुई। जिसकी जड़ें दरअसल हिन्दू थीं, मगर उसे अरब में खोजा। जैसा कि इकबाल भी थे, जिनके पूर्वजों ने 17वीं या 18 वीं शताब्दी में कथित रूप से सूफियों की संगति में आकर इस्लाम अपनाया था। वे लोग मूलतः कश्मीरी थे और सप्रू उपवर्ग से थे। अब तनिक कल्पना करें कि पाकिस्तान की नींव रखने वाले इकबाल, जिनकी जड़ें तो थीं कश्मीर में, कश्मीरी पंडितों में, मगर वे अपनी जड़ें बताने लग गए, अरब की! यही परिपाटी पाकिस्तान के हुक्मरानों ने जारी रखी। उन्होंने हिंदुओं पर बेतहाशा अत्याचार किये, उनकी पहचान मिटाई। लाहौर से हिन्दू मिट गए! इन अत्याचारों पर तो जितना भी कहा जाए, उतना ही कम है।

हिंदुओं का इतिहास कब्जाने की होड़

अब अचानक से ही पाकिस्तान के हुक्मरानों और वहां के लोगों में हिंदुओं का इतिहास कब्जाने की होड़ लग गई है। यह वैसा ही है, जैसे कि अजमेर के संस्कृत विश्वविद्यालय को अढ़ाई दिन का झोपड़ा बना देना, या फिर ध्रुव स्तम्भ को कथित रूप से कुतुबमीनार बना देना।

अब वे लोग उस संस्कृत को अपना बताकर भारत को झूठा साबित कर रहे हैं, जिस संस्कृत में हिन्दू और भारत शब्द की भरमार है। अब उन्होंने संस्कृत व्याकरण रचने वाले पाणिनी पर दावा ठोका है। पाकिस्तान की सरकार ने पाणिनी पर स्मारक डाक टिकट जारी किया। चूंकि पाणिनी ने गांधार में रहकर इसे औपचारिक रूप दिया था, इसलिए जिन्ना के देश के मुताबिक संस्कृत पाकिस्तानी है। मगर वे लोग यह नहीं बता पा रहे हैं कि क्या पाणिनी ने कहीं पाकिस्तान शब्द का उल्लेख अपने ग्रंथों में किया है? पाणिनी ने अपने ग्रंथ में “नद्व्यचःप्राच्यभरतेषु” शब्द का प्रयोग किया है, अर्थात जहां पर भरत जाति के लोग रहते हैं।

अचानक से ही पाकिस्तान को चाणक्य पाकिस्तानी लगने लगे हैं। ऐसा क्यों? उनका कहना है कि चाणक्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था और यहीं से उन्हें अपने ज्ञान का आधार मिला, इसलिए चाणक्य भी पाकिस्तानी हैं।

कबीलाई मानसिकता यही है

हिंदुओं के नायकों को पाकिस्तानियों द्वारा कब्जाना न ही अजीब है और न ही नया है। दरअसल कबीलाई लोग हर चीज को हथियाना चाहते हैं, वे लूटना चाहते हैं और जब वे लूट नहीं पाते तो वे जबरन कब्जा जमाकर उसे अपना कहने लगते हैं। जैसे कि अयोध्या में किया, जैसे कि लाहौर से लेकर तक्षशिला तक किया। क्या तक्षशिला का सच्चा इतिहास ये पाकिस्तानी बता पाएंगे कि यह शहर दरअसल भरत पुत्र तक्ष के नाम पर है या फिर लाहौर भी राजा राम के पुत्र लव के नाम पर है?

पूरे पाकिस्तान की जड़ें ही हिन्दू हैं, क्या पाकिस्तानी लोग अपनी जड़ों को पहचानेंगे। या फिर अभी केवल भारत को नीचा दिखाने के लिए या भारत द्वारा वैश्विक रूप से अपने नायकों को स्थापित करने को लेकर पाकिस्तान इस सीमा तक जल-भुन गया है कि अब वह हिंदुओं के इतिहास पर कब्जा जमाना चाहता है। और वह भी उस पहचान पर, जिसे अब तक नकारता रहा?

पाकिस्तान में आइडेंटिटी क्राइसिस

क्या पाकिस्तान को अरब की पहचान नहीं चाहिए? दरअसल उधार की पहचान वाले देश इसी तरह से आइडेंटिटी क्राइसिस का शिकार होते रहते हैं, जो हिंदुओं की लाशों पर बना, हिंदुओं के विनाश पर बना, आज वह हिन्दू इतिहास को अपना बता रहा है।

वहां के लोग साड़ियों से नफरत करते थे, आज वहां के ड्रामों में साड़ियां पहनी जा रही हैं, सोशल मीडिया पर साड़ियों को पाकिस्तानी बताया जा रहा है। राजा पुरू को भी पाकिस्तानी बताया जा रहा है।

जबकि जब यह इतिहास था, तब पाकिस्तान क्या पाकिस्तान जिस मजहब के नाम पर बना है, उसका भी आगमन नहीं हुआ था।

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